धर्म-अध्यात्म

ईश्वरों के ईश्वर का हृदयगान है भगवद्गीता

जीवन के महाविनाशकारी परिदृश्य से पूर्व की विभीषिका में ईश्वरों के ईश्वर श्रीकृष्ण के ह्रदयगान से तरंगित माधुर्यपूर्ण ! गीता सच मायने में भगवान श्रीकृष्ण का हृदय है, जिसमें हरव्यक्ति स्थान प्राप्त किये बिना अपूर्ण है। यह आश्चर्य का विषय है कि कुरुक्षेत्र मै युद्ध के लिये कौरवों और पाण्डवों की सेनाएँ भयानक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर खड़ी थीं। महाविनाश की स्पष्ट सम्भावना तथा स्वजनों के मोह के कारण अर्जुन अपने कर्तव्य से विचलित होकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे। इन्हीं विषम परिस्थितियों में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को जिस ज्ञानामृत का पान कराकर उत्साहित एवं स्वचित्त किया, वही भगवद्‌गीता है। कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण जब अर्जुन को अपने हृदय की अन्तस् गहराइयों में गीतामृत से स्नान करा रहे थे, तब महान से महान योद्धा, गुरु आदी इससे वंचित थे मात्र दिव्यचक्षु प्राप्त अर्जुन और संजय ही इसके साक्षी थे, स्प्ष्ट है बिना दिव्यता की प्राप्ति के इस नाशवान शरीर को प्राप्त चक्षुओंवाले सभी इससे अनभिज्ञ और वंचित रहे।

    भगवद्गीता ईश्वरों के भी ईश्वर क्षीरसागरसागरवासी जगदीश्वर श्री नारायण के अवतार रूप श्रीकृष्ण का दिव्य संगीत है जो लीलाधारी के सुदर्शनचक्रधारी विश्वस्वरूप दिखाए जाते समय गीता रूप उनके हृदय के भीतर नहीं रह सका, छलक पड़ा और उन्होंने अपनी वाणी में बोलकर गीता का उपदेश किया। आज समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन कर पाना सम्भव नहीं है। भगवदगीता समस्त वैदिक साहित्य का सार है, और इसका प्रवचन स्वयं भगवान ने गीता में किया है। – गीता माहात्म्य 4 ) भगवान्‌ की नाभि में एक कमल है, कमल में ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा के मुँहसे वेदका उच्चारण हुआ है। गीता भगवान्‌ के हृदयमें छिपी रह गयी। वह नाभिपद्म में अथवा ब्रह्माजी के मुँह में नहीं आयी, स्वयं छलक पड़ी हृदयसे और नाभिपथ तथा ब्रह्माका सहारा लिये बिना भगवान्‌के मुखपद्मसे प्रकट हुई- गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै:शास्त्रविस्तरै:। स्वयं पद्ममनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता। यह भगवान्‌ श्रीकृष्ण की इस जगत पर  असीम करुणा ही है, जो गीता के रूप में दीन-हीन का उद्धार करने के लिए सबका मंगल, सबका कल्याण करनेके लिए प्रकट हुई है।

     भगवद्गीता परमेश्वर की वाणी है। वे इसमें जीवात्मा एवं परमात्माकी पूर्ण एकता की बात कहते हैं और उस सनातन कर्ममार्ग का उपदेश देते हैं जो मोह-निशा में सोनेवाले अज्ञानी जीव और पूर्णता को प्राप्त हुए ज्ञानी महात्माओं के बीच मै होकर जानेवाला मार्ग है। गीता का एक भी अक्षर, एक भी शब्द, एक वाक्य भी ऐसा नहीं है जो संगीत से अछूता हो, जो भी इसका पाठ अथवा ऊँचे स्वर से गाना भी चाहे तो गाकर एक योग सिद्धि को प्राप्त हो सकता है। गीता को चाहे बहिरंग दृष्टि से देखें या अन्तरंग दृष्टि से, वह ईश्वरीय प्रकाश को साक्षात्‌ रूप से हमारे सामने प्रतिविस्थित करती है। उस वाणीके प्रति, जो थोड़े से शब्दोंमें हमारे ईश्वरत्व की अपरिमेय विभूति को प्रकट करती है, अपना श्रद्धायुक्त सम्मान का भाव व्यक्त करने के लिये इससे अधिक हम क्या कह सकते

       श्रीमदभागवत गीता हम सबके जीवन के लिए कल्याणकारी होने से परम आवश्यक है, पर समाज के बड़ा अंग महाभारत ग्रन्थ से परहेज करता है चुकिं गीता ‘महाभारत’, का ही एक अंश है, जिसे ‘पञ्चम वेद’ माना गया है। महाभारत का युद्ध एक ऐतिहासिक घटना है, हिन्दुओंका सदासे यही विश्वास है। महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध के अवसर पर कुरुक्षेत्र की पुण्यभूमि मै सोलहकलाओं के पूर्ण अवतारी साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा गीता का जन्म होने से, युद्ध के वीभत्स नरसंहार को गीता से जोड़ने वाले गीता को स्वीकार नहीं कर पा रहे है। पर इससे परे  हटकर जिनकी प्रज्ञा में श्रीमदभागवत गीता को आत्मसात करने की वैचारिकता का भाव आता है वह भगवत्-हृदय की अमृतमयी वाणी गीत को स्पर्श करते ही भावविभोर हो उठता है, पर जिनके हृदयशून्य है उनके लिए यह गीता आज भी उसी प्रकार अनजान और अप्रकट है हैं जैसे गीता कुरुक्षेत्र में उपस्थित महानतम योद्धाओं के लिए थी, और वे इससे वंचित रहकर युद्ध में अपने प्राण त्यागने तक इस रहस्य से अनभिज्ञ रहे थे।

      हम भी गीता को आत्मसात करने के लिए प्रयासरत है किन्तु श्रीकृष्ण के हृदय से आज से पांच हजार साल पूर्व प्रगट हुई उन दिव्य तरंगों की अमृततुल्यवाणी को उकेरे गए पृष्ठों से पढ़कर हृदय में प्रकाश लाने का प्रयास होता है, किन्तु मन की अस्थिरता पात्रता से वंचित किये ही है। जो विवशता मेरी है,वह अधिकांशतया सभी की हो सकती है, किन्तु जिन्हें सद्गुरु मिलजाए वे भगवन के हृदय के उदगारों को अपने मन- ह्रदय पर भी स्पर्श कर अपना जीवन धन्यता को प्राप्त होते है ।  जो अमृतमयी गीता की पवित्रता को प्राप्त करना चाहता है उसे अपना साध्य बनाकर साधनारत होने की और अग्रसर हुए बिना उसका साध्य अपूर्ण ही माना है, एतएव भीतर-चाहर से कुछ पवित्र होकर उसे स्पर्श करने की चेष्टा प्रथम सीढ़ी है जहा तन को शुद्ध करने के लिय ब्रम्हमुहूर्त में स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहन, पहले बाहर की पवित्रता को साधना होगा तभी वह भीतर की पवित्रता का पात्र होगा।

    श्रीमदभागवत गीता को समक्ष रखकर मनमें विचार करो, तुम गीता को नहीं श्रीकृष्ण को स्पर्श करने जा रहे हो । वे कितने पवित्र हैं, और तुम कैसे हो ? दूसरे लोग तुम्हें नहीं जानते, परन्तु तुम तो अपने को जानते हो और श्रीकृष्ण भी तुम्हें जानते हैं । कितने दोष हैं, कितने अपराध बन चुके हैं, कितना पाप कर चुके हो, कितनी अपवित्रताओं ने हृदय में आश्रय ले रक्खा है ! बताओ, इस हालतमें श्रीकृष्ण के हृदयरूप इस गीता को कैसे स्पर्श करोगे? श्रीकृष्ण की भावना अपने हृदय में लाइए,पूर्ण समर्पण के साथ कातर होकर एक बार श्रीकृष्ण के स्वभाव को स्मरण कीजिये वे बड़े ही करुणावान क्षमासागर हैं,  वे किसी का अपराध नहीं देखते, उनकी ओर जो अपना मुख विस्तारित कर अपना सर्वस्य समर्पित कर दोनों हाथों को फैलाकर पुकारता है वे हाथ फैलाकर उसे हृदय से लगा लेते हैं।

      वे भोले भक्तोंकी भक्ति में डूबकर इस कलिकाल में चैतन्य महाप्रभु, निंबार्क गोस्वामी, नरसिंहमेहता, मीराबाई, रैदास,कबीर, तुलसीदास, रविदास, नामदेव, तुकाराम, चैतन्य महाप्रभु और रमन महर्षि, शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, जैसे सेकड़ों भक्तों को अपनी शरण में ले लेते है तब यदि हम उनके समक्ष कंगाल बनकर पहुचे तो वे हमारे लिए सर्वस्य हो जायेंगे। हम दुनिया के लोगों के नज़रों में पापी-तापी हो सकते है पर कृष्ण तो दीनबंधु है वे अगति के गति हैं। वे अपने जीवों को निर्मल बनाकर अपनी गोद में उठाने के लिये निरन्तर पुकार रहे हैं, वे सभी को विश्वास दे रहे हैं। भगवदगीता पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली है, इसलिये हमें नित्यप्रति ध्यानपूर्वक तथा श्रद्धापूर्वक श्रवण तथा पठन करना चाहिये। आओ! इस गीता को अपने जीवन की नित्य संगिनी बनाइये, गीता का नित्य पाठ कीजिये, पाठ करते-करते जितना हो सके इसका प्रवाह हृदय के अंदर बहाने की चेष्टा कीजिये, श्रीकृष्ण की असीम कृपा आपपर होगी .आपका कल्याण होगा।

आत्माराम यादव पीव