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    2050 तक भारत में कोई अपनी भाषा नहीं बोलेगा।


    राहुल देव

    दिनांक 15 अप्रैल 2017 को गोरेगांव मुंबई में दीनदयाल समाज सेवा केंद्र द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के लिए उत्तर प्रदेश के तत्काल माननीय राज्यपाल मा. राम नाईक जी विशेष रूप से मुंबई पधारे थे। व्याख्यानमाला के प्रथम पुष्प के अंतर्गत वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक राहुल देव जी गरूग्राम से पधारे थे। इस अवसर पर मुंबई के कई भारतीय भाषा समर्थक भी वहाँ पहुंचे थे । इस अवसर पर ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ के निदेशक डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ सहित कई भारतीय भाषा-प्रमियों ने देश-प्रदेश की भाषा के संबंध में चर्चा की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक राहुल देव ने खुले मैदान में उपस्थित भारी भीड़ के बीच ‘भारतीय भाषाओं से भारत की प्रगति’ विषय पर झकझोरने वाला व्याख्यान दिया था।

    हजारों वर्षों से भारतीयता का निर्माण किया गया है। जिन भाषाओं के माध्यम से उस वाङ्मय का निर्माण किया गया है उन भाषाओं के अस्तित्व पर ही संकट है। बात तो इन भाषाओं को आगे बढ़ाने की थी लेकिन हालत यह है कि अब बचाने की स्थिति आ गई है। कुछ लोग आशावादी बनकर ऐसे खतरों से बेपरवाह रहते हैं। सच तो यह है कि जो डरते हैं, वही बचते हैं। जरूरत इस बात की है कि खतरों को पहचानें और निडरता से उनका सामना करें। जो खतरों को पहचानते ही नहीं वे उनका सामना क्या करेंगे ?

    उन्होंने उपस्थित श्रोताओं से पूछा, ‘क्या आपके बच्चों के बच्चे अपना महत्वपूर्ण कार्य मराठी में करेंगे? क्या वे मराठी माध्यम से पढ़ेंगे? क्या वे मराठी में कर पाएंगे? क्या वे करना चाहेंगे? बिना मराठी कैसा होगा महाराष्ट्र? अगर हालत यही रही तो मराठी नहीं बचने वाली। यही स्थिति 19 – 20 के अंतर से सभी भारतीय भाषाओं के साथ है । सबसे खराब हालत तो हिंदी की है । 2050 के आसपास अन्य भाषाओं की भी ऐसी ही स्थिति होनी है। उन्होंने कहा, ‘आज जब हमारी आंखों के सामने ऐसे हालात हैं तो 2050 के भारत में कोई अपनी भाषा नहीं बोलेगा, भले ही भारत महाशक्ति हो चुका हो। तब सोचिए कैसा होगा भारत ? भारत की करीब 300 भाषाएं हैं। दुनिया में 6000 में से 3,000 के लुप्त होने की आशंका है । भारत की भी 10 या 20 भाषाएं ही बचेंगी।‘

    उन्होंने देश को सजग करते हुए कहा – ‘हमारी भाषाओं का विषय हमारे सामने खड़ा है। भाषाएँ जीवित चीजें हैं। लेकिन भाषाओं का मरना हमारे मरने जैसा नहीं होता। भाषा में हम नहीं तो हमारे बच्चे,ऐसे ही चलता है। लेकिन भाषा और शब्दों की मृत्यु नि:शब्द होती है। आप पाएँगे कि हमारे और हमारे बच्चों के जीवन में से एक-एक कर शब्द निकल रहा है। एक बहुत बड़ा भ्रम यह है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम होती है। जैसे माँ के शरीर से हमारा शरीर है, वैसे ही हमारा अंतः शरीर भाषा के परिवेश में गढ़ा जाता है। हमारी भाषा हमारे ‘स्व’ की मर्मस्थल होती है। भाषा बदलती है तो हमारी समग्र चेतना बदल जाती है। स्वाद, दृष्टि, जीवन दृष्टि, सृष्टि को देखने, सुख-दुख, सपने महत्वाकांक्षाएं, जीवन-शैली, जीवन-पद्धति, संस्कार सब कुछ बदल जाता है। और हमारे परिवारों में आए दिन यह घटित हो रहा है। केवल स्वयँ को ही नहीं, बल्कि भविष्य को भी देखें। आप बच्चों को देखिए भाषा के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व व विचारों में भी बड़ा अंतर आ रहा है।’

    साहित्य से भाषा को बचाने का मिथक हालने पर उहोंने कहा -‘यहां यह बात गौर करने वाली है कि साहित्य (कहानी कविता उपन्यास वगैरह ) भाषा को बढ़ाता तो है, भाषा को मांजता भी है, लेकिन उसे बचाता नहीं है। इसलिए जो ऐसा सोचते हैं कि केवल ललित साहित्य से भाषा बच जाएगी तो उन्हें इस पर विचार करने की जरूरत है।’

    आर्थिक प्रगति से भाषा को जोड़ते हुए उन्होंने कहा – ‘अगर भाषा और आर्थिक प्रगति की बात करें तो हमें पाते हैं कि पहली ईस्वी में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 70 से 80% तक था । गुप्तकाल में यह शीर्ष पर था। 1000 ईस्वी तक यह 50% पर आ गया । कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ता एंगस मेडिसन के अनुसार 1700 ईस्वी में भारत का विदेश व्यापार 26 प्रतिशत था जो घटते-घटते 1947 तक 35% और 1991 में मात्र 1% था। अब हमारा लक्ष्य इसे बढ़ाकर 2 से 3% ले जाने का है । सोचिए कहां से कहां आ गए । हम अंग्रेजियत की तरफ जाते रहे और विकास से नीचे की तरफ आते रहे।‘

    आगे उन्होंने कहा, ‘इस बात पर भी गौर करने की जरूरत है कि भारत में 5 से 6% तक प्रतिभावान विद्यार्थी अंग्रेजी न जानने के कारण या उससे अपमानित होने के कारण पिछड़ने के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। लाखों लोग अंग्रेजी के दबाव और आतंक से दबते हैं त्रस्त हैं। लेकिन फिर भी हम विचार तक नहीं करते। सबसे बड़ी ताकत है प्रतिभा, परिश्रम, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और आत्मबोध। अंग्रेजी न जानने के कारण देश की 90% से अधिक बच्चों का आत्मविश्वास आत्मबोध व आत्मसम्मान तिल-तिल कर मरता है। इसकी आर्थिक कीमत क्या है ? सूचना प्रद्योगिकी यानी IT को लेकर भारत को बड़ा महान है जिससे करीब 40 लाख लोगों का रोजगार है। अगर इसे 7 करोड़ लोगों की प्रतिभा का लाभ अगर मिले तो चमत्कार हो जाएगा।’

    वे कहते है, ‘हमें भारत बनना है कि इंडिया बनना है यह तय करना है। अब तो यह स्थिति है कि हमारे बड़े बड़े माननीयों के मुंह से भी ‘भारत’ नहीं निकलता ‘इंडिया’ निकलता है। भारत अब कम सुनाई पड़ता है। हमारा मीडिया शायद इसमें सबसे बड़ा दोषी है वह लोगों को एक ऐसी भाषा का अभ्यस्त बना रहा है जो न हिंदी है न अंग्रेजी, जो न मराठी न हिंदी है। मराठी में तो फिर भी ठीक है, हिंदी में तो मैं आपको बता ही नहीं सकता कि क्या स्थिति है। ‘हमारा हिंदी मीडिया और हिंदी के माध्यम हिंदी की दैनिक हत्या कर रहे हैं।‘ और कोई शब्द नहीं है।

    स्वतंत्रता को परिभाषित करते हुए राहुल देव कहते हैं ‘यह भी स्पष्ट है कि हम राजनीतिक रूप से प्रभुसत्ता संपन्न हैं, स्वतंत्र हैं लेकिन हमारी निर्भरता पश्चिम पर बहुत गहरी है। तकनीक यानी टेक्नोलॉजी के लिए हम उन पर बहुत निर्भर है। आधुनिक ज्ञान के लिए निर्भर हैं हमारे विद्यार्थियों को महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में जो पढ़ाया जाता है उन सब विषयों के अद्यतन ज्ञान के लिए हम उन पर निर्भर हैं । शैक्षिक निर्भरता है, आर्थिक निर्भरता है, तकनीकी निर्भरता है, बौद्धिक निर्भरता है, वैज्ञानिक निर्भरता है तो फिर स्वतंत्रता का मतलब क्या है? संप्रभुता किसे कहते हैं? संप्रभुता उसे कहते हैं, जहाँ हम अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के आलोक में अपने बौद्धिक पैरों पर खड़े होकर, अपने सांस्कृतिक पैरों पर खड़े होकर अपने भविष्य का निर्माण करें, वह स्वराज हुआ। संपूर्ण स्वराज, सर्वांगीण स्वराज। अभी तो अधूरा है स्वराज।’

    न्याय-व्यवस्था के संबंध में वे कहते हैं- ‘मेरे जीवन और मृत्यु का फैसला होने वाला हो और मेरे संबंध में मेरी ओर से वकील जिस भाषा में बात कर रहा है, वह मुझे समझ नहीं आती । हमारे उच्च न्यायालयों में, हमारे सर्वोच्च न्यायालय में, पूरी न्यायिक प्रक्रिया में, निम्नतम अदालतों को छोड़ कर 90% जनता की कोई सहभागिता नहीं है। सारा प्रशासनिक-विमर्श, आर्थिक-विमर्श, सारा उच्चतर विमर्श हर क्षेत्र में 10% या 5% लोगों के हाथ में है। कुल 8 या 9 करोड़ लोगों का समूचा अंग्रेजी का संसार है। बाकी के भारतीयों का क्या होगा ? उनकी प्रतिभा का उनकी इच्छाओं का क्या ? इस पूरे लोकतंत्र में उनकी सहभागिता है क्या ? 5 साल में एक बार वोट देने के अलावा? वह संपूर्ण सहभागिता तब होगी जब पूर्ण राज – प्रक्रिया, न्याय – प्रक्रिया, प्रशासन – प्रक्रिया, सब प्रक्रियाएं उनकी अपनी भाषा में होगी। अभी तो यह व्यवस्था उन्हें पराया करती है। शीशे का दरवाजा है, जिसके भीतर उन्हें प्रवेश नहीं मिलता । मित्रो, ये कुछ बड़े प्रश्न में आपके सामने रख रहा हूँ। भारत की आर्थिक-प्रगति, बौद्धिक-प्रगति, अगर हमें भारत के रूप में करनी है तो उसकी भाषाओं को बचाना होगा और जिस दिन हर भारतीय को अपनी भाषा में अपना उच्चतम विकास और भविष्य गढ़ने का अधिकार और अवसर मिल जाएगा चमत्कार हो जाएगा। अपनी भाषा में अपना उच्चतम विकास और भविष्य गढ़ने अधिकार और अवसर।’

    भारत की प्रगति को, आर्थिक प्रगति को और हर तरह की प्रगति को 10% लोगों तक सीमित रखना है या उसे शत-प्रतिशत करना है। अगर भविष्य निर्माण में शेष 90% को भी सहभागी बनाना है, उनकी ऊर्जा को भी शामिल करना है तो हमारी और आपकी पीढ़ी को आज यह फैसला करना होगा। और इसकी शुरुआत है- प्राथमिक शिक्षा से । प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषाओं को बचाना, रोकना और उन्हें बेदखल होने से बचाना लड़ाई का पहला मोर्चा है, पहला कदम है ।

    उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नर्सरी से अंग्रेजी शिक्षण अनिवार्य करने के निर्णय पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, ‘रामभाऊ जी (उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल माननीय राम नाईक जी) यहाँ हैं। उनके सामने दुख के साथ यह कहना चाहता हूं कि अभी एक फैसला हुआ है इस देश में जो बहुत बहुत घातक होगा कल उत्तर प्रदेश सरकार ने नर्सरी से अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी शिक्षा का आदेश जारी कर दिया इस देश में अंग्रेजी तो क्या मराठी पढ़ाने वाले भी अच्छे शिक्षक नहीं हैं । उनका स्तर क्या है ? आप जानते होंगे । जब तक उत्तर प्रदेश की एक करोड़ बच्चों को हर वर्ष अंग्रेजी पढ़ानी होगी तो तो शिक्षक कहां से आएँगे? बिल्कुल पराई भाषा। जो लोग शिक्षा से जुड़े यहां पर हैं, वे कल्पना करेंगे कि क्या होने वाला है? उन बच्चों के साथ कैसी बौद्धिक हिंसा होने वाली है? और इसके जो व्यापक परिणाम हैं, वह मैं आपके सामने रख चुका हूँ, यह फैसला तो हो गया है। अब मैं इस बात को क्षमा सहित ‘राष्ट्रीय मूर्खता’ के अलावा कुछ नहीं कह सकता। क्योंकि इस देश में सबके मन में यह बैठ गया है कि उन्हें जन्म से ही अंग्रेजी नहीं तो वे पिछड़ जाएंगे। ऐसा बिल्कुल नहीं है। पहले वे अपनी भाषा में पढ़ें तो फिर सारे विषयों और अन्य भाषाओं को सीखने में उनकी क्षमता बेहतर होती है, यह भी शिक्षाविद् कहते हैं ।

    मनुष्य स्वभाव से बहुभाषी है। अंग्रेजी किसी भी उम्र में कभी भी सीखी जा सकती है, कोई भी भाषा सीखी जा सकती है। लेकिन एक नई भाषा को सीखने की एक उम्र होती है बच्चे के बौद्धिक विकास की नीव उसकी मातृभाषा में रखी जाती है. दुनिया के विकसित देश यही करते हैं । दुनिया में वे 20 देशों की आर्थिक प्रगति में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सबसे आगे हैं उनमें केवल चार में अंग्रेजी है बाकी सब ने अपनी सारी प्रगति अपनी-अपनी भाषाओं में ही की है । अब भारत को यह तय करना है कि उसे भारत बन कर आगे बढ़ना है या इंडिया बनकर आगे बढ़ना है । हमारे कारीगरों को हमारे किसानों को हमारे करेगा हमारे बुनकरों को हमारे हाथ से काम करने वाले उन सबको उन्हें अंग्रेजी की निर्भरता से हटकर, अंग्रेजी जो उन्हें दिन बनाती है उस से हटकर उनके बच्चों को अपनी भाषा में पूरे गौरव और पूरे सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा तब दुनिया को पता लगेगा कि भारत क्या है ? वह भारत हम देख सकें, मैं समझता हूँ, इस प्रार्थना में आप सब भी मेरे साथ शामिल होंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद ।

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