जैव-विविधता प्रकृति की स्वभाविक संपत्ति है इसका क्षय प्रकृति का क्षय

अवधेश कुमार सिंह

पर्यावरण, मानव जीवन का अभिन्न अंग है, इसके बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। एक स्वच्छ वातावरण शांतिपूर्ण तथा स्वस्थ जीवन जीने के लिए बहुत आवश्यक है। पर्यावरण का मतलब है सभी प्राकृतिक परिवेश जैसे की भूमि, वायु, जल, पौधें, पशु, ठोस सामग्री, कचरा, धूप, जंगल और अन्य वस्तु। मगर अनियंत्रित औद्योगिक विकास के फल्स्वरूप निकले विषाक्त कचरे को नदियों में बहाते रहने से विश्व में स्वच्छ जल का संकट उत्पन्न हो गया है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से कृषि योग्य भूमि बंजर हो रही है। औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक कोयले, पेट्रोलियम पदार्थों, पनबिजली व आण्विक शक्ति के दुरुपयोग से पर्यावरण संकट में पड़ गया है। झील झरने सूख रहे हैं। जंगलों से पेड़ और वन्य जीव गायब होते जा रहे हैं। चीता तथा शेर हमारे देश से देखते-ही-देखते विलुप्त हो चुके हैं। सिंह भी गिर के जंगलों में हीं बचे हैं। इसी तरह राष्ट्रीय पक्षी मोर, हंस कौए और घरेलू चिड़ीयों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यही हाल हवा का है। विकास की आंधी में मिट्टी की भी मीट्टी-पलीद हो चुकी है। दुनिया का तापमान बढ़ रहा है, मौसम बदल रहे हैं, फसलों का चक्र तबाह हो रहा है, जीव जंतुओं के रहने की जगह खत्म हो रही है। इन सबकी वजह से जैव विविधता को खतरा है। पर्यावरण के संरक्षण के लिए पेड, पौधे, जीव-जंतुओं को बचाने पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है। चूँकि जैव-विविधता मानव सभ्यता के विकास की स्तम्भ है इसलिये इसका संरक्षण अति आवश्यक है।

जैव-विविधता का हमारे जीवन के लिए कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्तमान कोरोना वायरस की तबाही को देखते हुए  इस साल यानि विश्व पर्यावरण दिवस 2020 बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) पर केंद्रित होगा और जर्मनी के साथ साझेदारी में कोलंबिया में आयोजित किया जाएगा। कोलंबिया ग्रह की जैव विविधता का 10% रखने के लिए दुनिया के सबसे बड़े “मेगैडवर्स” देशों में से एक है।

उल्लेखनीय है कि दुनियाभर में हर साल विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाता है। आज ही के दिन हर साल पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लिया जाता है। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साल 1974 की गोष्ठी में ‘पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव’ विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में यह भारत का पहला कदम था। तभी से हम हर साल 5 जून का यह दिन पर्यावरण को समर्पित करते आ रहे हैं।

पर्यावरण के अहम मुद्दों में से आज जैव विविधता का संरक्षण एक अहम मुद्दा है। चुकि जैव-विविधता मानव सभ्यता के विकास का स्तम्भ है। यह पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखने में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त यह प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा आदि से राहत प्रदान करती है। वास्तव में जैव-विविधता प्रकृति की स्वभाविक संपत्ति है और इसका क्षय एक प्रकार से प्रकृति का क्षय है। अतः प्रकृति को नष्ट होने से बचाने के लिए जैव-विविधता को संरक्षण प्रदान करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। राष्ट्रों, सरकारी एजेंसियों और संगठनों तथा व्यक्तिगत स्तर पर जैविक विविधता के संवर्धन और उसके संरक्षण की बड़ी चुनौती है। इसके लिए चंहु ओर जैव विविधता को बचाने का अभियान चलाया जा रहा है।  जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण को विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम में समुचित रूप से शामिल किया जाना चाहिए।

विदित हो कि जैव विविधता का हमारे जीवन में काफी महत्व है। इकोसिस्टम सबसे छोटे बैक्टीरिया से लेकर सबसे बड़े कशेरुक तक सभी भागों पर निर्भर हैं। यह आपस में जुड़ा हुआ है कुछ ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहे हैं जिससे इंसान सांस ले रहे हैं। कुछ बड़ी प्रजातियों के लिए भोजन प्रदान करते हैं, जो बदले में बड़ी प्रजातियों का भी शिकार बन जाते हैं। संतुलन के रखरखाव में प्रत्येक जीवित जीव की अहम  भूमिका होती है। अतेव पर्यावरण संरक्षण के लिए जैव विविधता बेहद जरूरी है।

चुकि वातावरण में तीव्र गति से होते नकारात्मक बदलाव के कारण बहुत से पेड़−पौधे और पशु−पक्षी विलुप्त हो चुके हैं जिससे जैव विविधता को बनाये रखने के स्तर में भी काफी गिरावट आई है। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि मानव के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए और अपने वातावरण की शुद्धता के लिए इन नकारात्मक बदलावों को काबू किया जाये।

भारत एक बहुत बडा विविधता वाला देश है जहां दुनिया की लगभग 10% प्रजातियां रहती हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार, भारत में संसार का केवल 2।4 प्रतिशत भू−भाग है जिसके 7 से 8 प्रतिशत भू−भाग पर भिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं। प्रजातियों की संवृधि के मामले में भारत स्तनधारियों में 7वें, पक्षियों में 9वें और सरीसृप में 5वें स्थान पर है। विश्व के 11 प्रतिशत के मुकाबले भारत में 44 प्रतिशत भू−भाग पर फसलें बोई जाती हैं। भारत के 23।39 प्रतिशत भू−भाग पर पेड़ और जंगल फैले हुए हैं। भारत में पौधों की लगभग 45,000 प्रजातियां पायी जाती हैं, जो दुनिया के कुल आबादी का लगभग 7% हैं। पौधों की लगभग 1336 प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है। 

जहां तक विश्व का सवाल है तो दुनिया में कुल कितनी प्रजातियाँ हैं यह ज्ञात से परे है, लेकिन एक अनुमान के अनुसार इनकी संख्या 30 लाख से 10 करोड़ के बीच है। विश्व में 14,35,662 प्रजातियों की पहचान की गयी है। यद्यपि बहुत सी प्रजातियों की पहचान अभी भी होना बाकी है। पहचानी गई मुख्य प्रजातियों में 7,51,000 प्रजातियाँ कीटों की, 2,48,000 पौधों की, 2,81,000 जन्तुओं की, 68,000 कवकों की, 26,000 शैवालों की, 4,800 जीवाणुओं की तथा 1,000 विषाणुओं की हैं। पारितंत्रों के क्षय के कारण लगभग 27,000 प्रजातियाँ प्रतिवर्ष विलुप्त हो रही हैं। अगर जैव-विविधता क्षरण की वर्तमान दर कायम रही तो विश्व की एक-चौथाई प्रजातियों का अस्तित्व सन 2050 तक समाप्त हो जायेगा। एक अनुमान के मुताबिक पृथ्वी पर लगभग 3,00,000 वनस्पति तथा इतने ही जानवर है जिसमें पक्षी, मछलियां, स्तनधारी, कीड़े, सींप आदि शामिल है। पिछली कुछ शताब्दियों में कई वनस्पति एवं जानवरों की प्रजातियां विलुप्त हो गयी है और आने वाले समय में कई लुप्त होने की कग़ार पर है। यह जैव विविधता के लिए ख़तरे का संकेत है।

 आज जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ जैव विविधता को भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण मुद्दा माना जाना चाहिये। जैव विविधता में गिरावट न केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा है, बल्कि यह आर्थिक, सुरक्षात्मक तथा नैतिक मुद्दा भी है। सबसे बड़ी चुनौती तथा अवसर का संबंध विकास के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव से है। लोगों को प्रकृति की रक्षा के लिये स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में बदलाव करना होगा। अतः प्रकृति को बचाने के लिये एक वैश्विक डील के लिये सभी देशों को एक मंच पर आने की ज़रूरत है। भारत दुनिया के 17 बिशाल विविधतापूर्ण देशों में से एक है। लेकिन कई पौधों और जानवरों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। गंभीर खतरे और अन्य विलुप्तप्राय पौधों तथा पशु प्रजातियों की रक्षा करने के लिए भारत सरकार ने कई कदम, कानून और नीतिगत पहलों को अपनाया है।

लेकिन हकीकत ये है कि ना भाषण, ना नारे, सिर्फ रचनात्मक प्रयासों से ही पर्यावरण को सुधारा जा सकता है। सरकार जितने भी नियम-कानून लागू करें उसके साथ साथ जनता की जागरूकता से ही पर्यावरण की रक्षा संभव हो सकेगी।

अगर हम जैव विविधता के लक्ष्यों को वाकई में हासिल करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें कुनमिंग जैव विविधता वार्ता की बातचीत के मसौदे में मौजूद समस्याओं को सुलझाना होगा। कोरोना वायरस ने बहुत लोगों को एक बार फिर इस बात पर गौर करने के लिए मजबूर कर दिया है कि किस तरह से जंतुओं और प्रकृति का आपसी संबंध मानव जाति से है। अक्टूबर में कुनमिंग में एक बैठक होने वाली है। इस बैठक में पृथ्वी पर सभी के जीवन के महत्व पर विचार किया जाना है। दरअसल, 15वें कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप 15) में जैव विविधता पर कन्वेंशन  का आयोजन होने जा रहा है। ये अतिश्योक्ति नहीं है कि इस बैठक का ऐतिहासिक महत्व है। 2020 के बाद की वैश्विक जैव विविधता की रूपरेखा तय करना, कॉप 15 का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होगा। इसके अलावा, अगले दशक के लिए जैव विविधता लक्ष्य निर्धारित किये जाएंगे।

आज कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला हुआ है। टिड्डियों के झुंड का उत्पात अब उप-सहारा अफ्रीकी देशों से आगे निकलते हुए कई अन्य देशों में पहुंच चुका है। इन सब घटनाओं से स्पष्ट है कि पृथ्वी के लिए जैव विविधता संकट बहुत खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है। अब बेहद जरूरी हो गया है कि मानव जाति प्रकृति के साथ सामंजस्य के साथ रहे। कुनमिंग कांफ्रेंस, मानव जाति के लिए आखिरी मौका है जिसमें वह जैव विविधता को बचाने के लिए ठोस प्रयास कर सकती है। मौजूदा वक्त में हम जीवन और मौत की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। संतुलित महत्वाकांक्षा के साथ व्यावहारिक कार्ययोजना का खाका खींचने के लिए अगले पांच महीने मानव जाति के लिए बेहद अहम हैं।

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