पंथ निरपेक्षता बनाम धर्म निरपेक्षता को लेकर छिडी बहस के सही संदर्भ

milkyway_garlick_bigकिसी एक शब्द की गलत व्याख्या या उसका गलत अनुवाद किस प्रकार पूरे परिदृश्य को धुमिल कर सकता है और चिंतन को प्रदूषित कर सकता है इसका सबसे बडा उदाहरण दो शब्दों को लेकर दिया जा सकता है। पहला शब्द धर्म है और दूसरा अंग्रेजी भाषा का शब्द सेकुलर है । इन दोनों शब्दों के संदर्भ से हट कर अनुवाद और व्याख्या ने भारतीय इतिहास और चिंतन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । या यूं कहा जाए कि 1857 के आस पास स्थापित अंग्रेजी शिक्षा पध्दति ने इन दोनों शब्दों को संदर्भ से काट कर नये संदर्भों में जो कर स्थापित करने में षडयंत्रकारी भूमिका अदा की है।

यूरोपीय जातियों का जब भारत से संपर्क हुआ तो यूरोप में दो संप्रदाय अथवा रिलिजन अपने पैर बखूबी जमा चुके थे। इनमें से पहला संप्रदाय ईसाई संप्रदाय था, जिसका उदय आज से लगभग सात हजार साल पहले हुआ था । इस रिलिजन की प्रवृत्ति मूलत: सामी प्रकार की थी । सामी प्रकृति उस प्रकृति को कहते हैं जिसमें किसी रिलिजन अथवा मजहब को मानने वाला उपासक अपने ईश्वर संबंधी विश्वासों और उसके स्वरुप, उसकी पूजा करने के तरीके के बारे में इतना जिद्दी रहता है कि वह स्वयं ही इन पूरे कर्मकांडों का पालन नहीं करता बल्कि दूसरों को भी इसका पालन करने के लिए विवश करता है। वह इसे अपना ईश्वरीय कतव्य ही मानता है । सभी संप्रदाय या रिलिजन में आम तौर पर कोई न कोई पैगंबर भी होता है जिसके बारे में उसके उपासकों को यह विश्वास रहता है कि वह ईश्वर का भेजा हुआ विशेष दूत है जिसके माध्यम से ईश्वर ने संसार को उपदेश दिया है। पैंगबर के मरने के बाद उसके कहे गये कथन और दिये गये उपदेश ही मार्गदर्शक हो जाते हैं और पैगंबर की विरासत उसके शिष्य संभाल लेते हैं जिनका आम तौर पर यह दावा होता है कि ईश्वर से बातचीत में अब वे मध्यस्थ करी भूमिका में उपस्थित हो गये हैं। यूरोप में ईसाई रिलिजन अथवा संप्रदाय इसी प्रकार का रिलिजन था । सामी संप्रदाय धीरे-धीरे एक संगठन का स्वरुप ले लेते हैं । यद्यपि ईसाई रिलिजन को प्रारंभ करने वाले पैगंबर का जन्म येरुसलम में हुआ था इसका ज्यादा प्रचार प्रसार पहली सहस्त्राब्दी में यूरोप में ही हुआ ।

इसी बीच इसी प्रकार का एक दूसरा सामी रीलिजन इसलाम के नाम से आज से लगभग 14 सौ वर्ष पहले अरब भूमि से उत्पन्न हुआ । वहां भी एक पैगंबर, उसके दिये हुए उपदेश और ईश्वर की विशेष प्रकार से पूजा पध्दति का प्रावधान निश्चित हुआ। इस नये संप्रदाय का शायद पहले संप्रदाय से पध्दति को लेकर कोआ विरोध नहीं था क्योंकि ईश्वर द्वारा पैगंबर भेजे जाने वाले सिध्दांत को इस नये रीलिजन के लोग भी स्वीकार करते थे। उनका केवल एक ही कहना था कि ईश्वर ने कई सौ साल पहले अपना संदेश देने के लिए ईसा मसीह को अपना पैगंबर बना रक इस दुनिया में भेजा था, इसमें कोई शक नहीं है । परंतु नई परिस्थितियों और नये हालातों को देखते हुए ईश्वर को अब नया पैगंबर भाजने की जरुरत थी ताकि बदले हालात में नया संदेश दिया जा सके । बजरत मोहम्मद ईश्वर द्वारा भेजे गये नये पैगंबर थे । इसलिए उनके उपदेश और उनके माध्यम से लोगों को ईश्वर का दिया गया संदेश एक प्रकार से पहले संदेश का अपडेटेड संस्करण ही मानना चाहिए । इस नये मजहब इस्लाम को मानने वालों के मन में पहले पैगंबर और उसके द्वारा दिये गये संदेश की पावनता का लेकर कोई संशय नहीं था परंतु उनका इतना ही दावा था अब क्यों कि नया पैगंबर और नया मेसेज आ गया है । इसलिए यदि कभी स्पष्टीकरण की जरुरत पड़े तो नया मेसेज ही प्रामाणिक माना जाएगा स्वाभविक है ईसाई मजहब अथवा रीलिजन के शिष्यों ने इस व्याख्या को मानने से इंकार कर दिया और वे उपदेशों के पहले संस्करण पर ही अड़े रहे। यजाहिर है इन दोनों रीलिजनों के मानने वालों में युध्द होने स्वाभविक हो गये थे क्योंकि दोनो संप्रदाय प्रकृति में सामी थे इसलिए अपने पंथ और कर्मकांड को लेकर जिद्दी थे और वे अपने अनुयायियों के ईश्वर की सेवा में लगे हुए युध्द रत सैनिकों के रुप में तबदील कर रहे थे ।

 

जाहिर है इस पूरे प्रकरण में आत्मा और परमात्मा से संबधित दर्शनशास्त्र की गुत्थियों का कोई प्रश्न नहीं था। यह केवल विश्वासों और आस्थाओं को जबरन थोपने के लिए लड़े जा रहे युध्द थे। लेकिन यूरोप में और इन दोनों रीलिजन के मानने वाले देशों में इन संप्रदायों के संगठनों ने राज्य सत्ता पर भी धीरे धीरे कब्जा कर लिया था और अब ये राज्य सत्ता के बल पर अपने रीलिजनों का प्रचार प्रसार ही नहीं कर रहे थे बल्कि उन्हे जबरदस्ती मनवा भी रहे थे । यूरोप में तो चर्च की निर्वाध सत्ता सभी देशों में पैर पसार चुकी थी और पोप केवल अपने अनुयायियों के रीलिजन अथवा संप्रदाय के मुखिया ही नहीं थे बल्कि वे भौतिक राजसत्ता के भी मुखिया बन गये थे। धीरे-धीरे यूरोप में इस स्थिति के खिलाफ विद्रोह पैदा होने लगा । लोगों ने कहा कि जहां तक रीलिजन संबंधीय व्यवस्थाओं का प्रश्न है चर्च अथवा पोप उसमें दखलंदाजी करे और उसमें मार्गदर्शन भी करे इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती । लेकिन चर्च स्टेट अथवा राज्य के अन्य कामों में भी दखलंदाजी करे यह उचित नहीं है । चर्च का अधिकारक्षेष अलग है और स्टेट का अधिकार क्षेष अलग है। यह जरुरी नहीं है कि किसी स्टेट में एक ही रीलिजन में विश्वास करने वाले लोग रहते हों । क्योंकि स्टेट अथवा राज्य के लिए सभी नागरिक एक समान हैं इसलिए उसके लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह किसी भी रीलिजन के प्रति पक्षपात करने से बचे उसे किसी भी प्रकार की रीलिजन से निरपेक्ष रहना चाहिए । अंग्रेजी भाषा में रीलिजन से निरपेक्ष रहने वाली स्थिति को सेकुलर कहा जाता है । स्टेट को चर्च के चुंगुल से मुक्त करवाने, पोप को वैटिकन तक सीमित करने और राज्य अथवा स्टेट को सेकुलर बनवाने में यूरोप के लोगों को बहुत संघर्ष करना पड़ा ।

यूरोप जब इस प्रकार की उथल-पुथल में से गुजर रहा था तब उसका भारत से संवाद स्थापित हुआ । यह संवाद सुखद संवाद नहीं था बल्कि यूरोपीय लोग आक’मणकारी के रुप में इस देश में आये थे और उन्होंने इस देश को विजित किया था । इसलिए यह एक प्रकार से विजित और पराजित जातियों का संवाद था । यूरोप के विद्वान इस देश की सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों को भी यूरोपीय परिस्थितियों के चश्मे से देखने लगे । उनके पास माप-तौल के जो पैमाने थे वे इस देश में फिट नहीं हो रहे थे। उन्हें अपने देशों की सांप्रदायिक स्थितियों का अच्छा ज्ञान था । वे रीलिजन को एक विशिष्ट मनोस्थिति में जानते थे क्योंकि उनके यहां जिस प्रकार से रीलिजन का विकास हुआ था और जो गुण दोष उन्होंने देखे थे वे उन्ही मानदंडों के अनुसार यहां के सांस्कृतिक प्रतीकों और सामाजित परिस्थितियों को पारिभाषित करने लगे । सबसे बडा पंगा रीलिजन को लेकर ही था । भारत वर्ष में सैकडों नहीं, हजारों नहीं लाखों रीलिजन अथवा संप्रदाय प्रचलित थे लेकिन पैगंबर शायद सब कहीं गायब था। यदि कहीं पैगंबर से मिलती जुलती चीज यूरोप के लोगों को भारत में दिखाई भी दी वह अवतार था । भारत के लोगों के लिए अवतार ईश्वर का पैगंबपर नहीं है बल्कि वह साक्षात ईश्वर का ही अवतार है । लोगों का मानना है कि ईश्वर सर्वशत्तिमान है, इसलिए वह कई बार मनुष्य के रुप में अवतार भी ले लेते हैं। लेकिन यूरोप में तो ईश्वर के अवतार लेने की कल्पना ही नहीं की जा सकती । वहां के रीलिजन अथवा संप्रदाय में तो ईश्वर या अपने बेटे को दूत बना कर दुनिया में भेजता है और दूसरी बार बेटे को न सही हजरत मोहम्मद को अपना दूत बना कर दुनिया में भेजता है । लेकिन भारत के संप्रदाय में से यह पैगंबर या दूत गायब था । अनुयायियों को जब यह विश्वास है चाहे राम हों, चाहे कृष्ण हों चाहे बुध्द, चाहे गोरखनाथ हों वे सबके सब उस ईश्वर के ही अवतार हैं और वे मूलत: एक ही हैं । तो विभिन्न रीलिजनों अथवा संप्रदायों में पूजा पध्दति या कर्मकांड को लेकर लड़ाई झगडे की संभावना समाप्त हो जाती है। भारत में ईश्वर के स्वरुप, आत्मा-परमात्मा , जड़ और चेतन, प्रकृति और पुरष को लेकर तीखे विवादों की परंपरा रही परंतु पूजा पध्दति पर जिद की परंपरा कभी नहीं रही। इसलिए यूरोप की तरह विभिन्न संप्रदाय अथवा रीलिजनें में पूजा पध्दति को लेकर कभी लड़ाईयां नहीं रहीं और किसी एक पूजा पध्दति पर एक सीमा से ज्यादा आग्रह भी नहीं रहा । जब किसी विशेष पूजा पध्दति के प्रति आग्रह बहुत ज्यादा न हो तो रीलिजन में भी भगवान और भत्त के बीच मिडलमैन की भूमिका समाप्त हो जाती है या फिर उतनी ज्यादा अहमियत नहीं रहती । लेकिन यूरोप में ईसाई मत और इस्लाम में पादरी और मौलबी के रुप में सबसे ज्यादा भूमिका इन्ही मिडलमैनों की रही । इस प्रकार यूरोपीय जातियों के लोग भारत में अपने देश में प्रचलित संस्थाओं की तलाश करने लगे । यह जरुरी नहीं था कि वहां के मजहबी और राजनीतिक जीवन जो संस्थाएं प्रचलित थी उनके समान स्वरुप की संस्थाएं भारत में भी मिल जाती । लेकिन उनको तो भारत का अध्ययन करने के लिए जिस तकनीकी शब्दाबली का सहारा लेना था वे शब्दाबली उनके रीलिजनों अथवा संप्रदायों की ही हो सकती थी। इसलिए उन्होंने अपनी सुविधा के लिए अपनी शब्दाबली और संस्थाओं को भारत की संस्थाओं पर आरोपित करना शुरु कर दिया । पादरी और मौलबी की तर्ज पर मिडलमैन की तलाश करते हुए पुरोहित को मिडलमेन घोषित कर दिया । जबकि भारतीय संप्रदाय परंपराओं में पुरोहित की भूमिका भत्त और ईश्वर के बीच में मिडलमैन की बिल्कुल नहीं रही । लेकिन इससे भी बडी उनकी समस्या ये थी कि वे ईसाई रीलिजन के समकक्ष भारत में किस चीज की घोषणा करे । यदि पूजा पध्दति पर आधारित संप्रदाय को ही लेना होतो तो भी वैष्णव संप्रदाय है, शैव संप्रदाय है, नाथ संप्रदाय है, सिध्द संप्रदाय है और न जाने ऐसे और कितने विशिष्ट पूजा पध्दतियों वाले संप्रदाय यहां दिखाई देते हैं । लेकिन उनकी तो एक दूसरी समस्या भी थी ईसा मसीह के पैदा होने के बाद यूरोप के लगभग सभी देशों का मतांतरण हो चुका था । इसलिए वहां प्रत्येक राज्य में आम तौर पर एक ही रीलिजन था (आगे उसके उप संप्रदाय संभव थे) । लेकिन भारत में इस प्रकार पूरी स्टेट में कोई एक रीलिजन था ही नहीं यूरोपीय जातियों के लिए यह बडी अजीब स्थिति थी । इसलिए उन्होंने अपनी सुविधा से इस देश के नाम पर रीलिजन का नामकरण कर दिया । मुसलमानों के आक’मण के बाद इस देश का नाम दुनिया में आम तौर पर हिन्दुस्थान प्रचलित हो गया था । यूरोपीय जातियों में इस देश के लोगों के नाम पर ही हिन्दू रीलिजन शब्द का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया । यह दरसल किसी ह्ष्टि से भी तार्किक नहीं था । लेकिन अंग्रेज शासकों ने इसी नये शब्द से भारत की नई व्याख्या करनी शुरु की । जिस प्रकार ईसाई रीलिजन, इस्लाम रीलिजन उसी प्रकार हिन्दू रीलिजन । यह अलग बात है कि इस नये शब्द से यह संकेत अपने आप ही मिलने लगे कि ईसाई रीलिजन और इस्लाम रीलिजन इस देश में विदेशी रीलिजन हैं । क्योंकि यदि इस देश के लोगों के रीलिजन का नाम हिन्दू है तो स्वाभविक है जो ईसाई रीलिजन या इस्लाम रीलिजन को मानते हैं वे विदेशी मूल के हैं । यदि न्यायोचित व्याख्या करनी हो तो यह भी कहा जा सकता है कि जो भारतीय अपने आप को ईसाई या मुसलमान कहते हैं वे विदेशी रीलिजन को स्वीकारकिया है । क्योंकि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में मुसलमानों का ही राज था और वे मुसलमान शासक विदेशी ही थे । इसलिए इस अवधारणा को जड पकडते हुए भी देर नहीं लगी । कालांतर में अंग्रेजों ने और जिन्ना ने मिल कर इसी रीलिजन वाले सिध्दांत को देश का विभाजन करने के लिए इस्तमाल किया।

 

यहां एक और समस्या की ओर ध्यान देना जरुरी है कि जब अंग्रेज विद्वानों ने यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद के लिए संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन प्रारंभ किया तो वहां धर्म शब्द से उनका बार बार सामना हुआ । प्रश्न यह था कि धर्म शब्द का अंग्रेजी या दूसरी यूरोपी शब्दों में कैसे अनुवाद किया जाए। इस शब्द के लिए यूरोपीय भाषाओं में आसानी से कोई शब्द उपलब्ध नहीं हो रहा था । लेकिन फिर भी किसी सीमा तक डयूटी शब्द से काम चलाया जा सकता था । एक और उपयुत्त शब्द जस्टिस भी हो सकता था । कुछ लोगों ने यह भी कहा कि धर्म का अंग्रेजी में अभिप्राय लॉ शब्द से प्रकट होता है। यूरोपीय विद्वानों के लिए यह चुनौती वाले स्थिति तो थी ही परंतु शायद इन किताबों का अध्ययन करते समय उन्हें लगा होगा कि इन किताबों में रीलिजन से ताल्लुक रखने वाली अनेक बातें भी उपलब्ध हैं । पूजा पध्दति के बारे में भी इनमें जितना कुछ लिखा हुआ है और ईश्वर के स्वरुप के बारे में भी विस्तार से चर्चा की गई है । तब उन्होंने जान बूझ कर या अनजाने में धर्म शब्द का अंग्रेजी में अनुवाद रीलिजन कर दिया जबकि असलियत में रीलिजन और धर्म का आपस में दूर – दूर का रिश्ता नहीं है, यदि और भी गहराई से देखा जाए तो धर्म का तो ईश्वर से भी कोई संबंध नहीं है ा धर्म उन शाश्वत अथवा सनातन नियमों को कहा जा सकता है जिनका प्रत्येक मनुष्य को पालन करना चाहिए। इसी प्रकार समूह का अपना धर्म होता है और पद का अपना धर्म होता है। राजा का आपना धर्म होता है कि वह बिना किसी भेदभाव से अपनी प्रजा का पालन करे । किसी भी न्यायाधीश का धर्म है कि वह न लोभ लालच के न्याय प्रदान करे । माता – पिता का धर्म है कि वह स्वयं संकट सह कर भी बच्चों का लालन पालन करें और बच्चों का धर्म है कि वे माता पिता की सेवा करें । इसी प्रकार समाज अथवा राज्य को न्यायपूर्वक नियंत्रित करने के लिए जो नियम तथा विधि विधान बनाये जाते हैं वे भी एक प्रकार से तात्कालिक धर्म के अंतर्गत ही आते हैं। शायद इसी लिए कहा गया है कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म भी उसी की रक्षा करता हैं।

 

परंतु दुर्भाग्य से यूरोपीय विद्वानों ने अपने अनुवाद कार्यों में धर्म की इस व्यापकता को न पहचानते हुए रीलिजन में अनुवाद कर दिया और इसी रीलिजन के साथ हिन्दू शब्द लगाना भी उनके लिए सहज हो गया क्योंकि उनकी दृष्टि में आखिरकार यह रीलिजन भारत के लोगों अथवा हिन्दूओं का ही तो था । यूरोपीय विद्वानों को इस नये अनुवाद से कोई बहुत ज्यादा फक नहीं पड़ा क्योंकि उनकी सूची में ईसाई और इस्लाम रीलिजन तो थे ही और अब एक नया हिन्दू रीलिजन भी जुड गया था । कुछ लोगों ने इस बात पर जब आपत्ति दर्ज की जिसको आप हिन्दू रीलिजन कह रहे हो उसमें किसी विशिष्ट पूजा पध्दति का प्रावधान नहीं है बल्कि इसमें तो हजारों पूजा पध्दतियां हैं । इस नये तर्क से भी यूरोपीय विद्वानों को अपनी स्थिति से टस से मस होने की जरुरत नहीं थी । क्योंकि हिन्दू रीलिजन के आगे अंग्रेजी शब्द एस लगा कर काम चलाया जा सकता था । इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हिन्दू रीलिजन एक नहीं है तो इसे इस देश के अनेक रीलिजनों का समूह माना जा सकता है और इसका सामुहिक नाम हिन्दू रीलिजन हो सकता है ।

अब यूरोपीय विद्वानों ने जब घर्म का अनुवाद रीलिजन कर ही दिया तो उन्होंने इस धर्म का अध्ययन करने के लिए भी उन्हीं उपकरणों का प्रयोग करना शुरु कर दिया जिनका उपयोग वे रीलिजन का अध्ययन करने के लिए कर रहे थे ा लेकिन इधर भारत में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई। जब धर्म रीलिजन हो गया तो उस पैमाने से यूरोप के रीलिजन भी अनुवादित हो कर धर्म बन गये और इस प्रकार ईसाई रीलिजन ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गया । इस्लाम रीलिजन इस्लाम धर्म बन गया और हिन्दू रीलिजन हिन्दू धर्म का रुप धारण कर गया । यूरोपीय भाषाओं में अकसर ऐसे मामले चलते थे कि दुनिया में अनेक रीलिजन हैं लेकिन सभी में मौलिक अच्छी बातें एक जैसी हैं । इसके तर्ज पर भारतीय भाषाओं में अनेक अनुवाद हुए कि दुनिया में अनेक धर्म हैं और सभी धर्म अच्छी बातें सीखाते हैं । जबकि वास्तव में दुनिया में धर्म तो सनातन है जो स्थान और काल से निरपेक्ष है ।

अब जब हिन्दू रीलिजन का जन्म हो ही गया तो अंग्रेजों ने यूरोपीय इतिहास को आधार बना कर भारत वर्ष में भी इस बात पर जोर देना शुरु किया कि स्टेट अथवा राज्य को रीलिजन से परे रहना चाहिए लेकिन उसका अर्थ व्यावहारिक रुप में यह किया गया कि राज्य को धर्म से परे रहना चाहिए । अर्थात उसे धर्म निरपेक्ष होना चाहिए। यूरोप का सेकूलर भारत वर्ष में पंथ से निरपेक्ष रहने का रास्ता छोड़ कर धर्म से निरपेक्ष रहने की ही वकालत करने लगा । इसके बड़े खतरनाक परिणाम हो सकते थे यदि राज्य अथवा राजा ही अपने धर्म का पालन नहीं करेगा फिर तो राज्य में अधर्म अथवा अन्याय की आंधी आयेगी । धीरे-धीरे ऐसा भी विश्वास बनाया गया कि इस देश की जो विरासत, पंरपराएं, संस्कार और आस्थाएं हैं वे ही मूलत: रीलिजन कहलाती हैं । इसलिए राज्य को इन से भी दूर रहना चाहिए। एक प्रकार से यह देश को देश की विरासत से तोड़ने की साजिश थी और उसके लिए बहुत ही चतुराई से जाल बुना गया था ।

 

(नवोत्थान लेख सेवा, हिन्दुस्थान समाचार)

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