बुद्ध जयंती पर विशेष- धर्म की नई भूमिका की तलाश

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

बौद्ध धर्म के बारे में अनेक मिथ हैं इनमें एक मिथ है कि यह शांति का धर्म है।गरीबों का धर्म है। इसमें समानता है। सच इन बातों की पुष्टि नहीं करता। आधुनिककाल में श्रीलंका में जातीय हिसा का जिस तरह बर्बर रूप हमें तमिल और सिंहलियों के बीच में देखने को मिला है। चीन, बर्मा,कम्बोडिया आदि देशों में जो हिंसाचार देखने में आया है उससे यह बात पुष्ट नहीं होती कि बौद्ध धर्म शांति का धर्म है। बौद्ध धर्म के प्रति आज (अन्य धर्मों के प्रति भी) सारी दुनिया में इजारेदार पूंजीपतियों और अमीरों में जबरदस्त अपील है। इसका प्रधान कारण है बौद्ध धर्म में आरंभ से ही अमीरों की प्रभावशाली उपस्थिति। एच.ओल्डेनबर्ग ने “बुद्धः हिज लाइफ ,हिज टीचिंग्स,हिज आर्डर” ( 1927) में लिखा है कि बुद्ध को घेरे रखने वाले वास्तविक लोगों और प्रारंभिक धर्माचार्यों में जो लोग थे उन्हें देखने से प्रतीत होता है कि समानता के सिद्धान्त का पालन नहीं होता था।प्राचीन बुद्ध धर्म में कुलीन व्यक्तियों के प्रति विशेष झुकाव बना हुआ प्रतीत होता है जो अतीत की देन था।

धर्म का प्रचार करने वाले विश्व के प्रथम प्रचारक तापस और भल्लिक व्यापारी वर्ग से थे। बनारस में उपदेश देने के बाद बुद्ध में आस्था रखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ। बाद में संघ में आने वाला दूसरा व्यक्ति यसं था। जो बनारस के सम्पन्न परिवार का सदस्य था। उसके माता-पिता, बहिन आदि भी बौद्ध धर्म में आ गए। इसी यस के बहुत से मित्र व्यवसायी और परिचित,पड़ोसी आदि भी शामिल हुए।ओल्डनहर्ग ने विस्तार के साथ उन तमाम लोगों की जानकारी दी है जो सम्पन्न परिवारों से आते थे या राजा थे। इनमें मगध नरेश बिंबसार का नाम प्रमुख है।

 

महात्मा बुद्ध ने धर्म और धार्मिकपंथों में व्याप्त जातिभेद को चुनौती देते हुए अपने पंथ का मार्ग निचली या अन्त्यज जातियों के लिए खोला था। इससे इन जातियों में जबर्दस्त आकर्षण पैदा हुआ। बुद्ध के संघ के महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक था उपालि जो संघ के नियमों के अनुसार गौतम के पश्चात प्रमुख पद पर आसीन हुए था। वह पहले नाई था। उसके व्यवसाय को घृणित व्यवसायों में गिना जाता था। इसी प्रकार सुनीत भी एक नीची जनजाति ‘पुक्कुस’ से आया था ,जबकि वह उन बंधुओं की श्रेणी में था ,जिनकी रचना,थेरगाथा में सम्मिलित करने के लिए चुनी गई थीं। जबरदस्त नास्तिकता का प्रचारक सती नामक व्यक्ति धीवर जाति का था। नंद ग्वाला था। दो पंथक, एक कुलीन परिवार की अविवाहित कन्या के किसी दास के साथ यौन संबंधों की देन था। चापा नामक लड़की एक शिकारी की पुत्री थी। पुन्ना और पुन्निका दास पुत्रियां थीं। सुमंगलमाता सनीठे के वनों में काम करने वाले लोगों की पुत्री और पत्नी थी। सुभा एक लौहार की बेटी थी। इस तरह के असंख्य उदाहरण भरे पड़े हैं। यही कारण है महात्मा बुद्ध ने बड़े पैमाने पर अंत्यजों-वंचितों और अछूतों को अपनी ओर खींचा और उन्हें सामाजिक अलगाव और वंचना से मुक्ति दी। हिन्दू धर्म ऐसा करने में असफल रहा।

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने ”बुद्ध और उसके धर्म की भवितव्यता” शीर्षक से एक लेख लिखा है । यह लेख महाबोधि संस्था के मासिक में 1950 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने संक्षेप में अपने नजरिए से बौद्ध धर्म के विचारों को व्यक्त किया है। उन्होंने लिखा- (1) समाज की स्थिरता के लिए कानून या नीति का आधार अवश्यंभावी है। इनमें किसी भी एक के अभाव में समाज निश्चय ही तितर-बितर हो जाएगा। अगर धर्म का अस्तित्व चलते रहना है तो उसका बुद्धि प्रामाण्यवादी होना आवश्यक है। विज्ञान बुद्धि प्रामाण्यवाद का दूसरा नाम है। (3) धर्म के लिए यह काफी नहीं है कि वह केवल नैतिक संहिता बने। धर्म की नैतिक संहिता को स्वतंत्रता ,समता,बंधुता -इन मबलभूत तत्वों को स्वीकृति देनी चाहिए। (4) धर्म के कारण दरिद्रता को पवित्र न मानें और उसे उदात्त रूप भी न दें।

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