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मानवता का खून (15 मई 1948)

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-फख़रे आलम-
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आज विश्व के सबसे सभ्य समुदाय ने अरब असभ्य जनजाति पर बर्बरता की हद पार कर दी। क्या समान्य नागरिक, क्या महिलाएं और क्या बच्चे। विश्व देख रहा है और दिखा भी रहा है कि मानवता तार तार हो रही है। और विश्व की सीय बिरादरी खूनी खेल को तमाशबीन की भांति मजे ले लेकर देख रही है। 15 मई 2014 को दोपहर और 24 जुलाई 2014 के मध्य मरने वाली की अध्किारिक सूचना 5 सौ से ऊपर है। मगर इस वर्वरता में कितने लोग मारे गये और कितने घायल हुये इसका अनुमान नहीं लगा सकते। इजराइल के द्वारा मानवता को शर्मशार कर देने वाली घटना है। 15 मई के मध्यान्तर में फिलिस्तीन के पश्चिमी शहर उरदून में चेतावनी का साइरन बजा, उस ध्यान आकर्षण में फिलिस्तीन की जनता को जताना था कि उनकी जनता पर अत्याचार और वर्वता के 66 वर्ष हो चुके हैं। 15 मई 1948 को इजराइल राष्ट्र के उदय की घोषणा के साथ इस प्रान्त के प्राचीन निवासियों के बुरे दिन आ गये और आज प्राचीन लोग अपने ही घर में कैद होकर रह गये। यह बदला दिया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में मानवता को मारने और सभ्यताओं को तबाह करने के लिये वायजमाइन नामक वैज्ञानिकों के द्वारा ब्रिटेन के लिये घाटत बम बनाने के लिये ब्रिटिश ने अपने उपनिवेशों में से पवित्र स्थान यहूदियों को दिेय, जहां पर विश्व के कोने-कोने से यहूदियों को लाकर बसाया जाने लगा और आज न केवल अमेरिका बल्कि विश्व बिरादरी की दिशा और दशा यहूदियों के हाथों है। तीन प्रतिशत की जनसंख्या वाला कौम विश्व को अपने हिसाब से राजनीति, आर्थिक और कूटनीति कर रहा है।

बड़ी संख्या में फिलीस्तीन जान बचाने के वास्ते पलायन कर गये और जो बच गये, वह अपनी जान बचाने के लिये संघर्ष कर रहे हैं। 66 वर्ष बीत गये कोई दिन ऐसा नहीं आया, जिसमें फिलीस्तीनियों ने अपने के शव नहीं उठाये हो, अथवा अपने मासूम बच्चों को नहीं दफनाया होगा। इजराइल अब उनकी जमीन पर न केवल अवैध कब्जा जमाये बैठा है। बल्कि फिलीस्तीनियों के जीवन का स्वामी भी बना बैठा है। इजराइल फिलीस्तीन पर हमला करने के लिये हमेशा से छोटे-छोटे विषय को बहाने के तौर पर लेता रहा है। वर्तमान हमले का कारण तीन यहूदी लड़कों का पहले अपहरण किया गया और उसके पश्चात् उनकी हत्या कर दी गई थी।

लड़के के अपहरण ओर हत्या के पीछे कौन लोग थे और उनकी हत्या किन शक्तियों के द्वारा की गई थी। बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे इजराइल ने जनसाधरण पर आक्रमण शुरू कर दिये। प्रथम यहूदियों ने एक बच्चे को जिन्दा जला डाला जिसके विरोध में गाजा क्षेत्रा में प्रदर्शन हुये और हम्मास ने इजराइल पर रॉकेट दागने शुरू कर दिये जो इजराइल हमेशा से हवा में मार गिराता रहा है। हम्मास के इस रॉकेट हमलों से इजराइल का तो कुछ नुकसान नहीं हुआ, अपितु इहराइल ने उत्तरी और दक्षिणी भागों में रहने वाले दस हजार से भी अधिक फिलीस्तीनियों को घर छोड़ने का आदेश दे गया और हवाई एवं जमीनी कार्य लगातार करता जा रहा है। विश्वभर के देशों में फिलीस्तीनियों के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं। सबसे विशाल प्रदर्शन लंदन में देखा गया। 2012 में जब इसी प्रकार की कार्यवायी गाजा में की थी तो मुस्लिम देशों की ओर से समर्थन और बड़ी भारी प्रतिक्रियाएं हुई थी। मगर इस बार न तो इरान की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई और न ही तुर्की की ओर से ही, शायद लीबिया में चल रहे गृह युद्ध और अमेरिका एवं ईरान के मध्य चल रहे शान्ति वार्ता के कारण ऐसा हुआ हो। वर्तमान हमलों को रोकने के लिये न तो अरब जगत तैयार है और न ही अन्तरराष्ट्रीय बिरादरी को कोई सरोकार है। वर्तमान और ताजा हमलों में लगभग छह सौ से अध्कि पिफलीस्तीनी मारे गये और तीन हजार से ऊपर लोग घायल हुये हैं। साथ ही साथ हजारों घर तबाह और बर्बाद कर दिय गय, हम्मास के हमलों में इजराइल के 27 सैनिकों के साथ कुल 29 नागरिक मारे गये हैं। वर्तमान स्थिति के लिये ब्रिटेन और फ्रांस की राजनीति जिम्मेदार हैं, जिसने इस क्षेत्र को रणभूमि बना दिया। रियल कोरी के इजराइली बूलडेजरों उस समय मार डाला था, जब वह अमेरिकन नागरिक 2003 में एक मुहल्ले को गिराने के विरोध में शान्तिपूर्वक प्रदर्शन कर रही थी। जो इन्टरनेशनल सोलडरी मॉनमेंट की बैनर तले फिलीस्तीनियों के लिये शान्तिपूर्ण लड़ाई लड़ती संस्थान है।

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  1. लेखक की सोच पूरी तरह एक पक्षीय और यहूदी इजराइल के विरुद्ध दिखाई पड़ती है.जो कुछ १५ मई १९४८ को हुआ उसके आगे और पीछे जो हुआ उसका भी थोड़ा सा अध्ययन कर लेते.डोमिनिक लेपियरे और लेरी कोलिन्स के उपन्यासात्मक विवरण “ओ, जेरुसलम” में इसका बहुत ही ग्राफिक चित्रण किया गया है. इससे पूर्व लगभग दो हज़ार वर्षों तक शेष सारी दुनिया के देशों में यहूदियों को शरणार्थी के रूप में रहना पड़ा था और भारत को छोड़कर हर देश में उनके साथ हर प्रकार के अत्याचार किये गए.भारत एकमात्र अपवाद था जहाँ उन्हें न तो भेदभाव और न ही उत्पीड़न का सामना करना पड़ा हो.स्वयं लेरी कोलिन्स ने मुझे पत्र लिखकर इसकी पुष्टि की थी. १९१४ में जब उन्होंने पुनः अपने खोये हुए देश को पाने का प्रयास आरम्भ किया तो भी उन्हें लगभग तीन दशकों से अधिक अपने अधिकारों को स्वीकार कराने में लगे. और एक बार यहूदी देश इजरायल की स्थापना के बाद भी सम्पूर्ण अरब जगत उन्हें मिटा देने पर आमादा था.आज भी अनेकों देश और संगठन उनके अस्तित्व को मिटाने के लिए प्रयास रत हैं. ऐसे में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए इजरायल द्वारा ईंट का जवाब पत्थर से देने और अपने हितों की रक्षा के लिए प्रि-एम्पटिव कार्यवाही करने के कारण वो अभी तक बचा हुआ है.आज गाज़ा में जो संघर्ष चल रहा है उसकी तो निंदा की जा रही है और भारत के अनेकों नगरों में एक समुदाय द्वारा इजरायल के विरुद्ध प्रदर्शन और पुतले फूंकने का कार्य किया जा रहा है जिससे अंततोगत्वा स्थानीय हिन्दुओं को ही नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि इजरायल के विरुद्ध तो कुछ भी करना इनके वश में नहीं है लेकिन हिन्दुओं को नुकसान पहुंचा कर अपनी खुन्नस निकाल लेते हैं जिससे देश में माहौल ख़राब हो रहा है.लेखक भी एक पक्षीय लेखन द्वारा उसी आग में घी डालने का ही काम कर रहे हैं जो उचित नहीं है.लेखक ने भी ये तो माना है की संघर्ष की वर्तमान शुरुआत तीन यहूदी लड़कों के अपहरण और हत्या से हुई है.लेकिन इसके लिए हमास को साफ़ तौर पर निर्दोष मान लिया गया है.२९ यहूदी मारे गए हैं तो क्या संघर्ष में जवाबी कार्यवाही में गिनकर बदला लिया जाता है? अगर जान जाने का इतना डर है तो पंगा क्यों लिया था?

  2. यदि छोडे़ गये फिलिस्तीनी रौकटों से इज़राईल का कोई नुकसान नहीं हुआ तो वह इस लिये नहीं कि वह कर नहीं सकते थे अथवा करने के लिये छोडे़ नहीं गये थे प्रत्युत इस लिये कि इज़राईल ने उन्हें मार्ग में ही ध्वस्त कर दिया था। यदि वह ऐसा न कर पाये होते तो जो विनाश हुआ होता, जो विनाश उन्हों ने मचाया होता, वह सहज अनुमेय है।

    क्या आपकी दृष्टि में इज़रईल को अपनी सुरक्षा में जवाबी कार्यवाही करने का भी अधिकार नहीं?

    फख़रे आलम साहिब को फिलिस्तीनी रक्त तो दिखायी दे जाता है/ दिख जाता है – इज़राईली रक्त नहीं दिखता। क्या उनका रक्त रक्त नहीं पानी है?

    हमास उनपर रौकेट न दागे और तब भी वह फा़यर करें तब तो दोषी कहे जा सकते हैं। दो दो सहस्र रौकेट फा़यर करने पर नहीं।

    डा० रणजीत सिंह

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