अमरपाल सिंह वर्मा
हमारे समाज में तलाक आम तौर पर किसी रिश्ते के खात्मे का परिचायक है। अदालत की डिक्री के साथ पति-पत्नी के बीच कानूनी रिश्ता खत्म हो जाता है। इसके बाद दोनों की राहें अलग हो जाती हैं लेकिन क्या हर तलाक के बाद वापसी की कोई गुंजाइश नहीं होती? राजस्थान हाईकोर्ट के हाल के फैसले ने इस सवाल पर सोचने का मौका दिया है। यह फैसला सब कुछ खत्म होने के बाद भी नई उम्मीद की ओर बढऩे का रास्ता दिखाता है।
मामला राजस्थान के हनुमानगढ़ का है। एक दंपती का तलाक हो चुका था। फैमिली कोर्ट ने विवाह विच्छेद की डिक्री भी दे दी थी लेकिन बाद में पति-पत्नी ने अपने मतभेद दूर किए और फिर से साथ रहने का फैसला किया। हाईकोर्ट ने उनकी इच्छा को कानूनी रूप देते हुए तलाक की डिक्री रद्द कर दी और उनका विवाह बहाल कर दिया। सतही तौर पर यह सामान्य अदालती खबर लगती है मगर यह हमारे समाज से गहराई तक जुड़ी हुई है। इसके पीछे एक परिवार है। एक बच्ची है और दो ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने रिश्ते को एक और अवसर देने का फैसला किया।
इस मामले में 23 अक्टूबर 2015 को पति-पत्नी का विवाह हुआ था। बाद में दोनों के बीच विवाद हुआ। पति ने तलाक की याचिका दायर की। हनुमानगढ़ की फैमिली कोर्ट ने 30 नवंबर 2024 को तलाक मंजूर कर लिया। नतीजतन, विवाह कानूनी रूप से खत्म हो गया। पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान दोनों अदालत में मौजूद रहे। यह प्रकरण मध्यस्थता केंद्र में भी भेजा गया। 29 जनवरी 2026 को वहां समझौता नहीं हो सका लेकिन इसके बाद भी बातचीत बंद नहीं हुई। हाईकोर्ट की कार्यवाही के दौरान दोनों के बीच फिर संवाद हुआ। इस बार बात बनी। पति-पत्नी ने कहा कि वे अपने मतभेद खत्म कर चुके हैं और फिर साथ रहना चाहते हैं। अदालत ने उनके निर्णय को स्वीकार किया।
लेकिन इस प्रकरण में एक और व्यक्ति है जिसकी आवाज इस कहानी में सुनाई नहीं देती। वह है उनकी नाबालिग बेटी। हाईकोर्ट ने बच्ची के भविष्य को भी ध्यान में रखा। अदालत ने कहा कि उसे माता-पिता दोनों का प्यार, देखभाल और भावनात्मक सुरक्षा मिलनी चाहिए। बच्चों के संदर्भ में यह पहलू महत्वपूर्ण है। विवाह टूटने का असर केवल पति और पत्नी तक सीमित नहीं रहता। बच्चे भी उसके साथ बदलती परिस्थितियों का सामना करते हैं। घर का माहौल बदलता है। उनकी दिनचर्या बदलती है। कई बार माता-पिता के बीच चलने वाला विवाद उनके भीतर भी जगह बना लेता है।
यह फैसला सकारात्मक है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चे के नाम पर हर विवाह को बचाए रखा जाए। जहां हिंसा है, उत्पीडऩ है या साथ रहना किसी पक्ष के लिए असुरक्षित है, वहां अलग होना ही उचित रास्ता हो सकता है। किसी भी रिश्ते को केवल सामाजिक प्रतिष्ठा या बच्चे के नाम पर ढोते रहना समाधान नहीं है। लिहाजा, हनुमानगढ़ का मामला ‘हर हाल में विवाह बचाने’ का संदेश नहीं देता। इसका महत्व इससे अलग है क्योंकि दोनों पक्षों ने अपनी इच्छा से साथ आने का फैसला किया। अदालत ने उस फैसले को सम्मान दिया।
हमारे समाज में विवाह को लेकर एक अजीब विरोधाभास है। शादी के बाद पति-पत्नी से अपेक्षा की जाती है कि वे हर परिस्थिति में साथ रहें लेकिन जब रिश्ता गंभीर संकट में पहुंचता है तो अक्सर बातचीत की गुंजाइश बहुत जल्दी खत्म हो जाती है। परिवार हस्तक्षेप करते हैं। रिश्तेदार पक्ष लेने लगते हैं। विवाद बढ़ता है। फिर वकील आते हैं। उसके बाद अदालत। एक बार मामला मुकदमे में बदल जाए तो पति-पत्नी के बीच संवाद और मुश्किल हो जाता है। यहां पर मध्यस्थता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पारिवारिक विवादों में हर समस्या का समाधान अदालत के फैसले से नहीं निकलता। कुछ मामलों में दोनों पक्षों को एक-दूसरे की बात सुनने का अवसर चाहिए। कभी समय की जरूरत होती है। कभी दूरी की। और कभी यह समझने की कि जिस व्यक्ति के साथ इतने सालों का जीवन जुड़ा है, उसके साथ विवाद से अलग भी एक रिश्ता मौजूद है।
हनुमानगढ़ के इस मामले में मध्यस्थता केंद्र में बात नहीं बनी लेकिन बाद में बातचीत के जरिए रास्ता निकला। इससे यह भी पता चलता है कि सुलह कोई एक बैठक में होने वाली प्रक्रिया नहीं है। कभी-कभी इसके लिए समय चाहिए। अदालतों के सामने ऐसे मामलों में कानून के मुताबिक चलना होता है। साथ ही अदालत को यह भी देखना होता है कि जब विवाद करने वाले लोग खुद अपने विवाद को समाप्त कर चुके हैं तो क्या पुरानी कानूनी लड़ाई को जारी रखना वास्तव में जरूरी है। राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इसी मानवीय पक्ष पर ध्यान दिया। अदालत ने तलाक की डिक्री को रद्द करते हुए विवाह बहाल कर दिया। साथ ही पति-पत्नी को भविष्य के मतभेद बातचीत, धैर्य और समझदारी से सुलझाने की सलाह दी। यह सलाह किसी अदालत के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भले न हो लेकिन पारिवारिक जीवन के लिए यह सबसे उपयोगी हिस्सा हो सकती है।
रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहे। यह बदलाव केवल तलाक बढऩे का नाम नहीं है। बदलाव यह भी है कि लोग अपने रिश्तों के बारे में पहले से ज्यादा अपने तरीके से निर्णय लेने लगे हैं। कोई अलग होना चाहता है तो उसका निर्णय स्वीकार किया जाना चाहिए और कोई टूटे रिश्ते को फिर से जोडऩा चाहता है तो उसे भी संदेह की नजर से देखने की जरूरत नहीं। यह भी जरूरी नहीं कि उनके पहले अलग होने के फैसले को ही सही माना जाए और बाद के फैसले को गलत। इंसान अपने फैसले बदल सकता है। परिस्थितियां बदल सकती हैं। रिश्तों की समझ बदल सकती है। कानून भी ऐसी परिस्थितियों के लिए रास्ता रखता है। हनुमानगढ़ के मामले में हाईकोर्ट ने इसी रास्ते का इस्तेमाल किया है। दो वयस्कों ने अपनी इच्छा से पुराने विवाद पीछे छोडक़र साथ रहना तय किया है तो उनके फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए। आखिर विवाह कोई ऐसा अनुबंध नहीं है जिसमें एक बार गलती होने के बाद सुधार की कोई गुंजाइश ही न हो। हनुमानगढ़ का मामला समय के साथ बदलते रिश्तों का परिचायक है। कभी वे टूट जाते हैं। कभी जुड़ जाते हैं। और कभी टूटने के बाद फिर जुड़ते हैं।
अमरपाल सिंह वर्मा