ओंकारेश्वर पांडेय
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है – “लिव-इन रिलेशनशिप से बाहर निकलना कोई अपराध नहीं है।” 28 अप्रैल, 2026 को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और उज्जल भूयान की पीठ ने एक महिला की याचिका खारिज करते हुए कहा कि 15 साल के सहमति आधारित संबंध के बाद अलग हो जाना यौन उत्पीड़न या धोखाधड़ी की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने बच्चे के भरण-पोषण का रास्ता खुला रखा, लेकिन “रिश्ता तोड़ने” को दंडनीय अपराध बनाने से साफ इनकार कर दिया।
“एक बार जब वह (साथी) संबंध छोड़कर चला जाता है तो यह आपराधिक अपराध नहीं है।”
यह एक ऐतिहासिक सीमारेखा है जो भावनाओं और कानून के बीच की दूरी साफ करती है।
UCC से तुलना: टकराव नहीं, समन्वय
बहुत से लोग पूछ रहे हैं – क्या उत्तराखंड का UCC (एकसमान नागरिक संहिता) इस फैसले से उलट है? उत्तर है: बिल्कुल नहीं।
उत्तराखंड UCC (जनवरी 2025 से प्रभावी) की धारा 385 साफ कहती है कि “दोनों साथी… समाप्ति का बयान रजिस्ट्रार को दे सकते हैं।” यह केवल सूचना देने की प्रक्रिया है – अपराध नहीं। सजा (6 माह जेल, ₹25,000 जुर्माना) केवल पंजीकरण न कराने पर है, संबंध तोड़ने पर नहीं।
इसलिए UCC और सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक दिशा में हैं – दोनों ही लिव-इन को वैध मानते हैं, बच्चों के अधिकार सुरक्षित करते हैं और बिना अपराध बनाए रिश्ते से बाहर निकलने की छूट देते हैं।
डेटा और रुझान (Trends): युवा क्या कर रहे हैं?
हाल के अध्ययन और रिपोर्ट बताते हैं कि भारत के शहरी और अर्ध-शहरी युवाओं में लिव-इन तेजी से बढ़ रहा है:
पहलू आंकड़ा / रुझान
लिव-इन में वृद्धि पिछले 5 वर्षों में महानगरों (दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु) में लगभग 35-40% की वृद्धि (विभिन्न सोशल ट्रेंड सर्वेक्षणों के अनुसार)
युवाओं की पसंद 23-30 वर्ष के 52% शिक्षित युवक-युवतियाँ शादी से पहले साथ रहकर देखना पसंद करते हैं (लव इंडिया सर्वे, 2024)
UCC के प्रति जागरूकता उत्तराखंड में 68% युवाओं ने कहा कि “पंजीकरण अनिवार्य होना चाहिए लेकिन ब्रेकअप पर सजा बर्दाश्त नहीं” (स्थानीय मीडिया पोल)
कानूनी मामले लिव-इन के बाद ब्रेकअप पर “रेप” या “धोखाधड़ी” के मुकदमे पिछले 3 वर्षों में लगभग 22% बढ़े थे – जिनका यह फैसला रास्ता रोकता है
युवाओं और आज़ादी पर प्रभाव
यह फैसला सिर्फ एक कानूनी टिप्पणी नहीं है – यह हर उस युवा के लिए राहत की साँस है जो डर के बिना जीना चाहता है।
1. डर मुक्त ब्रेकअप: अब कोई भी अपने साथी को “जेल भेजने” की धमकी नहीं दे सकता सिर्फ इसलिए कि रिश्ता टूट गया। यह युवाओं को मानसिक शोषण से बचाता है।
2. स्वतंत्रता का सम्मान: कानून कहता है – आप सहमति दे सकते हैं, और सहमति वापस भी ले सकते हैं। यह वयस्क संबंधों की बुनियाद है।
3. रजिस्ट्रेशन को बढ़ावा: अब युवा बिना झिझक UCC के तहत लिव-इन रजिस्टर करवाएँगे, क्योंकि वे जानते हैं – रजिस्ट्रेशन का मतलब गुलामी नहीं है।
4. बच्चों के अधिकार अलग, रिश्ता तोड़ना अलग: कोर्ट ने स्पष्ट किया है – बच्चे के भरण-पोषण का दावा अलग से किया जा सकता है। यह महिलाओं और बच्चों दोनों की सुरक्षा करता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य: भारत कहाँ खड़ा है?
भारत का यह फैसला अकेला नहीं है। दुनिया के विकसित लोकतंत्र लंबे समय से लिव-इन को अपराध की श्रेणी से बाहर रखते हैं। आइए तुलना करें:
देश/क्षेत्र कानूनी व्यवस्था ब्रेकअप पर दंड? खासियत
भारत (सुप्रीम कोर्ट, 2026) लिव-इन वैध, ब्रेकअप गैर-आपराधिक नहीं केवल बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार, कोई जेमानत नहीं
गोवा (पुराना सिविल कोड) पुर्तगाली सिविल कोड (1867) पर आधारित नहीं पंजीकरण ज़रूरी, लेकिन ब्रेकअप पर कोई सज़ा नहीं — यही मॉडल उत्तराखंड UCC ने अपनाया
ऑस्ट्रेलिया De facto relationships (पारिवारिक कानून अधिनियम, 1975) नहीं 2 वर्ष साथ रहने पर संपत्ति और भरण-पोषण के अधिकार; ब्रेकअप सिविल मामला
कनाडा Common-law status (प्रांत अनुसार, आमतौर पर 2-3 वर्ष) नहीं 3 वर्ष के बाद पति-पत्नी जैसे अधिकार, लेकिन बिना अपराधीकरण के अलग हो सकते हैं
यूके कोई विशेष लिव-इन कानून, अनुबंधों पर निर्भरता नहीं लचीला मॉडल; अदालतें व्यक्तिगत मामलों का समाधान करती हैं
महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
· गोवा का सिविल कोड (भारत में ही) दशकों से लिव-इन को पहचानता है, बिना ब्रेकअप को अपराध बनाए। यही पैटर्न उत्तराखंड UCC और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दिखता है। अतः यह बिल्कुल स्पष्ट है कि UCC और SC फैसले में कोई टकराव नहीं है – दोनों गोवा के प्रगतिशील मॉडल पर चल रहे हैं।
· ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में भी “ब्रेकअप” का कोई दंड नहीं है। वहाँ ध्यान पंजीकरण, संपत्ति बंटवारे और बच्चों के अधिकारों पर है – ठीक वैसे ही जैसे भारत का नया फैसला कहता है।
· अंतर: पश्चिमी देशों में 2-3 वर्ष के साथ रहने के बाद स्वचालित रूप से वैवाहिक अधिकार मिल जाते हैं। भारत अभी उस स्तर पर नहीं है लेकिन यह फैसला उस दिशा में पहला बड़ा कदम है।
भारतीय विशेषता – “मैरिज-लाइक रिलेशनशिप”
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने तुलसा बनाम दुर्घटिया (2008) से ही “मैरिज-लाइक रिलेशनशिप” (शादी जैसा रिश्ता) को DV अधिनियम के तहत सुरक्षा दी है। नए फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सुरक्षा ब्रेकअप को अपराध बनाने का लाइसेंस नहीं है।
तुलना का सार: यदि ऑस्ट्रेलिया और कनाडा सभ्य समाज हैं जहाँ लोग बिना डर के अलग हो सकते हैं तो भारत भी वही रास्ता अपना रहा है। गोवा पहले से है, SC अब और मजबूत कर रहा है, और UCC इसी लकीर पर चलता है।
अंतिम विचार
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साबित कर दिया है – भारत का युवा किसी से कम नहीं है। चाहे गोवा का सिविल कोड हो, ऑस्ट्रेलिया का डी फैक्टो कानून, या कनाडा का कॉमन-ला स्टेटस – हर जगह यही सिद्धांत है:
“वयस्कों का सहमति आधारित संबंध कानूनी सुरक्षा पाने का अधिकारी है लेकिन उसके टूटने को अपराध की कोठरी में नहीं ठूंसा जा सकता।”
UCC (चाहे उत्तराखंड का हो या भविष्य का राष्ट्रीय) इसी दिशा में भारत को ले जाने वाला है – एक आधुनिक, प्रेम को मान्यता देने वाला लेकिन ब्रेकअप को आज़ादी देने वाला कानून।
यह फैसला आज़ादी का एक और पहरेदार है – हर उस युवा के लिए जो डर के बिना प्यार करना चाहता है, और आवश्यकता पड़ने पर डर के बिना अलग होना चाहता है।
ओंकारेश्वर पांडेय