डा.वेदप्रकाश
शिक्षण संस्थानों और कोचिंग सेंटरों में भिन्न-भिन्न कारणों से विद्यार्थियों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसा लगता है जैसे ऐसे कुछ स्थान विद्यार्थियों के लिए चक्रव्यूह बन जाते हैं जिसमें वे बहुत सारे सपने और दबावों के साथ घुस तो जाते हैं लेकिन उन्हें भेदकर वापस नहीं निकल पाते। जैसे ही छोटी बड़ी परीक्षाओं के व नौकरियों के विज्ञापन अथवा परिणाम आते हैं वैसे ही प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और आजकल तो सोशल मीडिया में भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाने वाले कोचिंग सेंटरों के बड़े-बड़े विज्ञापनों की भरमार होती चली जाती है। कोचिंग के लिए प्रवेश हेतु जहां एक ओर भिन्न-भिन्न प्रकार की स्वरचित नियमावली, लुभावनी छूट एवं अन्य आकर्षण उपलब्ध हैं तो वहीं दूसरी ओर परीक्षा के परिणाम आते ही फोटो के साथ रैंकिंग में एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ भी साफ देखी जा सकती है।
यह मामला यहीं तक सीमित नहीं है। ये विज्ञापन स्वप्न दिखाते हैं और फिर पैकेज, प्लेसमेंट , सफलता दर आदि के नाम पर बच्चों, युवाओं और माता-पिता का भावनात्मक, मानसिक और आर्थिक शोषण भी कर रहे हैं। इन पर रोकथाम हेतु शासन- प्रशासन की कोई नियमावली नहीं है। जब छोटी बड़ी कोई दुर्घटना होती है तो दो-चार दिन समाचार छपते हैं और फिर मामला नेपथ्य में चला जाता है। प्रत्येक बच्चे की अपनी क्षमताएं होती हैं। लेकिन कई बार माता-पिता की जबरदस्ती के चलते बच्चा केवल एक उपकरण बनकर रह जाता है। कई बार बच्चे की आर्थिक और भाषिक पृष्ठभूमि भिन्न होने से जब वह पढ़ाई के नए मध्यम एवं नए परिवेश में जाता है तो वह सामंजस्य नहीं बैठा पाता, जिससे उसका अवसाद ग्रस्त होना बड़ा स्वाभाविक है। ध्यान रहे घर में, स्कूल में, कोचिंग केंद्र पर, प्रवेश के बाद शिक्षण संस्थानों में और फिर अच्छे पैकेज वाली नौकरी के लिए बना तनाव और अवसाद का यह सिलसिला धीरे धीरे भयंकर विकृति का रूप ले लेता है। थोड़ी सी भी असफलता व तनाव में वह निराश होकर आत्महत्या की ओर बढ़ जाता है।
विगत दिनों आइआइटी बांबे से बीटेक करने के बाद मल्टीनेशनल कंपनी से संबद्ध और फिर प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे अभिनव का सुसाइड नोट चिंतित करने वाला है जिसमें लिखा था- किसान-माली बन जाना, पढ़ाई का दबाव मत लेना। इस समाचार के अगले ही दिन दो और समाचार छपे। एक समाचार आइआइटी खड़गपुर से था। जहां कैंपस में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के तीसरे वर्ष के छात्र जयवीर सिंह डोडिया ने आठवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। विदित हो कि यहां वर्ष 2025 में सात छात्रों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी जिनमें से पांच के शव फंदे से लटके मिले थे। दूसरा समाचार हरियाणा के कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) से था,जहां हाल ही में बीटेक प्रथम वर्ष की एक छात्रा ने आत्महत्या की कोशिश की। वह बोली- मीडिया को बुलाओ, कुछ सच्चाई बताना चाहती हूं। यह सच्चाई क्या है, यह अभी सामने आना बाकी है।
ज्ञात हो कि एनआइटी कुरुक्षेत्र में विगत दो महीने में चार विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली, जिससे उपजे हगांमे के बाद प्रशासन ने 20 दिन की छुट्टी की घोषणा कर दी। क्या छुट्टी कर देने से अथवा इस प्रकार के मामलों को दबा देने से इस दिशा में सुधार होगा? ध्यान रहे आत्महत्याओं के अधिकांश मामले तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों से अधिक आ रहे हैं। आज एक समाज, शिक्षण संस्थान और शासन-प्रशासन के नाते हमें गंभीरता से यह विचार करना होगा कि आखिर ये छात्र आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? क्या पाठ्यक्रमों की विसंगतियां इन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही हैं अथवा क्या हम इन्हें इतना भी शिक्षित नहीं कर पा रहे हैं कि ये जीवन में आने वाली छोटी-मोटी परेशानी एवं तनावों को झेल सकें। ध्यान रहे आइआइटी,आइआइएम और एनआइटी जैसे उत्कृष्ट संस्थानों में जाने वाला विद्यार्थी सामान्य नहीं है। वह कठोर परिश्रम करके वहां तक पहुंच पाता है।
सामान्यत: उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी मित्रों, परिवार और समाज से दूर छात्रावास आदि में रहकर पढ़ाई करते हैं। दूर होने से कई बार विद्यार्थी अवसाद का शिकार हो जाते हैं। कई बार अकेले रहकर ऐसे विद्यार्थी ऑनलाइन गेमिंग एवं नशे जैसी बुराई के शिकार भी हो जाते हैं। देश के अनेक शिक्षण संस्थानों में ऐसे छात्रों की काउंसलिंग के लिए समुचित व्यवस्थाएं नहीं हैं। जहां हैं वहां शर्म और डर भी एक बड़ी बाधा दिखाई देती है। कई बार पढ़ाई, परीक्षा, परियोजना कार्य और आपसी प्रतिस्पर्धा भी आत्महत्या का कारण बन जाती है। छात्र के लिए खानपान, रहन-सहन और संतुलित जीवन शैली बहुत आवश्यक है। इसमें विकृति भी कई प्रकार की बीमारियों और अवसाद का कारण बन रही है। आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष हजारों छात्र आत्महत्या कर लेते हैं।
विगत दिनों प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 4 प्रतिशत की दर से छात्र आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश के महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्यप्रदेश वो राज्य हैं जहां छात्र सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं। समय-समय पर शिक्षण संस्थानों से भिन्न-भिन्न प्रकार के उत्पीड़न के मामले भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में भी पीड़ित द्वारा आत्महत्या की संभावना बढ़ जाती है। विगत लंबे समय से शिक्षण संस्थानों में भिन्न-भिन्न प्रकार के ड्रग्स आपूर्ति के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। ड्रग्स की लत और फिर उसकी पूर्ति न होने के कारण भी छात्रों में अपराधिक प्रवृत्ति व आत्महत्या की संभावना बढ़ जाती है। कई बार साथियों का अनुचित व्यवहार, प्रेम के मामले और फिर उनका टूटना भी शिक्षण संस्थानों में अपराध एवं आत्महत्या की संभावनाओं को बढ़ा रहा है। इस प्रकार के मामलों में कई बार सच्चाई सामने ही नहीं आ पाती है।
आज हमें यह भी समझना होगा कि विकासक्रम के साथ-साथ जीवन पद्धति और परिस्थितियों में भी बदलाव आ रहे हैं। तकनीक आधारित और अत्यधिक आधुनिक कही जाने वाली जीवनशैली अपने साथ कई प्रकार की विकृतियां भी लेकर आ रही है। क्या इन सब बातों को देखते हुए स्कूलों, महाविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में इन विकृतियों से निपटने हेतु प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था है?
श्रीमद्भगवत गीता में लिखा है- निर्द्वंद, शांत, तनाव रहित और इच्छाओं के दबाव से मुक्त व्यक्ति प्रसन्न और स्वस्थ रहता है। क्या आज हम इन सभी के दबाव से ग्रस्त नहीं हैं? जैसे ही छोटी बड़ी किसी भी परीक्षा के परिणाम आते हैं तो देश में कई स्थानों से छात्रों द्वारा आत्महत्याओं के समाचार भी सामान्य होते जा रहे हैं। ‘थ्री इडियटस’ नामक फिल्म में उच्च शिक्षण संस्थानों का जो सत्य दिखाया गया है, क्या वह आज भी जारी नहीं है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मन की बात व परीक्षा पे चर्चा जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के माध्यम से लगातार – प्रतिस्पर्धा नहीं, अनुस्पर्धा। परीक्षा और ये परिणाम ही अंतिम नहीं हैं, उसके आगे भी जीवन है… जैसे संदेश दे रहे हैं लेकिन फिर भी शिक्षण संस्थानों में आत्महत्याओं का सिलसिला निरंतर बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट लिखा है कि- प्रत्येक शिक्षा संस्थान में तनाव से जूझने और भावनात्मक तारतम्यता बनाने के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था होगी। इसके अलावा ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों को अपेक्षित सहायता प्रदान करने के लिए एक बेहतर व्यवस्था बनाई जाएगी… सभी उच्चतर शिक्षण संस्थान अपने संस्थानों में सभी छात्रों के लिए गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित करेंगे। उक्त प्रविधान होने के बाद भी व्यवहार के धरातल पर अभी स्थिति लगभग पूर्ववत ही है। क्या ऐसे में शिक्षण संस्थानों को तत्काल समुचित योजना बनाकर कदम नहीं उठाने चाहिए?
ध्यान रहे, किसी छात्र द्वारा आत्महत्या केवल एक जीवन की हानि नहीं है अपितु यह परिवार, समाज और राष्ट्र की बहुत बड़ी क्षति है। विकसित भारत का संकल्प जिन युवाओं के भरोसे आगे बढ़ रहा है, वे केवल मानव संसाधन नहीं है अपितु उस संकल्प की नींव हैं। इसलिए उनका शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन बहुत बड़ी आवश्यकता है।
डा.वेदप्रकाश