मनोज ज्वाला
चालु वर्ष 2026 युगऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य की अर्द्धांगिणी माता भगवती देवी शर्मा के जन्म की शताब्दी का वर्ष है, जिसके निमित्त हरिद्वार में आयोजित भिन्न-भिन्न कार्यक्रमों की गूंज देश-दुनिया भर में सुनी जा रही है । ये वही माता भगवती देवी शर्मा हैं, जिन्होंने एक आपतकाल में भारतीय सेना को विजय- का वरदान दे कर देश की आन-बान-शान को पराभव के सागर में डुबने से बचा लिया था सको परमाणु शक्ति से सम्पन्न भारतीय सेना, जो विश्व की सबसे बडी स्वैच्छिक सेना है, सो अग्नि, पृथ्वी, त्रिशूल, ब्रह्मोस आदि भयंकर प्रक्षेपास्त्रों से लैस है ; यह तो सारी दुनिया जानती है; किन्तु उसे एक दुर्लभ ‘दिव्यास्त्र’ भी प्राप्त
है, यह कम ही लोग जानते हैं । जी हां , दिव्यास्त्र ! अर्थात , एक ऐसा ‘दिव्य
अस्त्र’ , जो दिव्य होने के कारण सर्वथा अदृश्य रहता है । यह अलौकिक
दिव्यास्त्र भारत के महान ऋषियों की कठोर आध्यात्मिक तप-साधना से निःसृत
होता है, जो भारतीय सेना को युद्ध के दौरान तब स्वतः प्राप्त हो जाया
करता है, जब मुश्किलों से घिर जाने पर उसे इसकी तीव्र आवश्यकता अपरिहार्य
होती है । यह दिव्यास्त्र भारतीय सेना को शत्रुओं की ओर से मिली
प्रत्यक्ष गम्भीर चुनौतियों को ठिकाने लगाने में परोक्ष रुप से कैसे
काम करता रहा है, इसकी एक बानगी देखिए-
सन 1971 में देश की पूर्वी-पश्चिमी दोनों सीमाओं पर
पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध के अपरिहार्य हालात उत्त्पन्न हो जाने और
शत्रु-देश की तरफदारी में अमेरिका जैसी महाशक्ति के खडा हो आने पर भारतीय
सेना के समक्ष ऐसी चुनौती उत्त्पन्न हो गई थी कि कठोर निर्णय लेने वाली
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी अपनी ओर से किये गए तमाम सामरिक
उपायों के बावजूद सशंकित हो उठी थीं । लिहाजा, स्थिति की नजाकत को
देखते हुए केन्द्र-सरकार उस युद्ध को हर हाल में जीत लेने के बावत
गैर-शासनिक व अराजनीतिक उपायों की तलाश में भी जुट गई थी । वह तलाश आध्यात्मिक क्षेत्र में की जा रही थी, जो
देव-भूमि हरिद्वार जा कर वहां पूरी हुई , जहां हिमालय की दिव्य सत्ता के संरक्षण में एक स्वतंत्रता-सेनानी से तत्ववेता-तपस्वी बने महान गायत्री-साधक युगऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य की अर्द्धांगिनी- भगवती देवी शर्मा अपने ‘शांतिकुंज’ नामक आश्रम में भारत राष्ट्र के पुनरुत्थान का सूक्ष्म सरंजाम रचने-गढने की विविध क्रियायें सम्पादित कर रही थीं; क्योंकि आचार्य शर्मा तब सुदूर दुर्गम गोमुख-क्षेत्र में कहीं तप-साधना में लीन रहा करते थे, जहां पहुंच पाना और उनसे मिल पाना दोनों असम्भव था । ‘ब्रह्मवर्चस रिसर्च इंस्टिच्युट’ के डॉयरेक्टर डॉ प्रणव
पण्ड्या द्वारा आचार्यश्री की तपश्चर्या को अनावृत करने के लिए लिखी हुई
पुस्तक-‘चेतना की शिखर यात्रा’ के तीसरे भाग में इस प्रसंग का विस्तार से
वर्णन है, जिसका एक अंश दिव्यास्त्र के सम्बन्ध में पठनीय है- “केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि श्री अय्यर जी ने माताजी
(आचार्यश्री की अर्द्धांगिनी-भगवती देवी शर्मा) से अनुरोध किया कि संकट (भारत-पाक- युद्ध) के इस दौर में कुछ ऐसे आध्यात्मिक उपचार किये जाएं , जिससे भारतीय सेना की विजय सुनिश्चित हो , सरकार ऐसे उपाय के लिए भी प्रयत्नशील है” । तब उन माताजी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा- “आसन्न संकट को देखते हुए गत
नवरात्रियों में ही विशिष्ट साधनायें कर ऐसे उपचार किये जा चुके हैं और
आचार्यजी ने सूक्ष्म-जगत में सीधे हस्तक्षेप किया हुआ है- भारत का भविष्य
उज्ज्वल है” । यहां यह उल्लेखनीय है कि तब आचार्य शर्मा अपने सूक्ष्म शरीरधारी गुरु के निर्देशानुसार हिमालय के गोमुख-स्थित एक सिद्ध क्षेत्र में एक विशिष्ट
आध्यात्मिक तप-साधना करने में तल्लीन थे । उन्हीं दिनों 03 दिसम्बर 1971
को पाकिस्तान की ओर से आक्रमण कर दिया गया, तब जो हुआ वह दुनिया के
युद्धों के इतिहास में एक अकेला उदाहरण बन गया ।
तेरह दिनों तक चले उस युद्ध में पाकिस्तान को अमेरिका से
पूरा सहयोग-समर्थन मिल रहा था, जबकि भारत को सोवियत रुस का । अमेरिकी
विदेश मंत्री हेनरी किसिंगर के शब्दों में- “राष्ट्रपति निक्सन पूर्वी
पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की जनता के पक्षकार-भारत को जीतते हुए नहीं
देखना चाहते थे और इसके लिए वे पाकिस्तान के पक्ष में सब कुछ करने को
तैयार थे ” । अन्ततः अमेरिकी सरकार ने भारत के विरुद्ध सैनिक हस्तक्षेप
की घोषणा करते हुए अपनी नौसेना के सातवें बेडे को पाकिस्तान की तरफदारी
के लिए बंगाल की खाडी में कूच करने का आदेश कर दिया । परमाणु बमों से लैश
उसका वह अजेय समुद्री बेडा भारत को तबाह करने के लिए 09 दिसम्बर को जब चल पडा , तब दुनिया भर में उस युद्ध की बाजी पलट जाने, अर्थात भारत की हार
सुनिश्चित होने के कयास लगाए जाने लगे । तरह-तरह के डरावने अनुमान खबरों
की शक्ल में लोगों को डराने लगे थे, किन्तु मात्र तीन दिनों के बाद ही
भारत की तबाही शुरू होने के समाचार आने थम गए , क्योंकि अमेरिकी नौसेना
का वह सातवां बेडा अकारण ही चुपचाप उल्टी दिशा में वापसी का रुख ले लिया था । और इधर , भारतीय नौसेना के जवानों ने पाकिस्तानी नौसेना की पनडुबियों
को पानी में ही डुबो-डुबो कर उनके काम तमाम कर दिया था और एक साथ दो-दो
सीमाओं पर, अर्थात पूर्वी पाकिस्तान के ढाका व पश्चिमी पाकिस्तान के
कराची को अपनी जद में ले कर शत्रु-सेना के 90 हजार सैनिकों को समर्पण के
लिए बाध्य कर दिया था । अमेरिकी नौसेना का वह ‘सातवां बेडा’ आखिर किस कारण से उल्टे पांव वापस लौट गया, यह आज भी रहस्य बना हुआ है ।
अपने गोपणीय शासनिक निर्णयों को भी बीस वर्षों के बाद सार्वजनिक कर देने वाले अमेरिकी-शासन के तत्सम्बन्धी तत्कालीन दस्तावेज आज भी इस प्रसंग में निरुत्तर ही हैं कि वह सातंवा बेडा बीच रास्ते से ही आखिर किसके आदेश पर और क्यों वापस लौट गया ? डॉ० पण्ड्या की पुस्तक- ‘चेतना की शिखर-यात्रा’ में इस प्रश्न का उत्तर कुछ यों दिया गया है- “उन दिनों शांतिकुंज से सम्बद्ध राजनंद
गांव (मध्यप्रदेश) के एक प्रबुद्ध साधक ललित कुमार साहू जैसे अनेक साधकों
की ध्यानस्थ चेतना में कुछ अद्भूत चित्र व दृश्य उभरे थे- …. एक विराट
युद्ध-पोत का चित्र और उसके आस-पास युद्धक विमानों से युक्त सैकडों
नौकाओं के तैरने एवं द्रूतगति से भारतीय तटों की ओर बढते हुए रामेश्वरम
की सीध में आने का दृश्य….. और अचानक समुद्र की छाती को चीरते हुए एक ऋषि का विशाल हाथ,….लहरों के बीच से उभरता हुआ हाथ आकाश की ऊंचाई तक उठता है….उसका पंजा खुलने लगता है….वह उस जहाजी बेडे को अनावृत करते हुए उस पर छा जाता है और उसे तोड्ते-मरोडते हुए समुद्र के गर्भ में डुबो देता है…..”। फिर अगले ही दिन भारत के सरकारी रेडियो- ‘आकाशवाणी’ से यह खबर
प्रसारित हो गई कि अमेरिकी नौसेना का सातवां बेडा वापस लौट पडा है , तब
वह साधक अपनी ध्यानावस्था की उक्त अनुभूति का मर्म समझने के निमित्त
शांतिकुंज गया , तो वहां उसे मालूम हुआ कि ऐसा ही दृश्य उस ऋषि-आरण्यक
में रह रहे अन्य कई परिजनों को भी अनुभूत हुआ था ।
स्थूल से सूक्ष्म में कायान्तरित हो चुके और आधुनिक युग के विश्वामित्र व युग-ऋषि कहे जाने वाले श्रीराम शर्मा आचार्य एवं उनकी भार्या माता भगवती देवी शर्मा के सानिध्य में रह चुके अनेक लोग अभी जीवित हैं, जो उनके आध्यत्मिक तप के ताप से निःसृत एक दिव्य-शक्ति के उस चमत्कार को ‘दिव्यास्त्र’ का ही प्रहार बताते हैं । सचमुच वह भारत की महान ऋषि-सत्ता का
सूक्ष्म दिव्यास्त्र ही था, जिसने अमेरिकी नौसेना के उस जंगी जहाज
(सातवां बेडा) को चुपचाप लौट जाने के लिए विवश कर कर दिया । अन्यथा
अमेरिकी प्रशासन भी अज तक यह स्पष्ट नहीं कर सका है कि उसका सातवां बेडा लक्ष्य तक पहुंचे बिना ही वापस आखिर क्यों लौट गया ? ऐसे में यह तथ्य इसी
सत्य को सिद्ध करता है कि एक आध्यात्मिक शक्ति के हस्तक्षेप से ही एक
वैश्विक महाशक्ति की नौसेना को अपना रुख बदलने के लिए विवश होना पडा ।
उल्लेखनीय है कि भारतीय धर्म-अध्यात्म के संवर्द्धन से युग-परिवर्तन के विश्वव्यापी अभियान को क्रियान्वित करने के निमित्त ‘गायत्री परिवार’ नामक विशाल आध्यात्मिक संगठन खडा कर समस्त अवांछनीयताओं को चुनौती देने वाली उन्हीं ऋषि-सत्ता की अर्द्धांगिणी माता भगवती देवी शर्मा के जन्म की शताब्दी पर विविध विषयक समारोह देश-दुनिया भर में आयोजित किये जा रहे हैं, जिन्होंने उक्त संगठन के लाखों परिजनों की फौज को मातृवत स्नेह-प्यार-संस्कार से सींचने का दैवीय कार्य किया हुआ है । इस शताब्दी समारोह का मुख्य केन्द्र देव-भूमि हरिद्वार है, किन्तु वहां से दुष्प्रवृति-उन्मूलन व सत्प्रवृति-संवर्द्धन एवं सनातन धर्म की संस्कार-परम्परा के पुनर्जीवन तथा ऋषि-चिन्तन के व्यावहारिक क्रियान्वयन और सदबुद्धि-प्रदायक गायत्री मंत्र की उपासना व यज्ञ-विज्ञान की साधना के सामूहिक संकल्पों से युग-परिवर्तन की जो ऊर्जा प्रवाहित होगी, सो आगामी वर्षों में भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व-वसुधा की दशा-दिशा और समस्त मानवता की होतव्यता को सिरे से बदल देगी । यह दावा निराधार नहीं है, अपितु इस आधार पर है कि श्रीराम शर्मा आचार्य की युग-परिवर्तन-विषयक वे तमाम भविष्यवाणियां वर्ष २०११ से ही अब अक्षरशः घटित हो रही हैं, जो उन्होंने अपने निर्वाण से वर्षों पहले ‘महाकाल की तैयारी’ नामक पुस्तक में घोषित कर रखी है और जिसके निमित्त वर्ष २०२६ से ही एक ‘अखण्ड ज्योति’ जला रखी है, जो आज भी अनवरत प्रज्ज्वलित है । इस वर्ष उस अखण्ड ज्योति की भी शताब्दी मनायी जा रही है ।