राजनीति

पीडीए के नये-नये नामों से भ्रम खत्म, अपने मूल वोट बैंक पर लौटी सपा 

राजेश श्रीवास्तव

  कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अपने मूल चरित्र को बदल कर दिखाने की कोशिश करता है तो जल्दी ही उसका खुलासा हो ही जाता है। इन दिनों यह बात सही साबित होती दिख रही है उत्तर प्रदेश के विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी समाजवादी पार्टी में। अखिलेश यादव जो लंबे समय से बार-बार पीडीए का मतलब बदल रहे थे, वह अब अपने मूल चरित्र (एम-वाई) समीकरण पर ही लौट आये हैं। समाजवादी पार्टी के इसी वोट बैंक के आधार पर पीडीए (पिछड़ा-दलित और अल्पसंख्यक) बनाया था। मतलब एमवाई समीकरण में केवल दलितों को जोड़ने के लिए (बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए) पीडीए नाम रख दिया था लेकिन उन्हें लगा कि सिर्फ पीडीए के सहारे उत्तर प्रदेश की जंग नहीं जीती जा सकती तो उन्होंने बार-बार पीडीए का मतलब बदला। कभी पी से पिछड़ा, कभी पी से पंडित, इसी तरह से कई बार मायने बदलने का ऐलान हुआ। मतलब हर वर्ग को गुमराह करने की कोशिश लेकिन इस पूरी कवायद पर अखिलेश यादव के रथ ने ही खुद विराम लगा दिया है।

  अखिलेश यादव हर बार समाजवादी रथ लेकर चुनाव प्रचार पर निकलते हैं। इस बार  जो रथ सामने आया है उस पर साफ लिखा है ‘पीडीए – पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (मुस्लिम)’। मतलब अब गुमराह होने की जरूरत नहीं। अखिलेश ने साफ कर दिया है कि उनके लिए सिर्फ यहीं तीन लोग महत्वपूर्ण हैं। न अगड़ा, न पंडित, न अन्य वर्ग। पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक। अखिलेश ने 2०23 में यह फॉर्मूला दिया था। मकसद था- यादव और मुस्लिम वोटबैंक के साथ-साथ पिछड़ी जातियों और दलितों को जोड़ना ताकि भाजपा के ‘सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी’ गठजोड़ को तोड़ा जा सके। 2०22 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को 4०3 सीटों में से 111 सीटें मिलीं। वोट शेयर 32.1% रहा, जबकि भाजपा को 41.3% वोट मिले। यानी सीटों में बड़ा अंतर था। 2०24 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदली। समाजवादी पार्टी ने 8० में से 37 सीटें जीतीं। कांग्रेस के साथ गठबंधन में सपा ने 62 सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 जीतीं। भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं। 2०24 में सपा को 3.81 करोड़ से ज्यादा वोट मिले, भाजपा को करीब 3.83 करोड़ वोट मिले। यह अंतर सिर्फ 1.4 लाख का था। इस प्रदर्शन ने सपा को भरोसा दिया कि पीडीए फॉर्मूला काम कर रहा है। 2०24 में सपा ने मुस्लिम-यादव वोटबैंक में कुर्मी, पाल और दलितों को जोड़कर पीडीए को मजबूत किया।

  उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21% है।4०3 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। दलित वोट सिर्फ आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है। 12० से ज्यादा सीटों पर दलित मतदाता हार-जीत तय करते हैं. सीधा असर 14०-15० सीटों पर पड़ता है। 2०22 में भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने 84 में से 63 आरक्षित सीटें जीती थीं जबकि सपा गठबंधन को सिर्फ 2० सीटें मिलीं। यही वजह है कि अखिलेश दलित वोट को तोड़ने की कोशिश में जुटे हैं। सपा का वोटबैंक यादव और मुस्लिम तक सिमटा हुआ था। पिछड़ी जातियों और दलितों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जा रहा था, पीडीए का मकसद इसी गैप को भरना है।

  फरवरी 2०24 के एक सर्वे के मुताबिक, 49% पिछड़ों ने कहा कि वे पीडीए पर भरोसा करते हैं। दलितों में यह आंकड़ा सिर्फ 16% था और अल्पसंख्यकों में 21%। यानी दलित और अल्पसंख्यक वोटरों का भरोसा अभी भी कम है। पीडीए फॉर्मूले ने 2०24 लोकसभा चुनाव में सपा को सबसे बड़ी ताकत बना दिया। अखिलेश की रणनीति साफ है कि गैर-यादव पिछड़ी जातियों (कुर्मी, पाल, निषाद, राजभर, मौर्य, कश्यप आदि) और दलितों को साथ लाकर भाजपा के ‘सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी’ गठजोड़ को तोड़ा जाए। साथ ही मुस्लिम वोट को एकजुट रखना भी है।

  सपा की रणनीति में एक और बदलाव है- ‘पीडीए-2.०.’ इसके तहत सामान्य सीटों पर भी 1०० से ज्यादा दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी है। यह दलित वोटरों को यह संदेश देने की कोशिश है कि सपा सिर्फ पीडीए की बात नहीं करती बल्कि दलितों को टिकट भी देती है। 2०22 में दलित वोट का बड़ा हिस्सा भाजपा के पास गया था। हालांकि दलितों का भरोसा जीतने के लिए सिर्फ रथ पर फोटो लगाना काफी नहीं होगा। जमीन पर जातिगत समीकरण कितने बदलते हैं, यह 2०27 में पता चलेगा। फिलहाल, रथ तैयार है, नारे लिखे गए हैं और फोटो लग गई हैं। अब इंतजार है अखिलेश की ‘समाजवादी पीडीए यात्रा’ के ऐलान का। सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश यादव अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में इसी रथ से पूरे यूपी में यात्रा शुरू कर सकते हैं। मकसद साफ है- 2०27 के विधानसभा चुनाव की तैयारी। अब देखना है पीडीए के रथ से अखिलेश 2०27 की वैतरणी  पार कर पाते हैं या नहीं।

राजेश श्रीवास्तव