8 मार्च: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष
बाबूलाल नागा
8 मार्च का दिन केवल उत्सव का नहीं बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का भी है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के संघर्ष, उपलब्धियों और अधिकारों की याद दिलाता है। यह दिन उन बहनों को स्मरण करने का अवसर देता है जिन्होंने समानता, शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता के लिए लंबा संघर्ष किया। गांव हो या शहर, इस दिन महिलाएं एक-दूसरे से मिलती हैं, अपने सुख-दुख साझा करती हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम करती हैं और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाती हैं। यह सामूहिकता ही उनकी ताकत है।
लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि महिला दिवस की चमक अक्सर सरकारी कार्यक्रमों और औपचारिक भाषणों तक सीमित रह जाती है। देश की अनेक महिलाओं को आज भी यह नहीं पता कि महिला दिवस क्यों मनाया जाता है। वे घर-परिवार की जिम्मेदारियों में इस तरह उलझी रहती हैं कि अपने अधिकारों और अवसरों के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता। सवाल यह है कि जब हमारा संविधान बराबरी का अधिकार देता है, तो व्यवहार में यह बराबरी क्यों नहीं दिखती?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद-14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद-15 लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। फिर भी समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता। आज भी कई स्थानों पर महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है। घर की आय में उनका योगदान होने के बावजूद आर्थिक नियंत्रण उनके हाथ में नहीं होता। आंकड़े बताते हैं कि भारत में केवल लगभग 24 प्रतिशत महिलाओं के हाथ में सीधे तौर पर नगद मजदूरी आती है। अधिकांश मामलों में मजदूरी पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्य ले लेते हैं। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को समान काम के बदले कम मजदूरी मिलना आज भी आम बात है।
यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता तक सीमित नहीं है। लैंगिक भेदभाव सामाजिक सोच में गहराई से बैठा हुआ है। महिलाओं को अक्सर “कमजोर वर्ग” के रूप में देखा जाता है। घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, शिक्षा से वंचित होना, बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियां आज भी समाज में मौजूद हैं। कानून तो बने हैं, पर उनका प्रभावी क्रियान्वयन अब भी चुनौती बना हुआ है। जब तक सामाजिक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे।
महिला दिवस हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या हम सचमुच महिलाओं को बराबरी का स्थान देने के लिए तैयार हैं? क्या हमारे घरों में बेटियों को वही अवसर मिलते हैं जो बेटों को मिलते हैं? क्या पंचायत, नगरपालिका और संसद में महिलाओं की भागीदारी केवल आरक्षण तक सीमित रहनी चाहिए या उसे सामाजिक स्वीकृति भी मिलनी चाहिए?
महिला-पुरुष समानता का अर्थ केवल अधिकारों की बात करना नहीं है, बल्कि व्यवहार में उसे लागू करना है। समानता का अर्थ है—शिक्षा में बराबरी, रोजगार में बराबरी, निर्णय लेने में बराबरी और सम्मान में बराबरी। जब हर घर में संविधान के मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाएगा, तभी महिलाओं को वास्तविक हक मिलेगा। जिस दिन परिवार, समाज और संस्थाएं संविधान की भावना को आत्मसात कर लेंगी, उस दिन महिला दिवस केवल प्रतीक नहीं रहेगा, बल्कि उपलब्धि का उत्सव बन जाएगा।
आज जरूरत है सामूहिक संकल्प की। राज्य और देशभर की महिलाएं यदि एकजुट होकर हिंसा, जाति, धर्म और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाएं, तो परिवर्तन संभव है। महिलाओं को अपने मताधिकार की ताकत को पहचानना होगा। लोकतंत्र में वोट केवल अधिकार नहीं, परिवर्तन का साधन भी है। जब महिलाएं संगठित होकर अपनी प्राथमिकताओं को राजनीति और नीतियों का हिस्सा बनाएंगी, तब सरकारें भी उनकी मांगों को गंभीरता से लेंगी।
समानता का संघर्ष पुरुषों के खिलाफ नहीं, बल्कि असमान सोच के खिलाफ है। समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब आधी आबादी सुरक्षित, शिक्षित और आत्मनिर्भर हो। महिला-पुरुष समानता केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की प्रगति का प्रश्न है।
आइए, इस 8 मार्च को केवल औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित न रखें। संकल्प लें कि अपने घर से ही समानता की शुरुआत करेंगे। बेटियों को अवसर देंगे, महिलाओं की आवाज को महत्व देंगे और हर प्रकार की हिंसा व भेदभाव के खिलाफ खड़े होंगे। एक ऐसा माहौल बनाएंगे जहां हर औरत भयमुक्त होकर सम्मान से जी सके। यही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का वास्तविक संदेश है—समानता, सम्मान और स्वतंत्रता का संकल्प। ( अदिति फीचर्स )
बाबूलाल नागा