More
    Homeराजनीतिचाय वाले से लाल किले की प्राचीर तक

    चाय वाले से लाल किले की प्राचीर तक

    -वीरेन्द्र सिंह परिहार-

    modi2

    हमारे शास्त्र कहते हैं –
    संगच्छध्वं संवदध्वं स वो मनासि जानताम।
    देवा भागे यथा पूर्वे संजानानामुपासते।।

    अर्थात हम सभी मिलकर चले, सभी एक स्वर में बोले तथा सभी समान मन वाले होकर विचार करें। जैसा कि प्राचीन समय में देवता स्वयं किया करते थे। बतौर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त ‘स्वतंत्रता दिवस’ के उपलक्ष में राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राष्ट्र के सभी जनों को उसी भावना के तहत एक साथ चले, एक साथ सोंचे, एक साथ प्रतिबद्ध होकर आपसी सहमति से कार्य करने की अपेक्षा करते हैं। उन्होंने बहुत साफ शब्दों में घोषणा की, कि लाल किले की यह प्राचीर राजनीति का नहीं, वरन् राष्ट्रनीति का मंच है। उनका आशय स्पष्ट था कि देश को सत्ता-राजनीति की नहीं वरन राष्ट्रनीति जिससे राष्ट्र का निर्माण हो सके, ऐसी नीतियों की जरूरत है। उनका आशय स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति या खानदान तो दूर की बात है, पार्टी या संगठन की तुलना में हमारी प्राथमिकता में राष्ट्र होना चाहिए। श्री मोदी ने इस अवसर पर देश की बुनियादी बीमारी पर हमला किया। उन्होंने कहा कि हमारी सोच ऐसी हो गई है कि मेरा क्या, मुझे क्या? कहने का आशय यह है कि कोई काम करने के पूर्व हम देखते है कि क्या इस कार्य को करने से मेरा कोई स्वार्थ सिद्ध होता है? यदि ऐसा नहीं तो उस कार्य को करने में हमारी कोई रूचि नहीं होती, चाहे वह व्यापक सामाजिक हित में ही क्यों न हो? इस तरह से वह शताब्दियों से चली आ रही व्यक्तिवादी अवधारणा पर जो हमारे पिछड़ेपन और पतन का मूल कारण है, उसके मर्म पर चोट करते हैं। इस तरह से वह हमारी सोच सामाजिक, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हो, इसका प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं, लोगों में व्याप्त इस धारणा का, ‘‘सब होता है, सब चलता है’’, से देश नहीं चलता-कहकर सावधान कर रहे हैं। देश की आजादी के बाद क्रमशः जैसे-जैसे राजनीति में गिरावट आती गई और वह जनसेवा की तुलना में स्वसेवा का माध्यम बनती गई, वैसे-वैसे ही समाज-जीवन में यह गिरावट देखने को मिली। कहने का आशय यह कि जब संविधान की शपथ लेने वालों ने अपने हित में संविधान विरोधी भावना से काम करना शुरू कर दिया, तब नौकरशाह और आम आदमी तक कानूनों की, नियमों की, व्यवस्था की, मर्यादा की परवाह करना छोड़ दिये। जैसा कि गीता में कृष्ण ने कहा- ‘बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं, आम व्यक्ति, उसी का अनुसरण करते हैं।’ इस तरह से जब सत्ता में बैठे और दूसरे राजनीतिज्ञों ने भी अपना मतलब साधने, सातवीं पीढ़ी तक की चिंता की और नियम-कायदे तो दूर की बात है, संवैधानिक व्यस्थाओं तक को किनारे कर दिया। तो आम आदमी के लिए भी सब होता है, सब चलता है, आदर्श वाक्य बन गया। लेकिन मोदी कह रहे है, कि अब यह चलने वाला नही, चलना भी नहीं चाहिए। क्योंकि अब लूट और अराजकता का दौर नहीं, सुशासन का दौर शुरू हो गया है। तभी तो प्रधानमंत्री बनते ही सांसदों और विधायकों के अपराधिक प्रकरण एक वर्ष में निबट सकें, इसके लिए वह प्रयासरत हैं। क्योंकि यदि राजनीति की गंगोत्री साफ हो गई तो गंगा बहुत कुछ साफ हो जाएंगी। वहीं, जहां सभी मंत्रियों से अपनी और अपने परिवार की संपति का विवरण मांगा है, वही अफसरों को अपनी संपत्ति ऑनलाइन करने को कहा गया है। संपत्ति की जानकारी न देने या गलत जानकारी देने पर सख्त कार्यवाही का प्रावधान है। इसके साथ ही अधिकारी एवं कर्मचारी समय पर कार्यालय आए इसके लिए बायोमीट्रिक अटेंडेस सिस्टम दो माह के अंदर लगाए जा रहे हैं। अब जब नरेन्द्र लाल किले की प्राचीर से यह कहते हैं कि अधिकारी समय पर दफ्तर आए, यह कोई न्यूज होती है क्या ? सच्चाई यही है कि पिछले कुछ दशकों से राजनीति में आई गिरावट के चलते अधिकारी और कर्मचारी भ्रष्ट होने के साथ बिगडौल और कामचोर भी हो गये। उल्लेखनीय है कि 1975 में जब श्रीमती इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तो उनके समर्थक उसको इस तरह से भी न्यायोचित ठहराते थे- अधिकारी और कर्मचारी समय पर दफ्तरों में आ रहे हैं। पर नरेन्द्र मोदी का कहना है कि इन सब चीजों के लिए किसी आपातकाल लगाने या विशेष कानून बनाने की भी जरूरत नहीं है। बल्कि ऐसी बातें तो शासन चलाने वालों की दृढ़ इच्छाशक्ति पर निर्भर करती हैं। कुछ भी हो, पर यह इतनी लाइलाज बीमारी बन गई थी कि यदि अब अधिकारी और कर्मचारी समय पर दफ्तर आना शुरू कर रहे है तो यह एक बड़ी बात यानी समाचार-पत्रों की खबर बन जाती है। नरेन्द्र मोदी को पता है कि भ्रष्ट और बिगड़ैल नौकरशाही देश की प्रमुख समस्या है, और इसे जनता के प्रति जवाबदेह और उसका विनम्र सेवक बनाना है। ठीक वैसे ही जैसे गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने वहां यह करिश्मा कर दिखाया था। इसके लिए उन्होने आल इण्डिया सर्विस रूल में भारी परिवर्तन करते हुए उन्हें जहां निष्पक्षता एवं बिना किसी भेदभाव के कर्तव्यों का निर्वहन करने, काम में जवाबदेही एवं पारदर्शिता लाने खास तौर पर कमजोर तबके के साथ पक्षपात न करते हुए उनके साथ काम करने की इच्छाशक्ति पर जोर दिया है। नियमों के विरूद्ध कोई काम न करें और जो भी फैसला करे, वो जनता के हित के मद्देनज़र हो। स्पष्ट है कि नौकरशाहों को अब ‘मेरा क्या और मुझे क्या’ की अवधारणा से ऊपर उठकर कानून-कायदे के अनुसार जनहित में काम करना होगा। पर तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है अधिकारियों को वह और पहले कह चुके हैं कि किसी के दबाव या सिफारिश में न आकर उन्हे निष्पक्ष और निर्भीक रूप से काम करना है और कोई समस्या हो तो उन्हे बेझिझक बताना है। नरेन्द्र मोदी को यह पता है कि भ्रष्ट्राचार के चलते पूरे देश में कैंसर की तरह घुन लग गई है और इसको जड़-मूल से मिटाए बगैर राष्ट्र निर्माण की बातों का कोई मतलब नहीं है। अभी तक होता यह था कि सीबीआई या दूसरी जांच एजेन्सिया किसी अधिकारी के विरूद्ध जांच में भ्रष्टाचार प्रमाणित पाए जाने पर भी अभियोजन के लिए सरकारों की अनुमति ही नहीं मिलती थी। इतना ही नहीं, कई बार जांच करने के लिए भी यह अनुमति बड़ी समस्या पैदा करती थी। अब मोदी सरकार ने यह स्पष्ट रूप से आदेशित कर दिया है कि केन्द्र या राज्य सरकारें भ्रष्टाचार के संबंध में कार्यवाही हेतु तीन सप्ताह के भीतर अनुमति देंगी। यदि तीन सप्ताह के भीतर अनुमति नहीं दी जाती तो अनुमति मान ली जायेगी। निःसन्देह सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए यह कदम मील का पत्थर साबित होगा। लाल किले की प्राचीर से जब मोदी कहते है कि मां-बहनों को शौच के लिए अब भी बड़ी मात्रा में अंधेरे का इंतजार करना पड़ता है, और यह उनके लिए कितनी पीड़ाजनक बात है। तब वह देश की एक बुनियादी समस्या को महसूस कर रहे हेेैं। इसलिए एक स्वच्छ और स्वस्थ भारत बनाने के लिए वह 2019 तक प्रत्येक घर में, प्रत्येक स्कूल में शौचालय बनाने के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं। इसीलिए उन्होंने चुनाव के पूर्व ही कहा था- ‘पहले शौचालय फिर देवालय।’ निःसन्देह देवालय, शौचालय के बाद की स्टेज है। एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय का कहना था- हमें सबसे पहले उनकी चिंता करनी होगी जो समाज में भी सबसे पीछे खड़े है, सबसे ज्यादा शोषित और पीड़ित है। इसी को वह अन्त्योदय कहते थे, यानी अंतिम व्यक्ति का उदयय इसी के ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी इस भावना के तहत जन-धन योजना के तहत सभी गरीब लोगो के बैंक एकाउण्ट खुलवाने भर को नहीं कहते, बल्कि आकस्मिक विपत्ति या जरूरत के लिए 1.00 लाख का बीमा भी कराएंगे। निःसन्देह 1 लाख का बीमा किसी भी गरीब व्यक्ति के लिए उसकी आपत्ति-विपत्ति में एक बड़ा सहारा बनेगा।

    ‘अतो भद्रा कृत्या येन्तु विश्वात्मा’’ यानी कि ऋृग्वेद की इस बात पर कि सारी दुनिया में जो अच्छी बाते हैं, वह हम तक आएं। इसी तर्ज पर मोदी लाल किले से पूरी दुनिया को यह आह्वान करते हैं, ‘कम मेक इन इण्डिया’ लेकिन यह कहना नहीं भूलते, दुनिया के किसी भी हिस्से में जाकर बेचिए, लेकिन उत्पादन देश में हो। यही तो देश की समृद्धि का राज हैं पर अभी तक इसका उल्टा हो रहा था। इन सब बातों के अलावा वह यह नहीं भूलते कि उन्होंने कभी चाय बेची थी। इसलिए वह चायवाले की बात में अब भी अपनापन देखते हैं। तभी तो वह कह सकते है कि वह प्रधानमंत्री नहीं प्रधान सेवक है। तुलसीदास ने लिखा -‘सबसे सेवक धर्म कठोरा।’ पर जब नरेन्द्र मोदी अपने के प्रधान सेवक कहते हैं तो यह औपचारिकता या भाषणबाजी नहीं, वरन् इस एहसास और कर्तव्य बोध के साथ कहते हैं कि उनका कोई निजी एजेण्डा नहीं है, यहां तक कि निजी जीवन भी नहीं। वरन राष्ट्र जीवन को संवारना, बनाना, राष्ट्र के लिए जीवन का एक -एक क्षण समर्पित है।

    श्री राम जब लंका विजय कर अयोध्या लौटते हैं, तो बंदरों और भालुओं से गुरू वशिष्ठ का परिचय कराते हुए कहते हैं- ‘गुरू वशिष्ट कुल पूज्य हमारे जिनकी कृपा दनुज रन मारे।’ दूसरी तरफ बंदरों और भालुओं का परिचय गुरू वशिष्ठ से परिचय कराते हएु कहते हैं- ‘एक सब सखा सुनह मुनि मेरे, भए समर सागर कहं बेरे। मम हित लागि जन्म इन्ह हारे।’’ संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी का कहना था- ’मैं नहीं, तू ही।’ श्री श्री मोदी की भावना भी वहीं है, तभी तो अभी 09 अगस्त को भाजपा के राष्ट्रीय परिषद के अधिवेशन में लोकसभा में जीत का श्रेय उन्होंने राजनाथ सिंह एवं अमित शाह को देते हैं। जबकि देश का एक खानदान सफलता का सभी श्रेय स्वतः लेता है और असफलता का पूरा ठीकरा दूसरे पर फोड़ता है। श्री राम ने भरे दरबार में आम जनों के समक्ष यह घोंषणा की थी-‘‘नहि अनीति नहीं कुछ प्रभुताई, कहहुं सुनहुं जो तुम्हहि सुहाई। जो अनीति कुछ भाखौ भाई, तो मोहिं बरजहुं भय बिसराई।’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इसी दिशा में अधिकारियों को भयमुक्त और निर्भीक होकर काम करने को कह रहे हैं। इतना ही नहीं, निर्भीक होकर समस्या बताने को भी कह रहे हैं।

    बाबजूद इसके इस देश में अब भी ऐसे लोगों की कभी नहीं जो मोदी पर सब कुछ बाजार या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देने का आरोप लगाते है। ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि किसानो और गरीबों की स्थिति को देखते हुए और उनके कल्याण के लिए विकसित राष्ट्रों के दबाव को किनारे करते हुए 19 जुलाई कोे डब्ल्यू.टी.ओ. की बैठक में उस प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं करते जिसमें किसानों को उनके उत्पादन लागत से 10 प्रतिशत से ज्यादा कीमत नहीं दी जा सकती। जबकि पूर्व सरकार इस पर दस्तखत कर चुकी थी। वस्तुतः मोदी उन लोक लुभावन योजना के विरोधी है, जो मात्र वोट खरीदने और देश की अर्थ व्यवस्था को चौपट करने का काम करती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि एक चाय वाला लाल किले की प्राचीर से जब राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित कर रहा है तो यह माना जाना चाहिए सचमुच अच्छे दिन तो आ ही रहे हैं, शीघ्र ही देश में सर्वत्र सुशासन देखने को मिलेगा, जो अंततः रामराज्य की कल्पना को साकार करेंगा। बीसवीं सदी के आरंभ में कमाल पाशा ने पिछड़ेपन और पतन के गर्त में पड़े तुर्की का नक्शा बदलकर उसे एक आधुनिक राष्ट्र में बदल दिया था। पूरी उम्मीद है कि नरेन्द्र मोदी भारत में भी यह सब कर सकेंगे। इतना अवश्य है कि कमाल पाशा एक तानाशाह थे, पर नरेन्द्र मोदी जनता के प्रधान सेवक की हैसियत से ही वह सब कर ही नहीं सकेंगे, वरन कुछ ज्यादा ही करेंगे।

    वीरेंदर परिहार
    वीरेंदर परिहार
    स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,639 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read