स्वच्छता, सुचिता,समरसता व सौहार्द का अनुपम उदाहरण है छठ पूजा

डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

छठ पूजा यानि सूर्य की उपासना का अनूठा पर्व ,सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण ,वर्ग ,धर्म एवं संप्रदाय को एकाकार करने का अद्भुत संयोग से संपन्न यह व्रत कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बिहार , झारखंड और उत्तर प्रदेश में इसे लोक आस्था और सामाजिक सद्भाव के रूप में भी मानते हैं । भारत उत्सव प्रधान देश है और भारतीय परम्परा नैसर्गिकता का पृष्टपोषक रहा है। वैदिक काल से ही प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन की बात हमारे पूर्वजों ने हमें विरासत में प्रदान की है । हमने देवता शब्द को बड़े ही सहज रूप में स्वीकारा है । देवता को समझना कितना सहज है – आप देवता शब्द को उसमें प्रयुक्त अक्षरों के उपस्थिति को ध्यान से देखेंगे तो स्वयं समझ जायेंगे ।

देवता का अभिप्राय जो दे वह देवता और कुछ भी नहीं । आप इस अभिप्राय के अलावे अन्यत्र देवता को कहीं ढूढ़ने का प्रयास किये कि फिर देवता का दर्शन दुर्लभ हो जायेगा। देवता का सहज गुण है देना और वह जो देश,काल ,जाती ,धर्म ,वर्ग ,सम्प्रदाय ,आदि से परे हो कर ,सीमा में न बंधकर जो सर्वजन हिताय ,सर्वजन सुखाय के गुण से सम्प्पन हो वही देवता है। वह स्थूल , चर ,अचर, जीव ,निर्जीव ,साकार , आकार,मनुष्य ,या अन्य जो भी परिकल्पना मुनष्य अपनी बुद्धि से करता है । उसे ही वह अपना देवता मान लेता है। उसकी पूजा आराधना और अभ्यर्चना करता है। इसक्रम में कुछ उसके अनुयायी बनते हैं और कुछ विरोधी भी पर जो जैसा मान लेता है वह उसी में आनंद का अनुभव करता है ।

भारतीय संस्कृति पर्यावरण की महत्ता को गहराई से समझती है क्योंकि हमारे ऋषि परम्परा का उदगम का स्रोत ही पर्यावरण से है । वेदों में देवता वहीं हैं जो अक्षुण रूप से हमें दे रहे हैं यथा , सूर्य ,चन्द्र ,पृथ्वी ,जल ,आकाश आदि । उन्हीं देवताओं में एक देवता है सूर्य जो ऊर्जा के अनंत स्रोत हैं।वेद ,उपनिषद ,आरण्यक ,ब्राह्मण ग्रन्थ, और विज्ञान के नवीन शोध ग्रन्थ सूर्य की महत्ता को परिभाषित कर उसकी उपादेयता का भी वर्णन करते हैं । सूर्य आत्मा जगत्स्थुखश्च। यानि सूर्य जगत का आत्म – स्वरुप है यानि सूर्य के विना योगी , भोगी, सामान्य किसी का काम नहीं चलनेवाला है । सूर्य के बिना सृष्टि की कल्पना असंभव है । काल गणना का अधिपति सूर्य है । ज्योतिष विद्या का प्राण सूर्य है। सृष्टि के तीन स्वरुप पालन ,पोषण और संहार के प्रतिनिधि देवता ब्रह्मा ,विष्णु,और महेश का तीनों स्वरुप सूर्य में समाहित है यथा – उदये ब्राह्मणो रूपं मध्याह्ने तू महेश्वरः । अस्तकाले स्वयं विष्णुस्त्रिमूर्तिरश्च दिवाकरः ।। भारतीय काल गणना का आधार सूर्य ही है यह निर्विवाद सत्य है । ज्योतिष के पंचांग में वर्णित बारह मास के नाम भी सूर्य के बारह नामों का पर्याय है । धता -चैत्र ,अर्यमा -बैशाख ,ज्येष्ठ -मित्र , आषाढ़ -वरुण ,श्रावण -इंद्र ,भाद्रपद -विवस्वान ,आश्विन-पूषा ,कार्तिक -पर्जन्य ,मार्गशीर्ष -अंशुमान ,पौष -भग , माध -त्वष्टा और फाल्गुन -विष्णु के नाम रूप से आराधना का विधान है । छठ पूजा भी सूर्य पूजा का ही एक स्वरुप है जिसमें कार्तिक माष में पर्जन्य सूर्य के रूप में भगवन सूर्य पूजित होते हैं ।

*कितना व्यावहारिक है छठ पूजा यानि सूर्य पूजा? आप इस पूजा आराधना के अंदर छिपे गहनता को समझिए

1- प्रकृति अपने सम्पूर्ण वैभव से परिपूण होती है. इस काल में खरीफ के फसल पक कर तैयार होते हैं । फल, फूल ,वनस्पति सबके सब प्रकृति के ये अनन्य उपहार अपनी अपनी उपादेयता के साथ हमारे उपभोग के लिए प्रस्तुत होते हैं । इस उपलब्धि पर हमारे ऋषियों और पूर्वजों ने हमें सचेत करते हुए कुछ परम्पराएँ धरोहर के रूप में दी है । उसी धरोहर का एक अनुपम उदाहरण है छठ पूजा । देनेवाले को प्रथम निवेदित कर हम इस ऋतु में जो भी हमें प्रकृति से प्राप्त होता है , उसका ग्रहण करते हैं । सूर्य को इसलिए कि बिना सूर्य के संभव नहीं है प्रकृति का अनुपम उपहार । इसीलिए सूर्य को अपना देवता मान कर हम इनकी पूजा करते हैं ।

2 – वर्षा काल के बाद सूर्य की किरणों ने ही हमें नव जीवन दिया , आरोग्यता दी ,और फसलों का उपहार दिया । अन्न के बिना जीवन संभव नहीं कहा गया है- अन्नाद्भवन्ति भूतानि …. फिर तो सूर्य की आराधना का औचित्य बनता ही बनता है । भारतीय परंपरा में ऋण मुक्ति का आदेश है । हम कई ऋण से बंधे होते हैं ।यथा मातृ ऋण , पितृ ऋण ,गुरु ऋण एवं देव ऋण और देव ऋण से मुक्ति का मार्ग है छठ पूजा । सूर्य ही एक ऐसा देवता है जो दिखता है देते हुए अपने सामान्य आँखों से भी और ऐसे देवता के लिए हम कृतज्ञ नहीं हो तो फिर हमारा मनुष्यत्व कलंकित हो जायेगा । देव ऋण से ,प्रकृति के ऋण से ,वनस्पति के ऋण से उऋण होने का शुभ अवसर का नाम है छठ पूजा ।

3 – सूर्य उपासना अनादि काल से आज तक चलता आ रहा है विविध रूपों में । यथा मूर्ति पूजा , प्रतिक पूजा , सामान्य पूजा , आदि रूप में । उत्सव प्रधान भारत में फिर सूर्य पूजा का एक रूप है छठ पूजा । छठ शब्द संस्कृत के षष्ठ शब्द से लिया गया है । यानि कार्तिक माष के षष्ठी तिथि को सूर्य की उपासना की जाती है अतः इस तिथि के षष्ठी नाम से छठ शब्द का प्रादुर्भाव होता दिखता है । षष्ठी तिथि को सूर्य का जन्मोत्सव तिथि भी कहा जाता है इसीलिए लोक गीतों में वर्णित छठी मैया कोई दूसरी नहीं , षष्ठी तिथि ही है ।

4 – छठ पूजा जहाँ एक ओर कठिन सा लगता है वही यह बड़ा ही सरल है । इसमें सामर्थ्य ,परिस्थिति ,उपयोगिता और उपलब्धता का अनुपम समावेश है – इस लोक पूजा परंपरा में । आपके पास जो हो वही सही , जितना हो वह भी सही और तो और आपके पास कुछ भी नहीं तो दो हाथ तो होंगे और वह भी नहीं तो आप मन से भी नमस्कार तो कर सकतें है वह भी सही और स्वीकार है भगवान सूर्य को – यह है इस पूजा का रहस्य । शास्त्रों में कहा भी गया है कि भगवान शंकर को जल का अभिषेक प्रिय है , विष्णु को अलंकार प्रिय है पर हमारे सूर्य को नमस्कार प्रिय है। अतः आप ब्रत करें न करें सूर्य को नमस्कार तो अवश्य कीजिये – वह आज भी देता हुआ दिख रहा है अतः इस देवता का मन से अभिवादन तो अवश्य कीजिये ।

5 – छठ पूजा में सम्पूर्ण समाज अपने आस पास के नदी , तालाब , गली ,मोहल्ला को स्वच्छ करता हुआ दिख जायेगा। स्वच्छता ,शुचिता ,समरसता ,सौहार्द का अनुपम उदाहरण है छठ पूजा । आज कहाँ रह जाती है दूरी वर्ग का , समाज का , उंच – नीच का , जब लोक गीत गाती हुई स्त्रियों का समूह घरों से निकल कर गलियों से होता हुआ प्रमुख मार्ग पर जन सैलाब के साथ उमड़ता है तब सड़क स्वयं सजीव होकर गाने लगता है । नुपुर की ध्वनि , घूँघट से झांकती तरुणाई , मचलती बालाएं अपने रूप सौंदर्य से पथ को मदमस्त कर देती हैं।

6 – स्वच्छ भारत का दिग्दर्शन करना हो तो छठ पर्व पर भारत के उन गाँवों में जाइए जहाँ छठ पूजा हो रहा है । आपको दिखेगा स्वच्छता ,शुचिता और एकता ।

7 – लोग कहते हैं डूबते को प्रणाम करने से क्या फायदा पर छठ पर्व का अलग सोंच है – डूबनेवाला ही उगेगा , उगनेवाला तो डूबेगा ही , साथ ही हो सकता है की यह भी एक रहस्य हो कि इस मृत्यलोक का मृत्यु ही शाश्वत सत्य है ।अतः अस्ताचलगामी को प्रथम नमन कीजिये वह आपके अंदर कि नई ऊर्जा को पुरानी ऊर्जा के विलय के साथ एक नवीनता प्रदान करनेवाला है । कितना व्यवहारिक है छठ पूजा, अस्ताचलगामी सूर्य प्रथम आराध्य है इसके बाद उदित सूर्य हैं ।

लोक पर्व छठ भारत का प्राण ,एकता का अनुपम उदाहरण और पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक अनुपम प्रयास है । समाज को एक करने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है। जहाँ पूजा विधान के प्रपंच, पाखंड ,एकाधिकार से मुक्ति का मार्ग समाहित है इसमें ।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु म कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्” का सही प्रार्थना है सूर्य से । अतः सूर्य पूजा मनुष्य के लिए ईश्वर से सजीव और सार्थक निवेदन का एक सार्थक प्रयास है जिसे छठ पूजा के रूप में हम मानते हैं । इसमें सीधा ईश्वर साक्षात्कार , प्रकृति से उऋण होने , मानवता के बोध का आभास है और कुछ नहीं ।

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