डॉ.वेदप्रकाश
वंदे मातरम् राष्ट्र गीत है जिसके साथ समूचे देश की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। वंदे मातरम् का गायन संवैधानिक व्यवस्था से अनिवार्य है वहीं वंदे मातरम को अधूरा गाना इस राष्ट्रीय प्रतीक और संविधान की अवहेलना है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा वंदे मातरम् के दो ही पद गाने की घोषणा सीधे-सीधे संसद और संविधान की अवहेलना है। इस तरह से तो आने वाले समय में कोई भी व्यक्ति अथवा संस्था संविधान सम्मत व्यवस्थाओं को अथवा राष्ट्रीय प्रतीकों को न माने अथवा आधा अधूरा माने का रास्ता चुन सकते हैं। इसलिए आज यह आवश्यक है कि इस प्रकार के किसी भी कृत्य को गैरकानूनी, गैर संवैधानिक और देश विरोधी मानते हुए तत्काल कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
बौद्धिक दिवालियापन की शिकार कांग्रेस विगत कई वर्षों से विरोध की गिरफ्त में है। वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद वर्ष 2014 तक थोड़ा बहुत छोड़कर लगातार कांग्रेस सत्ता में रही है। वर्ष 2014 में भारी बहुमत से भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई और तब से लगातार जनता के भारी समर्थन से सत्ता में बनी हुई है। सत्ता से दूर रहने का दर्द अब कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष को परेशान कर रहा है। रह रहकर प्रधानमंत्री बनने की चाहत राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेताओं को दिवास्वप्नों में ले जा रही है। ऐसे में इन नेताओं में मानसिक असंतुलन पैदा होना बहुत स्वाभाविक है।
नरेंद्र मोदी के रूप में व्यक्ति और भारतीय जनता पार्टी के रूप में पार्टी का विरोध करते-करते कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कानून की अवहेलना और संविधान का अपमान कर रहा है। हाल ही में 15 अगस्त के दिन कांग्रेस कार्यालय में वंदे मातरम् के गायन में व्यवधान पर उठे विवाद के उपरांत कांग्रेस ने अब यह खुलकर साफ कर दिया है कि पार्टी वंदे मातरम् को पूरा नहीं गाएगी बल्कि आरंभिक दो पदों का ही गायन अपने कार्यक्रमों में करेगी। पार्टी नेतृत्व ने कहा है कि- वंदे मातरम् उसके लिए भावना से जुड़ा है और महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस तथा रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा 1937 में कांग्रेस कार्य समिति में वंदे मातरम् गायन की के दो पदों का ही पार्टी गायन करेगी। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने साफ कहा कि- पार्टी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् गायन के संदर्भ में 90 साल पहले पारित प्रस्ताव का ही पालन किया जाएगा। विदित हो कि विगत दिनों संसद के मानसून सत्र में संसद ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक 2026 को मंजूरी दे दी है। अब राष्ट्र गीत वंदे मातरम् को भी राष्ट्रगान- जन गण मन के समान के कानूनी संरक्षण मिलेगा। अब वंदे मातरम् का अपमान करना, उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालना या उसके प्रति अनादर दिखाना दंडनीय अपराध होगा। ऐसे मामलों में अधिकतम 3 वर्ष तक की सजा जुर्माना या दोनों का प्रविधान होगा। यद्यपि विपक्ष ने इस विधेयक का खूब विरोध किया तदुपरांत भी यह विधेयक दोनों सदनों से पास हो गया और अब किसी भी कार्यक्रम में वंदे मातरम् के सभी छह पद गाने का प्रविधान अनिवार्य हो गया है।
यहां महत्वपूर्ण यह है कि वंदे मातरम के सभी 6 पद गाने का प्रविधान संसद में विधेयक के जरिए पास होने पर अब यह संविधान का हिस्सा बन गया है जिसका पालन प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि विगत में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को संविधान बढ़ाने की बड़ी चिंता सता रही थी और वे संविधान की एक पुस्तक हाथ में लिए जगह-जगह घूम रहे थे जिसका मूल कारण वे बताते थे कि वे संविधान बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। अब मजेदार यह है कि संविधान की वह पुस्तक भी उन्होंने कहीं रख दी है और उनकी पार्टी यानी कांग्रेस संविधान के अनुरूप वंदे मातरम् के गायन में भी केवल दो पदों के गायन का राग अलाप रही है। सारा देश कांग्रेस के इस देश विरोधी फैसले और इसके माध्यम से कानून व संविधान की अवहेलना के रुख को देख रहा है। मूल रूप से तो यह कांग्रेस का राजनीतिक विरोध है जिसे बौद्धिक दिवालियापन के कारण कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व संवैधानिक मूल्यों से भी बड़ा मान रहा है।
इस बार का मानसून सत्र नीट पेपर लीक और चढ़ावा चोरी जैसे मुद्दों के चलते कांग्रेस और विपक्ष के संग्राम से बहिष्कार की भेंट चढ़ गया। यहां भी गौरतलब है कि कांग्रेस और समूचा विपक्ष अधिकांश समय संसद से बाहर ही रहे। वे संसद में बैठकर मुद्दों पर बहस करने से हमेशा बचते रहे हैं। विगत में भी समान नागरिक संहिता, कृषि कानून और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर कांग्रेस और विपक्ष एकजुट होकर विरोध के स्वर में ही खड़े रहे हैं। मुद्दा यह नहीं है कि विपक्ष होने के नाते आप सत्तारूढ़ पार्टी का विरोध न करें। मुद्दा यह है कि आप विरोध संसद में बैठकर तार्किक ढंग से करें या संसद के बाहर भ्रम और भय फैलाकर करें। विगत दिनों नीट के मुद्दे और परीक्षाओं में अव्यवस्था को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा जंतर मंतर पर हुए धरने प्रदर्शन में देखते ही देखते कांग्रेस और विपक्ष के कई बड़े नेता जुट गए। इसके मूल में श्रेय लेने का भाव ही प्रधान था।
मेरे सपनों का भारत नामक पुस्तक में हड़ताल शीर्षक से गांधी जी ने लिखा है- जो हड़ताल माली हालात की बेहतरी के लिए की जाती है उसमें कभी अंतिम ध्येय के तौर पर राजनीतिक मकसद की मिलावट नहीं होनी चाहिए। ऐसा करने से राजनीतिक तरक्की कभी नहीं हो सकती। यहां विडंबना यह है कि गांधी जी के विचार और सिद्धांतों को भूलकर आज कांग्रेस किसी भी मंच अथवा किसी भी स्तर पर जाकर राजनीतिक तरक्की के रास्ते ढूंढ रही है। इसी पुस्तक में गांधी जी ने आगे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस शीर्षक से विचार करते हुए कांग्रेस के भविष्य के विषय में लिखा है- अगर वह सत्ता हड़पने के व्यर्थ के झगड़ों में पड़ती है तो एक दिन वह देखेगी कि वह कहीं नहीं है…। आज गांधी जी की यह भविष्यवाणी बिल्कुल सत्य सिद्ध हो रही है। आज कांग्रेस धीरे-धीरे समाप्ति के कगार पर है। सत्ता और राजनीतिक स्वार्थ के कारण वह बौद्धिक दिवालियापन और वैचारिक विकलांगता से जूझ रही है। कांग्रेस के विभिन्न वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ रहे हैं। देश में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस आज विरोध-प्रदर्शनों के अतिरिक्त कहीं दिखाई नहीं दे रही है। इसका बड़ा कारण कहीं न कहीं गांधी जी के विचार और सिद्धांतों की अनदेखी करना भी है।
नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी की विश्वसनीयता और बौद्धिक विपन्नता से पूरा देश परिचित है। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे भी कहीं न कहीं कठपुतली ही बनकर रह गए हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के रूप में परिवार का वर्चस्व कांग्रेस की नैया को डूबाने के लिए पर्याप्त है। वंदे मातरम् का संपूर्ण गायन न करने का फैसला कांग्रेस की तुष्टीकरण की मानसिकता को उजागर करता है। कांग्रेस शासित कर्नाटक और केरल में तो समय-समय पर राष्ट्रीय प्रतीकों की अवहेलना अथवा राष्ट्र भाव का विरोध सामान्यत देखा जा सकता है। कांग्रेस को यदि अब भी अपना अस्तित्व बचाए रखना है तो उसे देश विरोध की मानसिकता छोड़कर संसद के अंदर बहस के जरिए मुद्दों पर बात करनी चाहिए और शीर्ष नेतृत्व को कुछ दिन सभी कार्यों से छुट्टी लेकर गांधी जी द्वारा लिखित मेरे सपनों का भारत पुस्तक
पढ़नी चाहिए।
डॉ.वेदप्रकाश