भारत की सफल होती कूटनीति पर …

जब विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन अपने चरम पर था , तब कर्नल गद्दाफी ने उस आंदोलन के बारे में कहा था कि इस संगठन से यदि भारत को निकाल दिया जाए तो यह नपुंसकों की चौपाल मात्र है । सचमुच उस संगठन के बारे में कर्नल गद्दाफी का यह कहना सर्वथा उचित ही था । जो देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते थे या उसकी बैठकों में सक्रियता के साथ भाग लेते थे , वही किसी न किसी रूप में दोनों महाशक्तियों के सामने कटोरा लिए खड़े होते थे । कहीं तक यह स्थिति भारत की भी थी । भारत को अपनी रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रूस की ओर झुकना पड़ता था । इसलिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन बड़ी ताकतों से ऐसा कुछ भी कराने में सफल नहीं हो पाया , जिसे उस आंदोलन की सफलता कहा जा सके । उदाहरण के रूप में यदि गुटनिरपेक्ष आंदोलन संयुक्त राष्ट्र में 5 बड़ी ताकतों की तानाशाही को समाप्त कराने के लिए प्रस्ताव लाता या उसे समाप्त कराने में सफलता प्राप्त करता या संयुक्त राष्ट्र महासचिव के अधिकारों में बढ़ोतरी कराकर इन तथाकथित पांच शक्तियों पर भी शिकंजा कसने में सफल होता तो माना जाता कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन सफल रहा । परंतु आज भारत के लिए विश्व मंचों पर बहुत ही अनुकूल स्थितियां बन चुकी हैं । अब कोई सी भी ताकत ऐसी नहीं है जो बिना भारत के समर्थन के अपना एक कदम भी आगे बढ़ा सकें ।संकेत स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं कि इस समय वैश्विक समस्याओं के निराकरण में या समाधान में भारत की सहभागिता और भूमिका निरंतर बढ़ती जा रही है , जिससे भारत की कूटनीतिक शक्ति में निरंतर वृद्धि हो रही है । भारत ने इस समय अपनी सारी रणनीतिक , सैनिक , बौद्धिक और कूटनीतिक शक्तियों क्षमताओं को पाकिस्तान के द्वारा गैरकानूनी ढंग से कब्जाए गये कश्मीर की ओर से हटाकर चीन की घेराबंदी की ओर लगा दी है । जिसमें अभी तक भारत को निरंतर सफलता मिल रही है ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जी – 7 देशो के समूह को जी – 11 मे बदलने का संकेत देते हुए इसमें भारत को सम्मिलित करने की बात कही है । जिससे पता चलता है कि अमेरिका चाहे निहित स्वार्थों में ही सही इस समय भारत की क्षमताओं और शक्ति को पहचान रहा है ।यदि ऐसा होता है तो निश्चय ही भारत को इसका दीर्घकालिक लाभ मिलना निश्चित है। जी – 7 मे अभी अमेरिका के साथ कनाडा, फ्रांस जर्मनी, इटली, जापान और यूके सम्मिलित हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जी-7 सम्मेलन को अभी सितंबर तक के लिए स्थगित कर दिया है । इससे पहले वह भारत, ऑस्ट्रेलिया, रूस और दक्षिण कोरिया को बैठक के लिए आमंत्रित करना चाहते हैं। कूटनीति की दुनिया में यह तथ्य एक मानक के रूप में कार्य करता है कि जब किसी उभरती हुई शक्ति को स्थापित शक्ति मान्यता प्रदान करने लगती है तो दूसरी शक्तियां उसके सामने स्वयं ही पानी भरने लगती हैं , अर्थात उसके महत्व को स्वीकार करने लगती हैं । ‘बड़े दादा’ का अनुयायियों पर प्रभाव पड़ना निश्चित होता है । इसी को कहा जाता है कि “यथा राजा तथा प्रजा” – प्रजा राजा का अनुकरण करती है । इस समय यह सर्वमान्य सत्य है कि अमेरिका संसार का अघोषित ‘राजा’ है । उसके कदम का इंतजार करने वाले देशों की लंबी कतार है । वह जिधर को देखता है उधर को देखने वाले संसार में अनेकों देश हैं । ऐसे में यदि अमेरिका भारत को कहीं प्राथमिकता दे रहा है और उसके वर्चस्व को या महत्ता को स्वीकार कर रहा है तो निश्चय ही इसका अर्थ यह है कि संसार के अनेकों देश भारत को स्वाभाविक रूप से बड़ी शक्ति मान रहे हैं ।यही कारण है कि ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने दी भारत की महत्ता को स्वीकार करते हुए समोसा डिप्लोमेसी के माध्यम से भारत आने की इच्छा व्यक्त की है ।

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने विगत 31 मई को समोसे के साथ तस्वीर पोस्ट की और कहा कि वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ इसे साझा करना चाहेंगे। निश्चय ही ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री की कूटनीतिक शैली का एक विशेष महत्व है । जिसे भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भी गंभीरता से समझा है और उन्होंने भी बहुत महत्वपूर्ण संकेत देते हुए कहा है कि वह कोविड-19 को हराने के बाद उनके साथ समोसे का आनंद लेंगे। बात स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री को समोसा के माध्यम से ट्विटर के द्वारा यह संदेश दिया कि वह भारत आना चाहते हैं । जिसे भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार दो शक्तियां निकटता का आनंद लेते हुए भविष्य की किसी संभावित बैठक की तैयारियों व प्रतीक्षा में जुट गई हैं । दोनों शक्तियों के इस प्रकार की समोसा कूटनीति का स्पष्ट संकेत और संदेश चीन की समझ में भी आ गया है।हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत ने कोविड 19 के स्रोत की जांच के ऑस्ट्रेलियाई प्रस्ताव का समर्थन किया था। भारत का वर्तमान नेतृत्व यह भली प्रकार जानता है कि यदि पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेना है तो इस समय विश्व जनमत को अपने साथ लेना नितांत आवश्यक है । क्योंकि नए और शक्तिशाली साथियों को लेकर चलने में ही भारत पाकिस्तान और चीन के गठबंधन का सामना कर सकता है ।

इस समय वैश्विक स्तर पर निष्ठाएं बड़ी तेजी से परिवर्तित हो रही हैं और बहुत तेजी से मित्रों की अदला बदली भी चल रही है । विश्व ध्रुवीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है । जिसे अधिक स्पष्ट शब्दों में कहें तो तूफान से पहले की शांति के रूप में माना जाना चाहिए ।यद्यपि हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ऐसी कोई अशोक घड़ी ना आए जब विश्व के देशों के पास लगे बारूद के ढेर में आग सुलग उठे।भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया चार देशों के समूह क्वाड के सदस्य हैं। अमेरिका की इच्छा है कि इस समूह को भी अधिक शक्तिशाली बनाकर सैन्य स्वरूप प्रदान किया जाए । जिससे चीन जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों को समय आने पर मुंह तोड़ जवाब दिया जा सके। चीन क्वाड को लेकर प्रारंभ से ही सशंकित रहा है , वह इसे अपने विरुद्ध की जा रही मोर्चाबंदी के रूप में देखता रहा है ।हमें वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ब्रिटेन इस समय कोई बहुत अधिक मजबूत ताकत नहीं रह गया है । एक समय था जब वह संसार के अनेकों देशों पर अपना अवैध शासन स्थापित करने में सफल हो गया था , वह उस समय की गई लूट की कमाई से अभी तक विश्व शक्ति बना रहा है । पर यदि अब विश्व युद्ध होता है तो ब्रिटेन का पतन निश्चित रूप से हो जाएगा । वह अभी भी बहुत अधिक सक्रियता के साथ विश्व मंचों पर अपनी भूमिका निभा नहीं पा रहा है । उसकी ओर से आ रहे ऐसे संकेत उसे निश्चय ही ‘बीमार’ घोषित करते हैं।दूसरे फ्रांस भी उपनिवेशवादी व्यवस्था के समय में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से लूटे गए माल से ही अपनी अर्थव्यवस्था को अभी तक खींच कर रहा है । परंतु अब नई परिस्थितियों में उसका पतन भी निश्चित है। इसी प्रकार इन दो शक्तियों के साथ-साथ चीन का पतन इसलिए निश्चित है कि वह इस समय आतंक का समर्थन कर रहा है और अधर्म व अनीति के मार्ग को अपनाकर संसार को विनाश की ओर ले जा रहा है। ऐसी शक्तियों का पतन निश्चित ही होता है जो अपने आप को ‘भस्मासुर’ के रूप में स्थापित करती हैं। तब आने वाले समय में निश्चय ही भारत ‘धर्म की राजनीति’ करने वाला एक प्रमुख देश बन कर उभरेगा जो विश्व में वास्तविक मानवतावाद की स्थापना करने में सफल होगा। भारत के लिए यह भी एक शुभ संकेत है कि अगले महीने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पांच अस्थाई सीटों में से उसे एक सीट मिलना लगभग निश्चित है। अगले महीने नई चुनाव प्रक्रिया के तहत चुनाव होने हैं। जिसके बारे में हमें पता होना चाहिए कि एशिया प्रशांत सीट से इकलौता दावेदार भारत ही है। चीन अभी तक भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता दिलाने में सबसे बड़ी बाधा बना रहा है परंतु अब संसार के अधिकांश देशों को यह बात समझ में आ गई है कि जब भारत सारे विश्व की कुल आबादी के लगभग 1 /6 भाग को लेकर आगे बढ़ रहा है , तब इतनी बड़ी आबादी के देश को सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट से वंचित रखा जाना संसार की 1/6 जनसंख्या के साथ अन्याय करना है ।विश्व जनमत तेजी से भारत के समर्थन में आ रहा है और भारतीय कूटनीति भी बहुत सधे सधाए घोड़ों की तरह रथ को आगे लेकर बढ़ रही है । इसके उपरांत भी भारतीय नेतृत्व को किसी भी प्रकार के आलस्य प्रमाद और असावधानी से बचे रहने का प्रयास करना होगा । नेहरू जी के समय में हम कई असावधानियों का शिकार हुए थे । जिनका परिणाम हमें आज तक भुगतना पड़ रहा है । ऐसा न हो कि नेहरू जी की की गई गलतियों को यह सरकार भी दोहरा दे अन्यथा फिर जैसा निरूपण आज नेहरू जी का उनकी विदेश नीति आदि के संदर्भ में किया जा रहा है वैसा ही इस सरकार का निरूपण भी किया जाना संभावित है।विश्व कूटनीति में सफल होना एक अलग बात है और विश्व नेता का मोह संवरण करना एक अलग बात है । नेहरू जी से यही चूक हुई थी कि वह विश्व नेता के मोह का संवरण नहीं कर पाए थे । निश्चय ही इस गलती से वर्तमान नेतृत्व को शिक्षा देने की आवश्यकता है। हर स्थिति में राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।
डॉ राकेश कुमार आर्य 

Previous articleकागजों पर ही है आपदा प्रबंधन!
Next articleशाह-मोदी,सियासी जोड़ी।
राकेश कुमार आर्य
उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,156 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress