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    महिला समानता के लिए पहले मानसिकता बदलें…….

    डाॅ0 दयानिधि सेवार्थी

    आज विश्व महिला समानता की बात करता है। परन्तु भारत का इतिहास कहता है कि महिलाओं का स्थान पुरुषों से हजारों गुना अधिक है। वैदिक काल में अनेकों ऋषिकाओं को ऋषियों से आगे बढकर मंत्र विचार हो या शास्त्रार्थ हो कार्य करने का मौका रहता था। गार्गी मैत्रेयी जैसे अनेकों उदाहरण हमारे सामने है। रामायण काल में कैकई सीता अनुसुया वसन्तसेना और महाभारत काल कुन्ति गान्धारी द्रोपदी सुभद्रा उत्तरा जैसी अनेकों महिलाओं को उदाहरण हमारे सामने है कि महिलाएं पुरुषों से आगे ही रही है। महर्षि मनु ने अपने ग्रन्थ के 3.56वें श्लोक में कहा है कि जहां महिलाओं की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है।पूजा से मतलब है मान सम्मान देना। आखिर ऐसा क्या हुआ कि विश्व स्तर पर आज महिला समानता की बात करनी पड रही है। 26 अगस्त को विश्व महिला समानता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। इसके पीछे एक ही कारण है हमारी मानसिता । हमारी मानसिकता ही है जिसने श्री राम के आदर्शों को नहीं रावण के आदर्शों को अपनाया और जिस महिला का स्थान सबसे बडा था उसे अपने भोग विलासता के लिए तथा अपने झूठे अहंकार की पूर्ति के लिए दबा कर रख दिया। हमारी मानसिकता ही है जिसके कारण हमने योगेश्वर श्री कृष्ण के आदर्शो को न अपनाते हुए दुस्शासन और दुर्योधन बनकर द्रोपदी जैसी महान महिला शक्ति का अपमान करते पीछे नहीं हटते। जिस दिन से हमने महर्षि मनु महर्षि वेदव्यास महर्षि बाल्मीकि सत्यवादी हरिश्चन्द्र श्री राम श्री कृष्ण श्री बलराम श्री युधिष्ठिर सम्राट् चन्द्रगुप्त स्वामी दयानन्द स्वमी श्रद्धानन्द जैसे महापुरुषों के आदर्शों को त्यागा उसी दिन से हमारे समाज में महिलाओं का स्थान बढना तो दूर बराबर भी नहीं रहा ओैर महाशक्ति विदूषी जगजननी वैभवी निर्मातृ गुरू आचार्या आदि सम्बोधनों के स्थान पर पैरों की जूती ताडना के अधिकारी सन्तानों की खेत अबला लाचार आदि सम्बोधन दिए जाने लगे। तब एक सशक्त महिला पहली आई.पी.एस. किरण वेदी जिसने पहले स्वयं को सिद्ध किया फिर उसके बाद कहा- कि महिलाओं को हमें सशक्त बनाने की जरुरत है उन्हे ऐसे पद पर पहुचने की जरुरत है जहां उन्हें त्याग करने की बजाय चुनाव करना पडे। हम भारत की प्रथम सफल महिलाओं के रूप में प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल प्रथम मिस यूनिवर्स सुस्मिता सेन प्रथम विश्व सुन्दरी रीता फारिया प्रथम महिला चिकित्सक कादम्बिनि गांगुली प्रथम महिला पायलट सुषमा प्रथम महिला एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली कमलजीत सिंधु प्रथम अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में 100 विकेट लेने वाली डायना इदुल प्रथम सर्वोच्च न्यायालय महिला न्यायाधीश मीरा साहिब फातिमा बीबी और प्रथम उच्च न्यायालय महिला न्यायाधीश लीला सेठ प्रथम महिला अधिवक्ता रेगिना गुहा प्रथम महिला आईपीएस किरण बेदी प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा प्रथम फिल्म अभिनेत्री देविका रानी प्रथम महिला सांसद राधाबाई सुबारायन प्रथम दलित महिला मुख्यमंत्री मायावती प्रथम महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी प्रथम भारतीय वायु सेना महिला पायलट हरिता कौर देओल प्रथम महिला लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार प्रथम हिमालयी पर्वतारोही बछेंद्री पाल प्रथम भारत रत्न इंदिरा गाँधी पहली महिला ग्रैंड मास्टर भाग्य श्री थिप्से आदि का नाम लेते हैंए वर्तमान में भी तीस ऐसी महिलाएं हैंए जो अपने अपने कार्यक्षेत्र में शिखर पर हैं। समाज का दूसरा पहलू यह है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस दौर में भी लड़कियों को बोझ माना जाता है। आए दिन कन्या भ्रूणहत्या के मामले गैरकानूनी होने के बावजूद सामने आते रहते हैं। ऐसा तब है जब मौका मिलने पर लड़कियों ने हर क्षेत्र हर कदम पर खुद को साबित किया है फिर भी महिलाओं की स्थिति और उनके प्रति समाज के रवैये में ज्यादा फर्क नहीं आया है। दरअसल असल परिवर्तन तो आना चाहिए आम लोगों के जीवन में। जरुरत है उनकी सोच में परिवर्तन लाने की। उन्हें बदलने की। आम महिलाओ के जीवन में परिवर्तन उनकी स्थिति में उनकी सोच में परिवर्तन। अपराध बढ़ रहे है। शहर असुरक्षित होते जा रहे है। कुछ चुनिंदा घटनाओ एवं कुछ चुनिंदा लोगों की वजह से कई सारी अन्य महिलाओं एवं लड़कियों के बाहर निकलने के दरवाजे बंद हो जाते है। जरुरत है बंद दरवाजों को खोलने की। रौशनी को अंदर आने देने की। प्रकाश में अपना प्रतिबिम्ब देखने की। उसे सुधारने की । निहारने की। निखारने की। अगर शिक्षा में कुछ अंश जोड़ें जाये जो आपको किताबी ज्ञान के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी दे। आपके कौशल को उपयुक्त बनाये। आपको इस लायक बनाये की आप अपना खर्च तो वहन कर ही सके। तभी शिक्षा के मायने सार्थक होंगे। जरुरी नहीं कि हर कमाने वाली लड़की डाक्टर या शिक्षिका हो। वे खाना बना सकती है। पार्लर चला सकती है। कपड़े सी सकती है। उन्हें ये सब आता है। वे ये सब करती है। पर सिर्फ घर में। उनके इसी हुनर को घर के बाहर लाना है। आगे बढ़ाना है। देश की चंद महिलाओं की उपलब्धियों पर अपनी पीठ थपथपाने की बजाय हमें इस पर भी ध्यान देना चाहिए सार्वजनिक जगहों पर यौन हिंसा के मामले आए दिन सुर्खियों में आते रहते हैं। यह कैसे कम हो सके। जब तक हम अपने आप में समानता नहीं लाएंगे तब तक महिलाओं को समानता का अधिकार नहीं मिल सकता। जिसका प्रमाण दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में सहायक प्रोफेसर डॉ मधुरेश पाठक मिश्र के कथनों से प्राप्त होता है वो कहती हैं कि कॉलेजों में लड़कियों की संख्या देखकर लगता है कि अब उन्हें अधिकार मिल रहे हैं। लेकिन एक शिक्षिका के बतौर जब मैंने लड़कियों में खासकर छोटे शहर की लड़कियों में सिर्फ शादी के लिए ही पढ़ाई करने की प्रवृत्ति देखी तो यह मेरे लिए काफी चैंकाने वाला रहा। आज भी समाज की मानसिकता पूरी तरह नही बदली नहीं है। परन्तु कुछ राहत मिलती है दिल्ली महिला आयोग की सदस्य रूपिन्दर कौर के कथनों को सुन कर वो कहती है कि- बदलाव तो अब काफी दिख रहा है। पहले जहां महिलाएं घरों से नहीं निकलती थीं वहीं अब वे अपने हक की बात कर रही हैं। उन्हें अपने अधिकार पता हैं और इसके लिए वे लड़ाई भी लड़ रही हैं। यह सकारात्मक विचार हमें राहत जरूर देता है परन्तु महिलाओं के समानता की बात हो तो हमें पहले अपने घर की ओर देखना होगा। क्या हम अपने परिवार की बहू बेटियों को महिलाओं को समानता दी है। पुत्र और पुत्री में समानता है भाई बहन में समानता है पति और पत्नी में समानता है अपवाद के रूप में कुछ परिवारों में समानता हो सकती है परन्तु हमे कुछ से आगे भी बढना है और सभी के उत्तर जिस दिन हां मे आ जाएगा उस दिन 26 अगस्त जेसे महिला समानता दिवस को मनाने की आवश्यकता ही नहीं पडेगी। तो आईए संकल्प ले कि हम अपने आप से बदलाव को प्रारम्भ करेंगे फिर परिवार मित्र पडोसी और गांव मोहल्ले से लेकर विश्व स्तर तक महिला को समान अधिकार दिलाएंगे तभी मेरे इस लेख की सार्थकता होगी

    डाॅ. दयानिधि सेवार्थी
    डाॅ. दयानिधि सेवार्थी
    संस्थापक- वसुधा जनसेवा समिति दिल्ली एवं क्रान्तिकारी वैदिक प्रवक्ता

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