भीमराव आम्बेडकर, अन्ना हजारे और लोकतंत्र

बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के जन्मदिन पर विशेष

(जन्म -14 अप्रैल 1891, मृत्यु – 6 दिसम्बर 1956 )

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर को हमें आधुनिक मिथभंजक के रूप में देखना चाहिए। भारत और लोकतंत्र के बारे में परंपरावादियों,सनातनियों, डेमोक्रेट, ब्रिटिश बुद्धिजीवियों और शासकों आदि ने अनेक मिथों का प्रचार किया है। ये मिथ आज भी आम जनता में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। बाबासाहेब ने भारतीय समाज का अध्ययन करते हुए उसके बारे में एक नया सोच पैदा किया है। भारतीय समाज के अनेक विवादास्पद पहलुओं का आलोचनात्मक और मौलिक विवेचन किया है।

भारत में भक्त होना आसान है समझदार होना मुश्किल है। बाबासाहेब ऐसे विचारक हैं जो शूद्रों के सामाजिक तानेबाने को पूरी जटिलता के साथ उदघाटित करते हैं। बाबासाहेब के भक्तों में एक बड़ा तबका है जो दलितचेतना और दलित विचारधारा से लैस है।

हाल ही में अन्ना हजारे और उनके अंधभक्तों और कारपोरेट मीडिया ने जिस तरह का उन्माद पैदा किया है उससे एक संदेश संप्रेषित हुआ है भारत में लोकतंत्र जनता की सेवा के लिए है और बस सिर्फ जनता का दबाब पैदा करने की जरूरत है और लोकतंत्र पटरी पर आ जाएगा। अन्ना हजारे और उनकी भक्तमंडली यह भी कह रही है यदि कुछ पुख्ता कानूनी नियम और संरचनाएं बना दी जाएं तो फिर लोकतंत्र को हम अमीरों की सेवा में से निकालकर गरीबों की सेवा में लगा देंगे।

इस संदर्भ में मुझे बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर का सहज ही स्मरण हो रहा है। आम्बेडकर की साफ धारणा थी कि संसदीय जनतंत्र जनता की मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। सन् 1943 में इंडियन फेडरेशन के कार्यकर्ताओं के एक शिविर में भाषण करते हुए आम्बेडकर ने कहा “हर देश में संसदीय लोकतंत्र के प्रति बहुत असंतोष है। भारत में इस प्रश्न पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भारत संसदीय लोकतंत्र प्राप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है। इस बात की बहुत जरूरत है कि कोई यथेष्ठ साहस के साथ भारतवासियों से कहे-संसदीय लोकतंत्र से सावधान। यह उतना बढ़िया उत्पाद नहीं है जितना दिखाई देता था।” इसी भाषण में आगे कहा ‘संसदीय लोकतंत्र कभी जनता की सरकार नहीं रहा,न जनता के द्वारा चलाई जाने वाली सरकार रहा। कभी ऐसी भी सरकार नहीं रहा जो जनता के लिए हो।’

भीमराब आम्बेडकर ने 1942 के रेडियो भाषण में स्वाधीनता,समानता और भाईचारा, इन तीन सूत्रों का उद्भव फ्रांसीसी क्रांति में देखा। उन्होंने कहा “मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन । संसदीय लोकतंत्र का अर्थ जनता के द्वारा शासन नहीं है।”

आम्बेडकर ने संसदीय लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए लिखा ” संसदीय लोकतंत्र शासन का ऐसा रूप है जिसमें जनता का काम अपने मालिकों के लिए वोट देना और उन्हें हुकूमत करने के लिए छोड़ देना होता है।” आम्बेडकर ने लोकतंत्र को मजदूरवर्ग के नजरिए से देखा और उस पर अमल करने पर भी जोर दिया।

अन्ना हजारे जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं वो मालिकों का जनतंत्र है। वे जिस तथाकथित लोकशाही की बार बार दुहाई दे रहे हैं वो मालिकों की लोकशाही है। इसके विपरीत भीमराव आम्बेडकर का मानना था जब तक पूँजीवाद कायम है तब तक सही मायनों में न स्वतंत्रता संभव है और न समानता। वास्तव अर्थ में समानता हासिल करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को बदलना होगा उसके बाद ही वास्तविक अर्थ में समानता प्राप्त की जा सकती है।

इसके विपरीत अन्ना हजारे पूंजीवाद को बनाए रखकर ही नियमों में सुधार की बात कर रहे हैं। आम्बेडकर की नजर में वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है सभी किस्म के विशेषाधिकारों का खात्मा। नागरिक सेवाओं से लेकर फौज तक,व्यापार से लेकर उद्योग धंधों तक सभी किस्म के विशेषाधिकारों को खत्म किया जाए। वे सारी चीजें खत्म की जाएं जिनसे असमानता पैदा होती है।

आम्बेडकर की धारणा थी कि ‘लोकप्रिय हुकूमत के तामझाम के बावजूद संसदीय लोकतंत्र वास्तव में आनुवंशिक शासकवर्ग द्वारा आनुवंशिक प्रजा वर्ग पर हुकूमत है। यह स्थिति वर्णव्यवस्था से बहुत कुछ मिलती जुलती है। ऊपर से लगता है कोई भी आदमी चुना जा सकता है,मंत्री हो सकता है,शासन कर सकता है।वास्तव में शासक वर्ग एक तरह वर्ण बन जाता है। उसी में से,थोड़े से उलटफेर के साथ,शासक चुने जाते हैं।जो प्रजा वर्ग है, वह सदा शासित बना रहता है।’

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