जयसिंह रावत
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण और प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, श्रम उत्पादकता और आर्थिक विकास के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। बढ़ता तापमान, वायु प्रदूषण, दवाओं के प्रति रोगाणुओं की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता और बदलते रोग चक्र विशेषकर गरीब तथा विकासशील देशों के लिए चिंताजनक हैं। अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिका ‘द लैंसेट’ से जुड़े अध्ययनों और लैंसेट आयोग की रिपोर्टों ने चेताया है कि वर्तमान पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य नीतियों का प्रभाव पूरी शताब्दी तक रहेगा। भारत सहित दक्षिण एशिया में विशाल आबादी, अनियंत्रित शहरीकरण, भीषण गर्मी और कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ इस संकट को और गंभीर बनाती हैं। वैज्ञानिक इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन ‘अक्षमता-समायोजित जीवन-वर्ष’ के आधार पर करते हैं, जिसमें असमय मृत्यु तथा बीमारी या अक्षमता के कारण खोए स्वस्थ जीवन-वर्ष शामिल हैं। समय रहते प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप से अरबों स्वस्थ जीवन-वर्ष बचाए जा सकते हैं।
अक्टूबर 2026 में बर्लिन के विश्व स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन में प्रस्तुत लैंसेट आयोग की रिपोर्ट ने मानव स्वास्थ्य के सामने 17 प्रमुख खतरों की पहचान की है। आयोग ने 204 देशों और क्षेत्रों के आँकड़ों का अध्ययन कर जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, महामारी, दवा प्रतिरोध, कुपोषण, मोटापा, आर्थिक असमानता और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चुनौतियाँ बताया है। परमाणु युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग भी संभावित अस्तित्वगत खतरे माने गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक तापवृद्धि को 4.4 डिग्री के बजाय लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने से वर्ष 2025 से 2100 के बीच करीब 189 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्ष बचाए जा सकते हैं। यह विभिन्न परिदृश्यों पर आधारित अनुमान है, जिसमें विस्थापन और मानसिक स्वास्थ्य जैसे अप्रत्यक्ष प्रभाव पूरी तरह शामिल नहीं हैं। निष्कर्ष स्पष्ट है कि ऊर्जा, परिवहन, औद्योगिक उत्सर्जन और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी वर्तमान नीतियाँ भविष्य की स्वास्थ्य क्षति निर्धारित करेंगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख असमय मौतें होती हैं। प्रदूषित हवा के सूक्ष्म कण हृदय रोग, पक्षाघात, श्वसन संबंधी बीमारियों और फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं। वर्ष 2025 की लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट के अनुसार 1990 के दशक की तुलना में गर्मी से संबंधित मृत्यु दर 23 प्रतिशत बढ़ी है। भारत में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद के अध्ययन के अनुसार देश के 734 जिलों में से 417, अर्थात लगभग 57 प्रतिशत, अत्यधिक गर्मी के उच्च अथवा बहुत उच्च जोखिम में हैं। इन क्षेत्रों में देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी रहती है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के अनुसार वर्ष 2024 में लू के 48,156 संदिग्ध मामले और गर्मी से संबंधित 430 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें 161 पुष्ट तथा 269 संदिग्ध थीं। वास्तविक स्वास्थ्य प्रभाव इससे कहीं व्यापक हो सकते हैं। अत्यधिक गर्मी से किसान, निर्माण श्रमिक, खुले में काम करने वाले मजदूर, बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। निर्जलीकरण, गुर्दों की समस्याएँ और हृदय संबंधी जटिलताएँ बढ़ती हैं। शहरों में कंक्रीट, घटती हरियाली और रात में ऊँचा तापमान संकट बढ़ाते हैं। इसलिए हरित क्षेत्र, स्वच्छ ऊर्जा और गर्मी से बचाव को स्वास्थ्य तथा नगर नियोजन की प्राथमिकता बनाना आवश्यक है।
लैंसेट आयोग ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध को वैश्विक स्वास्थ्य का गंभीर खतरा बताया है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब रोगाणुओं पर उपचार में प्रयुक्त दवाएँ बेअसर होने लगती हैं। एंटीबायोटिक का अनावश्यक इस्तेमाल, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की कमी, पशुपालन में दवाओं का दुरुपयोग और पर्यावरण प्रदूषण इसके प्रमुख कारण हैं। बढ़ता तापमान, बाढ़ और दूषित जल प्रतिरोधी रोगाणुओं का प्रसार बढ़ा सकते हैं। इससे सामान्य संक्रमणों का उपचार कठिन और महँगा हो सकता है। शल्य चिकित्सा तथा कैंसर उपचार भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण अत्यंत आवश्यक हैं।
हिमालयी राज्यों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तापमान वृद्धि से कहीं व्यापक है। हिमनदों का पिघलना, अतिवृष्टि, भूस्खलन और प्राकृतिक जलस्रोतों का सूखना जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियाँ हैं। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (इसीमोड) की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय में 2011-2020 के दौरान हिमनदों के पिघलने की गति पिछले दशक से 65 प्रतिशत अधिक रही। अधिक उत्सर्जन की स्थिति में शताब्दी के अंत तक वर्तमान हिमनद आयतन का लगभग 80 प्रतिशत समाप्त हो सकता है। उत्तराखंड में जलस्रोतों की कमी से पेयजल संकट, जबकि बाढ़ और भूस्खलन से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बाधित हो सकती है। सड़कें टूटने पर गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोगियों को समय पर उपचार मिलना कठिन हो जाता है। बदलते मौसम से मच्छरजनित रोगों, जलजनित संक्रमणों और आपदाओं से उत्पन्न मानसिक समस्याओं की निगरानी भी आवश्यक है। इसलिए हिमालयी जलवायु अनुकूलन योजनाओं में स्वास्थ्य सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
लैंसेट आयोग के अनुसार प्रभावी नीतियों से 2100 तक मोटापे से संबंधित लगभग 2,310 करोड़, शिक्षा सुधार से 1,610 करोड़ और आय असमानता घटाने से 1,380 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्षों की संभावित क्षति रोकी जा सकती है। ये स्वतंत्र मॉडल आधारित अनुमान हैं, जिन्हें जोड़ना उचित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार 2030 से 2050 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण कुपोषण, मलेरिया, अतिसार और गर्मी से प्रतिवर्ष लगभग ढाई लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह केवल चयनित स्वास्थ्य जोखिमों का अनुमान है, समग्र मृत्यु संख्या का नहीं।
जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न स्वास्थ्य संकट का सामना केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसी सक्षम स्वास्थ्य व्यवस्था आवश्यक है, जो अत्यधिक गर्मी, बाढ़, महामारी, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी प्रभावी बनी रहे। भारत में जिला स्तर पर गर्मी से बचाव की कार्ययोजनाएँ, सुरक्षित पेयजल, रोग निगरानी, आपदा-सुरक्षित अस्पताल, सुदृढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ और समयबद्ध चेतावनी प्रणाली विकसित करना जरूरी है। खुले में काम करने वाले श्रमिकों के लिए सुरक्षित कार्य अवधि, विश्राम, छाया और पेयजल की व्यवस्था भी स्वास्थ्य नीति का हिस्सा होनी चाहिए। लैंसेट आयोग ने तीन प्रमुख प्राथमिकताएँ सुझाई हैं—संकटों का सामना करने में सक्षम स्वास्थ्य प्रणालियाँ, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचार में निवेश तथा उभरते खतरों की निरंतर निगरानी। आयोग के अनुसार संकट आने के बाद उपचारात्मक कार्रवाई से अधिक प्रभावी उसकी पूर्व तैयारी और रोकथाम है।जलवायु संरक्षण को आर्थिक विकास का विरोधी मानना भी उचित नहीं है। स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा-कुशल भवन, हरित क्षेत्र और प्रदूषण नियंत्रण से पर्यावरण तथा जनस्वास्थ्य, दोनों को लाभ होगा। इससे उपचार खर्च, असमय मौतों और बीमारियों के कारण श्रम उत्पादकता में होने वाली क्षति भी घटाई जा सकती है।
लैंसेट आयोग की चेतावनी स्पष्ट है कि जलवायु संकट से होने वाली स्वास्थ्य क्षति अभी टाली जा सकती है। वर्ष 2100 तक 189 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्ष बचाने की संभावना प्रभावी नीतिगत निर्णयों के महत्व को रेखांकित करती है। भारत के सामने आर्थिक विकास और ऊर्जा आवश्यकताओं के साथ विशाल आबादी को गर्मी, प्रदूषण, बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने की चुनौती है। इसलिए जलवायु संरक्षण को केवल पर्यावरण का विषय न मानकर स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, श्रम और आर्थिक नियोजन की साझा प्राथमिकता बनाना होगा। आज की नीतियाँ ही आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य और भविष्य निर्धारित करेंगी।