लेखक परिचय

ब्रजेश कुमार झा

ब्रजेश कुमार झा

गंगा के तट से यमुना के किनारे आना हुआ, यानी भागलपुर से दिल्ली। यहां दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज से पढ़ाई-वढ़ाई हुई। कैंपस के माहौल में ही दिन बीता। अब खबरनवीशी की दुनिया ही अपनी दुनिया है।

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teesrikasam_1बात कुछ यूं है कि पचहत्तर साल के सफर में फिल्मी गानों ने अपना अंदाजे-बयां कई बार बदला। वैसे, यह अब भी जारी है। यहां एक साथ संपूर्ण चर्चा तो मुमकिन नहीं किन्तु, हम एक धार में तो गोता लगा ही सकते हैं।क्या है न कि लोकगीतों व खान-पान से हमारी संस्कृति का खूब पता चलता है। हमारी रुचि और आदतें यहीं से बनती और संवरती हैं। इससे अलग होना बड़ा कठिन है। हरी-मिर्ची और चोखा के साथ भात-दाल खाने वाले ठेठ पूरबिया को मराठवाड़ा घूमते वक्त कई-कई दिन बड़ा-पाव पर गुजारना पड़े तो उसकी हालत का अंदाजा लगाइए। फिर भी, अपने गांव-कस्बे से दूर, बहुत दूर बड़ा-पाव खाते वक्त गीतकार अनजान के गीत ”पिपरा के पतवा सरीखे मोर मनवा कि जियरा में उठत हिलोर” की धीमी आवाज कहीं दूर से कानों को छूती है तो तबीयत रूमानी हो जाती है। कदम अनायास उस ओर मुड़ जाते हैं। मन गुनगुना उठता है ”पुरबा के झोंकवा में आयो रे संदेशवा की चलो आज देशवा की ओर।”

खैर! सिनेमाई गीतों द्वारा जगाई इसी रूमानियत के बूते मराठवाड़ा में अगले कुछ दिन रस भरे हो जाते हैं। तब धीरे-धीरे बड़ा-पाव भी स्वाद के स्तर पर हमारी रुचि का हो जाता है। ठीक यही हाल पंजाब की गलियों में तफरीह करते और ‘मक्के दी रोटी और सरसों दा साग’ खाते किसी दूर प्रदेश के ठेठ आंचलिकता पंसद लोगों की भी होगी। किन्तु इस बहुसांस्कृतिक देश में जहां भी जाएं कुछ अरुचि के बाद नई रुचि जन्म ले लेगी।

सिनेमाई गीतों ने नई रुचि पैदा करने और विभिन्न लोक संस्कृतियों से अवगत कराने का बड़ा काम किया है। इस बहुभाषीय देश में सभी की रूमानियत परवान चढ़ सके, इसका पूरा खयाल सिनेमाई गीतकारों- संगीतकारों ने रखा है। जब हिन्दी सिनेमा आवाज की दुनिया में दाखिल हुआ तो लोकगीतों को पहली मर्तबा राग-भोपाली, भैरवी, पीलु और पहाड़ी आदि में पिरोया जाने लगा। त्योहारों के गीत परदे पर उतारे जाने लगे:-
‘अरे जा रे हट नटखट न छेड़ मेरा घुंघट…
पलट के दूंगी आज तोहे गारी रे…
मुझे समझो न तुम भोली-भाली रे…।’

आशा और महेन्द्र कपूर की आवाज में गाया गया यह गीत राग-पहाड़ी पर आधारित है। पारम्परिक त्योहारों-ऋओं पर ऐसे हजारों लोकगीत हैं। इसके अलावा दैनिक जीवन में लगे लोगों के मनोभावों को अभिव्यक्त करने के लिए भी आंचलिक गीतों का सहारा लिया गया। इसकी एक बानगी-
‘उड़े जब-जब जुल्फें तेरी
क्वारियों का दिल मचले दिल मेरिये।’

यकीनन, इस गीत से पंजाब की गलियों में खिलते रोमानियत के फूल की खुशबू आती है। इन सभी गानों में इतनी मिठास है कि कई बार रिवाइन्ड करके लोग इसे सुनते हैं। तीन-चार मिनट के इन लोकगीतों में इतनी कसक और नोस्तालजिया है कि पूछिए मत! हमारे सामने सीधे गांव और वतन की तस्वीर उभर आती है। इसे बार-बार सुनने-देखने की तबीयत होती है। इसके बूते लोग दिन-महीने-साल गुजार देते हैं। लोकधुनों पर आधारित सरल संगीतमय गीतों की सफलता में तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों ने भी अपनी तरफ से महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

उसी जमाने से लोग गांव छोड़कर शहरों में बसने लगे। बड़े शहरों-महानगरों और बन पड़ा तो विदेश की ओर पलायन करने लगे। लेकिन, वे गांव की संस्कृति से अलग होकर भी वहां की स्मृतियों को जेहन से मिटा नहीं पाए। अपनी लोकधुनें कान पर पड़ी नहीं कि छोड़ आई उन गलियों की स्मृतियां लौट आती हैं। लोग गाने लगते हैं-‘मेरे देश में पवन चले पूरबाई’

भई आखिर बात ही कुछ ऐसी है, बसंत आया नहीं कि सब कुछ पीला दिखने लगता है। एक अजीब खुमारी छा जाती है जो चारो तरफ पंजाब की गलियों में गूंजने लगती हैं।
‘पीली पीली सरसों फूली
पीली उडे पतंग
पीली पीली उड़ी चुनरिया
पीली पगड़ी के संग
आई झूम के बसंत।’

लोकगीत नई अनुभूतियों के साथ खुद को बदलता जाता है। अब तो देहाती धुनों-बोलों में शहरी नवीनता मिलने लगी है। ‘बंटी और बबली’ के गाने इसके गवाह हैं। यहां ठेठ देहाती शब्दों के बीच अंग्रेजी के शब्दों का भी इस्तेमाल हुआ है। ‘कजरारे-कजरारे मोरे कारे-कारे नैना’… पर्शनल से सवाल करते हैं। यहां पर्शनल क्या है? और मोरे, कजरारे, कारे वगैरह। ये तो अंचल की खुशबू देते हैं।

तो क्या है न कि बंबई नगरिया देश के सुदूर हिस्सों से आए लोगों की जमात ने इस नगरी में बिलकुल भेलपुरीनुमा हिन्दी यानी, बंबइया हिन्दी को धानी बनाया। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि जिस जगह की अपनी कोई मातृभाषा नहीं है उसने लोकगीतों-संगीतों की नवीन रचना के वास्ते उपयुक्त जगह और माहौल प्रदान किया। संगीतकार नौशाद का मानना है कि गीतकार डीएन मधोक लोकगीत को

हिन्दी सिनेमा में स्थान देने वाले शुरूआती लोगों में बड़े महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। सन् 1940 में बनी ‘प्रेमनगर’ के लिए उन्होंने लोकगीतों पर आधारित गाने लिखे जैसे-‘मत बोले बहार की बतियां’। पर नए शोध से यह मालूम हुआ कि 1931-33 से ही कई अनजान गीतकार लोकगीतों पर आधारित गाने फिल्मों के लिए लिख रहे थे जैसे ‘सांची कहो मोसे बतियां, कहां रहे सारी रतियां’ ; फरेबीजाल-1931ई। तब से लेकर आज तक अनेक गीतकारों-संगीतकारों ने लोक-संगीत को फिल्मों में दिखाने-सुनाने में जबरदस्त रुचि दिखाई। याद कीजिए ‘गंगा-जमुना’ का गीत-‘तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया।’ ‘मोरा गोरा अंग लईले’ ;बंदिनी, ‘जिया ले गयो री मोरा सांवरिया’ ;अनपढ़। ‘इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मोरा’ ;पाकीजा, ‘चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजरे वाली मुनिया’ ;तीसरी कसम। हिन्दी सिनेमा में ऐसे हजारों गीत हैं। ये गीत कानों में पड़ें तो क्यों न तबीयत रूमानी हो जाए। ।

One Response to “सिनेमाई गीतों का लोकराग”

  1. prembabu sharma

    लोक गीतों का आपना ही अंनाद है. फिल्म वाले तो उन गीतों की लोकप्रियता को भुनाने का प्रयाश कर आपनी जेब भरते है. पिछले दिनों दिल्ली ६ नमक गीत गेंदा फूल … भी विवाद मई रहा .
    प्रेम बाबु शर्मा ९८११५६९७२३

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