कांग्रेस में वंशवाद पसारेगा पैर

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लिमटी खरे

कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी द्वारा युवाआंे को आगे लाने की हिमायत भले ही जोर शोर से की जा रही हो, किन्तु जाने अनजाने मे वे अपनी ही तरह महाराष्ट्र प्रदेश में राजपुत्रों को सियासत में आने के मार्ग प्रशस्त करते नजर आ रहे हैं। सूबे में अमित देशमुख,सत्यजीत तांबे, राव साहेब शेखावत, प्रणिती शिंदे, नितेश राणे जैसे नेताआंे के पुत्र जल्द ही सियासत की बिसात पर कदम ताल करते नजर आएंगे। राहुल गांधी चाहते हैं कि गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को राजनीति में उभरने का मौका दिया जाए। इसके लिए निष्पक्ष तरीके से चुनाव करवाकर लोकसभा, विधानसभा, प्रदेशाध्यक्ष जैसे पदों के लिए युवाओं का चयन किया जाना है। 16 फरवरी तक महाराष्ट्र में सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है, इसके उपरांत चुनाव कराया जाना सुनिश्चित है। राजनैतिक पंडितों का मानना है कि राज्य में स्थापित इन घाघ नेताओं के वारिसान अपने अपने पिताओं की लोकप्रियता का फायदा उठाकर उनके समर्थकों की फौज कार्यकर्ता के तौर पर खड़ी कर लेंगे, फिर अपने पक्ष में मतदान करवाकर अध्यक्ष के साथ ही साथ लोकसभा, विधानसभा की टिकिट भी हथिया लेंगे। हो सकता है राहुल गांधी को इस तरह का मशविरा देने वालों ने पहले ही अपनी अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित कर लिया गया हो। राहुल गांधी को सियासत भले ही विरासत मे मिली हो, पर वे राजनैतिक ककहरा से अभी अनिभिज्ञ ही लग रहे हैं।इटली का नाम न लो, अच्छा नहीं होगा

इटली का नाम आते ही कांग्रेस के नेताओं की भवें तन जाती हैं। इसका कारण कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का इटली मूल का होना है। राकापां के प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी ने जब इटली को गठबंधन सरकारों का घर बताया तो कांग्रेसी बिफर गए। दरअसल कांग्रेसी अपनी सुप्रीमो सोनिया को इटली से दूर रखना चाह रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि युद्ध के बाद इटली में चार दर्जन गठबंधन सरकारें अस्तित्व में आई हैं, और सफल भी रही हैं। कांग्रेस के युवराज मंहगाई को गठबंधन सरकार से जोड़कर बयानबाजी कर रहे हैं जो केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की राकांपा को रास नहीं आ रहा है। युवराज भूल जाते हैं कि सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में जब कांग्रेस का एकछत्र राज कायम था तब मंहगाई ने पैर पसारे और जेपी आंदोलन का आगाज हुआ था। देखा जाए तो त्रिपाठी का कथन सही है, उन्होंने एक ही तीर से अनेक निशाने साध लिए हैं, जिनका जवाब कांग्रेस खोजने में लगी हुई है।

प्रणव के लिए ममता को मनाया सोनिया ने

कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को प्रणव मुखर्जी का साथ देना मजबूरी ही माना जाता है, क्योंकि प्रणव दा ने उनके पति राजीव गांधी के मार्ग में अनेक मर्तबा शूल बोए थे। हाल ही में प्रणव मुखर्जी के पुत्र अभिजीत के लिए पश्चिम बंगाल की नोनहाटी या लवपुर सीट को सुरक्षित रखने अर्थात वहां से त्रणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी को खड़ा न करने के मसले को लेकर सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच लंबी गुफ्त गू हुई। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के सूत्रों का कहना है कि सोनिया के आग्रह को ममता ने मान लिया है, पर किस शर्त पर? इसके जवाब में सूत्रों ने कहा कि पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर त्रणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी खासी खफा हैं। उन्होंने अपनी नाराजगी से सोनिया गांधी को आवगत करा दिया है। कोलकता की रायटर बिल्डिंग पर कब्जा जमाने का ख्वाब देख रहीं ममता के सामने पेट्रोल की बढ़ी कीमतें एक अवरोध बनकर उभर रही हैं। सूत्रों ने बताया कि दोनों ही महारानियों के बीच चर्चा का दौर जारी ही था कि अचानक ममता को खबर मिली कि मेदिनीपुर क्षेत्र में मकपा के कार्यकर्ताओं ने त्रणमूल कार्यकर्ताओं पर हमला बोल दिया। ममता ने वहीं चर्चा को विराम देते हुए वहां से रूखसती डाल दी। ममता की नाराजगी के उपरांत सोनिया ने तत्काल ही पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को तलब किया। अब देखना है कि ममता के गुस्से के चलते देशवासी पेट्रोल की बढ़ी कीमतें देते हैं या फिर . . .।

तुम्हारा गोल गोल, हमारा गोल हाफ साईड

न्यायधीशों द्वारा ब्लाग्स और सोशल नेटवर्किंग वेव साईट के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत करना कंेद्र के गले नहीं उतर रहा है। केंद्रीय विधि मंत्रालय ने आचार संहिता का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट और समस्त उच्च न्यायलयों को पत्र लिखकर जवाब तलब किया है। गौरतलब होगा कि कर्नाटक के न्यायधीश शैलेंद्र कुमार ने सबसे पहले अगस्त 2009 में एक ब्लाग आरंभ किया था, जिस पर उन्होने सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की आलोचना की थी। कोलेजियम वस्तुतः पांच न्यायधीशों का एक दल होता है, जो न्यायधीशों के स्थानांतरण और नियुक्ति करता है। केंद्र सरकार का मानना है कि अगर माननीय न्यायधीशों ने यह सिलसिला नहीं रोका तो आने वाले समय में इस बारे में केंद्र को कठोर कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। केंद्रीय विधि मंत्रालय द्वारा इस तरह के तुगलकी फरमान जारी करने के पहले यह बात जेहन में अवश्य ही लानी चाहिए थी कि केंद्र सरकार के पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने आचार संहिता की चिंदी चिंदी उड़ाते हुए एक सोशल नेटवर्किंग वेब साईट पर अपने प्रशंसकों से न जाने क्या क्या शेयर किया था, यहां तक कि बतौर केंद्रीय मंत्री उन्होंने अपने आप को काम का बोझ तले दबे होने की बात भी कह दी थी। सवाल यह उठता है कि माननीय जनसेवक गोल मारे तो गोल और अगर कोई दूसरा गोल मारने जाए तो इन्हीं जनसेवकों में से एक उठकर सीटी बजा देगा और उसे हाफ साईड बताकर फाउल करार दे देगा।

विलास के सर पर कांटों भरा गिलास

आदर्श घोटाले में नाम आने के बाद भी ग्रामीण विकास सरीखा मलाईदार विभाग पाने वाले विलास राव देशमुख की पेशानी पर पसीनें की बूंदे देखकर लगने लगा है कि उनके सर पर कांटों भरा ताज रख ही दिया गया है। बजट सत्र में विलास राव देशमुख की अग्नि परीक्षा है। भूमि अधिग्रहण के मौजूदा कानून में उन्हें संशोधन करना ही है, वह भी उत्तर प्रदेश चुनावों के मद्देनजर। इसमें सबसे बड़ी अड़चन यह है कि त्रणमूल कांग्रेस इसके लिए किसी भी कीमत पर राजी होती नहीं दिख रही है। भूमि सुधार काननू में जरा भी बदलाव किया गया तो उसका असर पश्चिम बंगाल के चुनावों पर अवश्य ही पड़ेगा। इसके पहले विभाग के मुखिया रहे सी.पी.जोशी ने ममता बनर्जी को हरियाणा और गुजरात माडल भी दिखाया पर ममता इसमें हेरफेर को तैयार नहीं हैं। उधर ममता को बताया गया है कि मध्य प्रदेश में भूमि सुधार कानून में तब्दीली की तैयारी है, जिसमें किसान को उसकी भूमि पर लगने वाले उद्योग में भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। इससे उद्योग धंधे तो फलेंगे फूलेंगे ही साथ ही किसान के हितों का पूरा पूरा संरक्षण भी हो जाएगा। अब देशमुख पशोपेश में हैं कि वे आखिर ममता को मनाएं तो कैसे?

एमसीडी चुनाव: कशमकश जारी

अगले साल दिल्ली में नगर निगम चुनाव होने वाले हैं। देश की राजनैतिक राजधानी के निगम पर कब्जे के लिए सियासत बहुत तेज हो गई है। प्रमुख राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना ही लिया है। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कांग्रेस की कमान संभाल ली है। इसी तारतम्य में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी से भेंट कर भावी रणनीति से उन्हें आवगत कराया। उधर भारतीय जनता पार्टी की वेतरणी को पार करवाने के लिए भाजपा के कद्दावर नेता वेंकैया नायडू ने दूसरा सिरा संभाल लिया है। नायडू ने साफ कह दिया है कि इस बार टिकिट उन्हीं पार्षदों को दी जाएगी, जिनकी कार्यप्रणाली से क्षेत्र की जनता संतुष्ट हो। 272 सीटांे वाली दिल्ली नगर निगम पर वर्तमान में भाजपा का कब्जा 170 सीटों के साथ है, वहीं कांग्रेस के खाते में महज 76 सीट ही हैं। चुनाव मई 2012 के पहले होना है। उन भाजपाई पार्षदों की रातों की नींद उड़ी हुई है, जिन्होंने इन चार सालों में सिर्फ मलाई ही काटी है। दिल्ली में प्रबुद्ध वर्ग आधिक्य में है, इसलिए कामन वेल्थ घोटाला, टूजी घोटाला और भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार के साथ ही साथ दिल्ली में बढ़ता अपराध का ग्राफ कांग्रेस के लिए नकारात्मक ही साबित होने वाला है।

कहां गायब हो रहे हैं हरियाणावासी

हरियाणा सूबे से हर रोज पांच लोगों की ‘गुमइंसान‘ रिपोर्ट दर्ज हो रही है। हरियाणा पुलिस की आधिकारिक वेब साईट के आंकड़े बताते हैं कि सूबे से गायब होने वाले महिला और पुरूषों में साठ फीसदी से ज्यादा लोग 15 से 30 वर्ष की आयु वर्ग के हैं। पिछले आधे साल में सूबे से 800 से ज्यादा लोग गायब हैं, जिनमें सबसे ज्यादा फरीदाबाद से 91 हैं। आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो 16 जुलाई से 16 दिसंबर तक हिसार से 60, झज्जर, जींद से 45-45, सिरसा से 44, कुरूक्षेत्र से 39, पानीपत से 39, रोहतक से 29, पंचकुला से 26, कैथल से 24, भिवानी से 23, रेवाड़ी से 20, पलवल से 16 एवं मेवात से 2 लोग गायब हुए हैं। इतने व्यापक पैमाने पर लोगों के गायब होने से लोग हैरान और पुलिस परेशान है। माना जा रहा है कि प्रेम प्रसंग के चलते युवा हरियाणा से भाग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मानव तस्करी की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। दिल्ली से सटे हरियाणा राज्य की पुलिस का अन्य सूबों की पुलिस के साथ बेहतर तालमेल न होने के चलते लोगों की पतासाजी का काम मंथर गति से ही चल रहा है।

पश्चिम बंगाल चुनावों का खामियाजा भुगत रही है रेल्वे

ममता बनर्जी भारत गणराज्य की रेल मंत्री हैं। जब से उन्हें रेल मंत्रालय का प्रभार संभाला है तब से वे पश्चिम बंगाल का ही भ्रमण कर रही हैं। ममता की अनदेखी का खामियाजा भारतीय रेल को बुरी तरह भुगतना पड़ रहा है। भारतीय रेल गंभीर अर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है, और कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के कानों में जूं भी नहीं रेंग रही है। यह रेल बजट तो यात्रियों और माल ठुलाई के हिसाब से ठीक रहेगा, क्योंकि ममता को चुनावों की चिंता है, किन्तु आने वाले दिनों में रेल की यात्रा और माल ढुलाई इतनी मंहगी होने वाली है, जिसकी कल्पना देशवासियों को नहीं है। रेल मंत्रालय को पिछले बजट में 15 हजार 875 करोड़ रूपए मिले थे, जो फंुक चुके हैं। रेल कर्मियों और ठेकेदारों के अनेक भुगतान रोके जा रहे हैं। रेल महकमे ने वित्त मंत्रालय से तत्काल ही चालीस हजार करोड़ की मांग कर डाली है। छटवें वेतन आयोग के चलते रेल्वे पर 55 करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ा जिसमें से 36 करोड़ रूपए तो महज एरियर का ही था। रेल्वे की आय में 1,142 करोड़ रूपयों की गिरावट आई है जबकि खर्च 1,330 करोड़ रूपए बढ़ गया है।

यूपी में राहुल फेल

कांग्रेस के की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश से हैं, और उनके निर्वाचन क्षेत्र वाले सूबे में ही कांग्रेस औंधे मुंह पड़ी है। देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले इस सूबे में कांग्रेस की सांसें उखड़ने लगी हैं। राज्य में कांग्रेस का आलम यह है कि कांग्रेस के आला नेता ही सूबे में मुकाबले में खड़े होने में ही हिचक रहे हैं। पिछले दिनों राहुल गांधी ने राज्य के नेताओं से रायशुमारी की। रायशुमारी में केंद्र सरकार के घपले घोटाले की ही गूंज रही। थक हार कर राहुल गांधी को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि पुरानी बातों पर धूल डालिए, नए एजेंडे और नए हौसले के साथ जनता के बीच जाया जाए। उधर कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि जनता का भरोसा कांग्रेस पर से उठ चुका है। पिछले आम चुनावों में जनता ने मनमोहन सिंह की साफ सुथरी छवि को ही वोट दिया था, जो अब पूरी तरह दागदार हो चुकी है। आसमान छूती मंहगाई से जनता बुरी तरह त्रस्त दिख रही है। कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं का मत है कि जनता के बीच जाकर उसे बताया जाए कि मंहगाई का असली कारण राज्य सरकार की नीतियां हैं, जिस पर कार्यकर्ता सहमत होते नजर नहीं आ रहे हैं। कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर अभी चुनाव हो गए तो कांग्रेस चारों खाने चित्त ही नजर आएगी।

बाबा रामदेव हो गए सियासी

इक्कीसवीं सदी के योग गुरू बाबा रामदेव को सियासत का पाठ पढ़ाने वाले वाकई कुशल प्रबंधक हैं। राम किशन यादव उर्फ बाबा रामदेव दो सालों से देश भर में घूम घूम कर स्विस बैंक में जमा काला धन वापस लाने और भ्रष्टाचार मुक्त सियासत की वकालात कर रहे हैं। पहले तो उनकी बातें लोगों के दिमाग पर असर नहीं डाल पा रही थीं, किन्तु अब कांग्रेस और भाजपा के भ्रष्टाचारी चेहरे के खिलाफ जमीनी स्तर पर माहौल बनना आरंभ हो चुका है। लगता है बाबा रामदेव के सियासी गुरूओं की पढ़ाई पट्टी पर चलकर बाबा रामदेव ने जमीनी स्तर पर अपना एक प्लेट फार्म तैयार कर ही लिया है। बाबा की सभा में चालीस से पचास हजार की भीड़ जुटना आम बात है, लोग बाबा रामदेव से इसलिए भी जुड़ रहे हैं, क्योंकि बाबा दो सालों से भ्रष्टाचार को केंद्र बनाकर ही बयानबाजी कर रहे हैं। बाबा की बातों को कामनवेल्थ, टूजी, आदर्श सोसायटी, नीरा राडिया, तेल माफिया के घोटालों के कारण खासी हवा मिल रही है। कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकार चुनाव प्रबंधन पर जोर दे रहे हैं तो बाबा रामदेव इनका रायता फैलाने में लगे हैं। अब देखना महज इतना है कि बाबा रामदेव का अस्त्र आम चुनावों में चलता है या फिर चुनाव प्रबंधन के जरिए सरकार का गठन होता है?

सियासी मित्रों की नो एंट्री है सिंधिया दरबार में

यूं तो युवा तुर्क बनकर उभरे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के सियासी मित्रों की कमी नहीं है, किन्तु जब उनके दरबार की बारी आती है तो सियासी मित्रों का प्रवेश वहां वर्जित ही है। 1 जनवरी 1971 को जन्मे सिंधिया ने नए साल की पहली किरण के साथ ही अपना चालीसवां जन्मदिन मनाया। यह क्या उनके जन्म दिन के जश्न में एक भी सियासी चेहरा नहीं दिखा। इस पार्टी में सिर्फ उनके मित्र ही शामिल हुए वे भी देश विदेश से आए हुए। सियासी हल्कों में इसकी गहरी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोगोें का कहना है कि राजनैतिक मित्रों को वे अपना मित्र नहीं मानते हैं, यहां तक कि इसके पहले उन्होंने अपने विभाग के कबीना मंत्री आनंद शर्मा तक को अपने जन्म दिन के जश्न में बुलाना मुनासिब नहीं समझा। आखिर ज्योतिरादित्य जनाधार वाले नेता हैं, सो उन्हें राजनैतिक मित्रों की बैसाखी की भला क्या जरूरत!

पुच्छल तारा

देश में मंहगाई आसमान छू रही है। चीजों के भाव कई गुना बढ़ चुके हैं। कहीं भी चाय पान या खाना खाने जाईए तो जेब हल्की होना स्वाभाविक ही है। एसी स्थिति में क्या देश में कोई जगह एसी है, जहां कम कीमत पर खाने को मिल जाए। आपका उत्तर होगा नहीं। नहीं जनाब, एसा नहीं है देश में एक जगह एसी भी है जहां माटी मोल खान पान की सामग्री बिकती है। पूना से अनुपम बहल ने ईमेल भेजकर यह जताया है। अनुपम लिखते हैं कि देश में एक जगह एसी है जहां आपको एक रूपए में चाय, साढ़े पांच रूपए में सूप, डेढ़ रूपए में दाल, एक रूपए की चपाती, साढ़े चोबीस रूपए में चिकन, चार रूपए का दोशा, आठ रूपए की वेज बिरयानी, तेरह रूपए की मछली एक प्लेट मिल सकती है। क्या आप जानना चाहेंगे कहां? यह सब कुछ गरीब लोगों के लिए है। यह है इंडियन पार्लियामेंट की केंटीन का रेट कार्ड, जहां देश के वे गरीब खाते हैं, जिन्हें रहने के लिए आवास, आने जाने के लिए एयर कंडीशन सफर सब कुछ निशुल्क के अलावा अस्सी हजार रूपए मासिक वेतन के साथ अनाप शनाप भत्ते मिलते हैं। यह सब देश के हर नागरिक से वसूले गए कर से ही निकलता है। मतलब साफ है कि मजे उड़ाएं देश के गरीब जनसेवक और भोगमान भोगे उन्हें चुनने वाली जनता।

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लिमटी खरे
हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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  1. खरे जी अपने लेख में आपने महत्वपूर्ण बातें उठाई हैं ,वंशवाद को लेकर आपने सही लिखा मेरी समझ में भी ये बात सही है की जन्म से राज पैदा होनेवाले युग का अब समापन हो गया है ,प्रजातंत्र में इसका कोई स्थान नहीं है ,कांग्रेस को भी देर सवेर इस बात को समझना ही होगा की प्रजातंत्र में राजा जनम से नहीं कर्म से जनता द्वारा चुना जाता है ,आपने प्रणव के लिए ममता को मना लिया गया है बिलकुल सही लिखा है ,किन्तु बाबा रामदेव सियासी हो गए ये गलत लिखा है ,बाबा ने स्पष्ट कहा है की वो कभी भी सत्ता का सुख नहीं भोगेंगें ,जहाँ तक उनके द्वारा उठाये गए काले धन का सवाल है तो मैं भी आपसे पूछना चाहता हूँ के संतों के इस महान देश में ज्वलंत समस्याओं को संत नहीं उठायेंगें तो कौन आखिर इसको उठाने का जिम्मा किसका है ?राजनीतिक लोग तो स्वयं घबरा रहें हैं ,इस लिए क्या किया जाये ?

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