लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

Posted On by &filed under आलोचना.


old women                       “अम्माजी के बारे में सुनकर बहुत दु:ख हुआ|शहर के बाहर था इसलिये आ नहीं पाया|”मैं श्याम भाई के निवास पर
उनकी माताजी की मृत्यु पर शोक संवेदना प्रकट करने पहुंचा था|
“किंतु उन्हें बहुत कष्ट था,आठ माह से पलंग पर पड़ी थीं”उन्होंने जबाब दिया|
” हमेशा चहकती रहतीं थीं,कितनी अच्छी बातें……सारगर्भित…कितना अपनापन‌ होता था उनकी बातों में,कितना स्नेह…”मैंने आगे कहना
चाहा|
“परंतु बहुत हल्ला करतीं थीं,दिन भर चाँव चाँव”वे बात काट कर बोले|
“उस कमरे की तो बात ही और थी जिसमें वे पूजा करती थीं,कितना पवित्र था वह कमरा ,अगरबत्ती की भीनी खुशबू,घंटा आरती,कितना मन भावन था वह दृश्य जब वह ॐ जय जगदीश हरे की  आरती गाती थीं”मैंने भावुक होकर कहा|
“वह तो ठीक है पर उस कमरे का उपयोग नहीं हो पा रहा था|अब पत्नी ने वहां ब्यूटी पार्लर खोल लिया है|”वह बोले|
मैं अवाक था और शायद गल‌ती पर भी|शोक संवेदना के बदले बधाई संदेश देना था उनकी मां की मृत्यु पर|

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *