लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

दिदी की मासिक धर्मनिरपेक्षता के पुनर्पाठ का स्कूली प्रसंग

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रामकृष्ण परमहंस की तपोभूमि और विवेकानन्द की ज्ञानभूमि पश्चिम बंगाल में वहां के शासन की धर्मनिरपेक्षता इन दिनों फिर उफान पर है । सियासत की तिजारत में वामपंथियों को परास्त कर चुकी ममता दिदी अपनी धर्मनिरपेक्षता का एक नया कीर्तिमान स्थापित करने में लगी हुई हैं । इस बावत हिंसक जेहाद का प्रशिक्षण देने के… Read more »

भारत के पुनरुत्थान की सुबुगाहट का आख्यान

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मनोज ज्वाला खबर है कि आगामी अप्रेल महीने में महाकाल की नगरी उज्जैन में एक ऐसा अद्भूत कार्यक्रम सम्पन्न होने जा रहा है, जिससे देश-दुनिया के लोग पृथवी के सर्वाधिक पुरातन-सनातन राष्ट्र ‘भारतवर्ष’ को ‘परम वैभव’ का अभीष्ट सिद्ध करने के निमित्त भारतीय पैरों पर पुनः खडा हो उठने का बौद्धिक उद्यम करते देख सकेंगे… Read more »



पुर्तगाली, डच और अंग्रेज ; भारत के विरूद्ध तीनों एक

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मनोज ज्वाला पुर्तगाली , डच और अंग्रेज बाहर से देखने-समझने में तो अलग-अलग जातियों के लोग प्रतीत होते हैं ; किन्तु चमडी के रंग से श्वेत और धार्मिक मजहबी ढंग से ईसाई होने के कारण अश्वेत व गैर-ईसाई लोगों-राष्ट्रों  के विरूद्ध भीतर से ये सभी एक ही हैं । अंग्रेजों द्वारा लिखित भारतीय इतिहास की… Read more »

राष्ट्रीय चुनौतियों के मूल में बौद्धिक कारण

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साहित्य से ही निवारण मनोज ज्वाला आज अपने देश में जितनी भी तरह की समस्यायें और चुनैतियां विद्यमान हैं, उन सबका मूल कारण वस्तुतः बौद्धिक संभ्रम है , जो या तो अज्ञानतावश कायम है या अंग्रेजी मैकाले शिक्षा-पद्धति से निर्मित औपनिवेशिक सोच का परिणाम है अथवा वैश्विक महाशक्तियों के भारत-विरोधी साम्राज्यवादी षड्यंत्र का अंजाम ।… Read more »

भारतीय साहित्य में मार्क्सवादी वामपंथ,अर्थात ‘सफेद आतंक’

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मनोज ज्वाला भारतीय साहित्य ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ के वैचारिक-सांस्कृतिक अधिष्ठान पर खडा है । यह सत्य से सराबोर है , समस्त विश्व-वसुधा का कल्याण इसका उद्देश्य है तथा इसका स्वरुप सतत सुंदर है ; इस कारण यह सार्वकालिक व सार्वदेशिक ही नहीं , समस्त मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण एवं विविध विषयक चिन्तन-मनन से युक्त है… Read more »

 सत्ता-हस्तान्तरण की त्रासदी बनाम आजादी

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सिंगापुर में  नेहरू की ब्रिटिश-भक्ति का परीक्षण और दिल्ली में सत्ता-हस्तान्तरण की त्रासदी बनाम आजादी मनोज ज्वाला १४ अगस्त १९४७ की आधी रात को ब्रिटेन की महारानी के परनाती ने जब जवाहर लाल नेहरू के हाथों भारत की सत्ता हस्तान्तरित की थी , तब नेहरू न तो कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष थे और न  ही देश… Read more »

वैश्विक महाशक्तियों के निशाने पर भारत

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 मनोज ज्वाला भारत एक बहुत बडे वैश्विक षड्यंत्र के निशाने पर है । षड्यंत्र रचने और उसे क्रियान्वित करने वाले एक ऐसे वैश्विक संजाल (नेटवर्क) के निशाने पर है, जिसमें अनेकानेक संगठन-समूह , व्यक्ति विशेष के समूह और ईसाई-चर्च-समूह शामिल हैं । पश्चिमी दुनिया की ये धार्मिक-राजनीतिक विस्तारवादी शक्तियां वैसे तो पिछली दो-तीन शताब्दियों से… Read more »

सेक्युलर्टाइटिस के एक विषाणु के पंख झडे 

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किन्तु नरेन्द्र मोदी और भाजपाध्यक्ष अमित शाह की राजनीति को क्या कहा जाए ; ‘कूटनीति’ या ‘टूटनीति’ ? सच तो यह है कि राजनीति और कूटनीति के इन दोनों धुरन्धरों की युगलबन्दी से उत्त्पन्न भाजपाई ‘टूटनीति’ ने ही ‘सेक्युलर्टाइटिस’ के ‘विषाणुओं’ के आसमानी घरौंदे में भी जलती लुआठी घुसा कर उन्हें बिखरा देने में उल्लेखनीय सफलता पायी है । किन्तु सच यह भी है कि नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध लगातार पैंतराबाजी करते रहने वाले इस विषाणु के अभी केवल पंख ही झडे हैं , नख-दन्त जडे ही हैं यथावत ।

राष्ट्रपति के बजाय ‘राष्ट्राध्यक्ष’ हों राष्ट्र के प्रमुख

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मनोज ज्वाला भारतीय भाषाओं में ‘पति’ और ‘अध्यक्ष’ दो भिन्नार्थी शब्द हैं, समानार्थी तो कतई नहीं हैं । जबकि , अंग्रेजी का ‘प्रेसिडेण्ट’ शब्द भी पति का अर्थ प्रकट नहीं करता है , बल्कि इसका हिन्दी-अनुवाद है- ‘अध्यक्ष’ । किन्तु ‘राष्ट्राध्यक्ष’ अर्थात ‘प्रेसिडेण्ट आफ नेशन’ के लिए हिन्दी में इसे तभी से ‘राष्ट्रपति’ कहा जाने… Read more »

गोरे असुरों का भारत-अभियान अर्थात आधुनिक देवासुर संग्राम

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लूट-पाट को अपना पेशा बना चुके वे लोग उस तथाकथित ‘सभ्य समाज’ की राज-सत्ता और ‘रोमन-चर्च’ की धर्म-सत्ता के आतंक से भागे तो थे सभ्य-सम्पन्न बनने की मजबूरी में, किन्तु भागने से रिश्ता खत्म थोडे ही होता है । जिनके द्वारा भगाये गये थे, अथवा जिनसे दूर भागे थे, उन्हीं से सम्मान पाने की लालसा भी थी उनमें । इसलिए लूट और डकैती के माल का एक अंश वे उस ‘सभ्य-समाज’ के उन ‘सभ्य लोगों’ को भी देने लगे, जिनमें ‘वेटिकन’ के पोप एवं उसके चर्च के पादरी और ब्रिटिश राजमहल के राजा-रानी से लेकर दरबारी- लार्ड-जागीरदार तक शामिल थे ।