-पवन शुक्ला अधिवक्ता
भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस केवल एक राजनीतिक दल के गठन की तिथि नहीं है,बल्कि यह भारतीय राजनीति में वैचारिक दृढ़ता, राष्ट्रवाद और अंत्योदय के संकल्प की यात्रा का एक जीवंत दस्तावेज है।6 अप्रैल 1980 को जब दिल्ली के कोटला मैदान में भाजपा का उदय हुआ,तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं के साथ शुरू हुआ यह कारवां एक दिन विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित होगा।इस गौरवशाली इतिहास की जड़ें दरअसल भारतीय जनसंघ में निहित हैं, जिसकी स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में की थी।जनसंघ का मुख्य उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखना और तुष्टिकरण की राजनीति के विरुद्ध एक सशक्त राष्ट्रवादी विकल्प खड़ा करना था।
‘एक देश में दो विधान,दो
प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’
का नारा बुलंद करते हुए डॉ. मुखर्जी ने कश्मीर के पूर्ण विलय के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी,जो आज भी भाजपा के प्रत्येक कार्यकर्ता के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।
आपातकाल के काले कालखंड ने भारतीय लोकतंत्र को बचाने के लिए विभिन्न विचारधाराओं को एक मंच पर आने के लिए विवश किया,जिसके परिणामस्वरूप जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ। हालांकि,दोहरी सदस्यता के विवाद और वैचारिक मतभेदों के कारण वह प्रयोग अधिक समय तक सफल नहीं रह सका। इसी पृष्ठभूमि में अटल बिहारी वाजपेयी,लालकृष्ण आडवाणी और भैरों सिंह शेखावत जैसे दिग्गजों ने एक नई राह चुनी और भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी। उस समय मुंबई के उस ऐतिहासिक अधिवेशन में अटल जी ने भविष्यवाणी की थी कि “अंधेरा छटेगा,सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा।”
उनके ये शब्द मात्र एक भाषण का हिस्सा नहीं थे,बल्कि एक अटूट विश्वास का प्रतीक थे, जिसने आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल दी।
भाजपा की विकास यात्रा संघर्षों और सिद्धांतों के तालमेल की एक अद्भुत गाथा है।1984 के लोकसभा चुनावों में पार्टी केवल दो सीटों पर सिमट गई थी, लेकिन उस हार ने नेतृत्व के मनोबल को तोड़ने के बजाय उसे और अधिक मजबूती प्रदान की। पार्टी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से जनता के हृदय में अपनी जगह बनाई। सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने न केवल देश की राजनीति को ध्रुवीकृत किया,बल्कि आम जनमानस को अपनी सांस्कृतिक विरासत और गौरव से पुन: परिचित कराया। भाजपा ने यह सिद्ध किया कि वह केवल सत्ता के लिए राजनीति नहीं करती,बल्कि देश की अस्मिता और मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित है।इसी वैचारिक शुचिता का परिणाम था कि 1990 के दशक के अंत तक भाजपा केंद्र की सत्ता में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में देश ने पहली बार एक सफल गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार का अनुभव किया।
अटल जी के कार्यकाल के दौरान पोखरण परमाणु परीक्षण,स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और कारगिल युद्ध में विजय ने भारत को वैश्विक पटल पर एक नई पहचान दी।भाजपा ने दिखाया कि कैसे सुशासन और विकास के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता किए बिना देश को आगे ले जाया जा सकता है। 2014 का वर्ष भाजपा के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि जनता का उस व्यवस्था पर विश्वास था जो ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के मंत्र पर आधारित थी। प्रधानमंत्री मोदी के कालखंड में भाजपा ने अपने कोर एजेंडे को धरातल पर उतारा, जिसमें अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण, भव्य राम मंदिर का निर्माण और तीन तलाक जैसी कुरीतियों की समाप्ति शामिल है।
आज भाजपा केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं,बल्कि एक सामाजिक आंदोलन बन चुकी है।पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ के दर्शन को अपनाते हुए पार्टी ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के कल्याण को अपनी प्राथमिकता बनाया है।उज्ज्वला योजना,आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना और डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों ने करोड़ों भारतीयों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया है। संगठन की दृष्टि से भी भाजपा ने खुद को आधुनिक और तकनीकी रूप से इतना सुदृढ़ कर लिया है कि आज इसका विस्तार कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिनूर तक स्पष्ट दिखाई देता है।भाजपा का स्थापना दिवस प्रत्येक कार्यकर्ता को यह याद दिलाता है कि यह यात्रा व्यक्ति से बड़ी विचारधारा और विचारधारा से बड़ा राष्ट्र की भावना पर टिकी है।
इस गौरवशाली इतिहास का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि भाजपा ने अपनी जड़ों को कभी नहीं भुलाया।वह आज भी डॉ. मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों का भारत बनाने के लिए तत्पर है। कार्यकर्ताओं का त्याग, नेताओं का दूरदर्शी नेतृत्व और जनता का अपार प्रेम ही वह त्रिवेणी है जिसने भाजपा को अजेय बनाया है।स्थापना दिवस के अवसर पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें दिखाई देता है एक ऐसा सफर जो शहादत से शुरू हुआ, संघर्षों की आग में तपकर कुंदन बना और आज विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व कर रहा है। यह इतिहास आने वाली पीढ़ियों के लिए इस बात का प्रमाण रहेगा कि यदि संकल्प पवित्र हो और लक्ष्य राष्ट्रहित हो, तो कोई भी बाधा प्रगति के मार्ग को नहीं रोक सकती।भाजपा की यह यात्रा निरंतर जारी है, एक नए, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण के लिए, जहाँ प्रत्येक नागरिक गौरवान्वित महसूस कर सके।
पवन शुक्ला