लेखक परिचय

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

विगत २ वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय,वाराणसी के मूल निवासी तथा महात्मा गाँधी कशी विद्यापीठ से एमजे एमसी तक शिक्षा प्राप्त की है.विभिन्न समसामयिक विषयों पे लेखन के आलावा कविता लेखन में रूचि.

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सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र

खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो,

 

अकबर इलाहबादी’ की ये पंकितयाँ मीडिया की तात्कालिक स्थिति का बखूबी वर्णन करती है। स्वतन्त्रता संग्राम में पत्र –पत्रिकाओं की महती भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। उस दौर में पत्रकारो ने अपनी कलम की रोशनार्इ से राष्ट्र प्रेम की ऐसी अलख जगायी, जिसका परिणाम है ये आजादी। उदन्त मात±ड’, आज’, प्रताप’ जैसे अनेकों समाचार- पत्र हानि-लाभ से ऊपर उठकर राष्ट्रसेवा के लिए कटिबद्ध थे, या यूं कहें वो दौर था विशुद्ध पत्रकारिता का। गली-मोहल्ले से निकलने वाले छोटे-छोटे अखबारों ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिलाकर रख दिया था। तत्कालिन समाचार पत्रों में छपे लेखों ने नौजवानों को सोचने पर विवश कर दिया था। ये हमारे पूर्वजों (पत्रकारों) की विरासत है कि मीडिया की विश्वसनीयता आज भी बदस्तूर कायम है। उस दौर में संपादकाचार्य बाबूराव, विष्णुराव पराणकर, गणेश शंकर विधार्थी, प्रताप नारायण मिश्र, लक्ष्मी शंकर गर्दे, पं. माखनलाल चतुर्वेदी जैसे उत्कृष्ट एवं ओजस्वी पत्रकारों ने अपनी ओजस्वी लेखन से आमजन में राष्ट्रप्रेम के बीज बो दिये थे। जिसकी फसल भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खाँ, राम प्रसार बिसिमल एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के रूप में देखने को मिली।

मगर आज के परिदृश्य में मीडिया की विश्वसनीयता में धीरे-धीरे ही सही गिरावट का सिलसिला लगातार जारी है। जैसा कि पराड़कर जी ने कहा था कि, आने वाले समय में संपादक, संपादक न होकर एक कुशल प्रबंधक होगा। वास्तव में आज का संपादक मालिक के आर्थिक हितों का कुशलता से प्रबंधन करता है। कभी समाचार पत्र की जान कहे जाने वाले मुखपृष्ठ एवं संपादकीय पृष्ठों पर पूँजीपतियों एवं राजनीतिज्ञों का दखल बढता जा रहा है। प्रथम पृष्ठ पर लगने वाले पुल आउट’ विज्ञापन से लाखों-करोड़ों का वारा-न्यार करने वाले पत्र – मालिकों (पूँजीपतियों) ने नैतिकता को ताक पर रख दिया है। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था, लेकिन अब तो मीडियाकरों ने मुनाफाखोरी की सारी हदें पार दी हैं। प्रिंट मीडिया का नया आविष्कार है, एडवर्टोरियल यानि खबरों के शक्ल में विज्ञापन। ये विज्ञापन आपको अखबार के किसी पन्ने पर अपने विज्ञापनदाता की डुगडुगी बजाते मिल जायेंगे। किसी जमाने में अखबार की शान समझे जाने वाले संपादकीय पृष्ठ पर अब राजनीतिज्ञों या दल विशेष के प्रवक्ताओं की घुसपैठ हो चुकी है। संसद को अखाड़ा बना देने वाले कर्इ लंपट आजकल इस पृष्ठ पर अपनी चाटुकारिता के जौहर दिखा रहे हैं।

ये हाल सिर्फ प्रिंट मीडिया का नहीं, इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी है। ये कहना भी अनुचित नहीं होगा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया समस्त नैतिक विचारों को ताक पर रखकर सेक्स, सनसनी और अपसंसक्ति परोसने में मशगूल हो गया है। खबरिया चैनलों में संजीदा खबरों का तो जैसे सूखा पड़ गया है, खबरों की कमी को पूरा करते हैं, छोटे पर्दे के घटिया रियालिटी शो। जो रियलीटी दिखाने के चक्कर में बाथरूम तक कैमरा लगा देते हैं। फिर उठते हैं विवाद, जिन्हें सनसनी बनाकर खबरें ब्रेक करने की जंग छिड़ जाती है।

सेक्स और सनसनीखेज खबर परोसने वाले ये चैनल आम जन या उससे जुड़े सरोकारों से एक निश्चित दूरी बनाए रखते हैं। इस संबंध में भारतीय प्रेस परिषद के नवनियुक्त अध्यक्ष न्यायमूर्ति माकडेय काटजू की ये टिप्पणी काबिलेगौर है, मीडिया विशेषकर समाचार चैनल पर बुनियादी मुददों की अपेक्षा गैर जरूरी मुददों पर ज्यादा समय देते हैं। देश में 55 फीसदी लोग आर्थिक समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन मीडिया का ध्यान बहुसंख्य लोगों के हित संरक्षण पर न होकर, बालीवुड या राजनीतिक गलियारों तक सिमट गया है। अन्यथा क्या वजह है किसी सिने तारिका की गर्भावस्था पे पैकेज चलाने का ? जब देश भ्रष्टाचार से त्राहिमाम कर रहा हो, तो क्या जगह बनती है शीला की जवानी और मुन्नी की बदनामी पर चर्चा करने की ? रजिया के गुंडों में फँसने पर बड़ी स्टोरी बनाने वाले ये मीडियाकर भूल जाते हैं, गाँवों में शोषण का शिकार होने वाली लाखों लड़कियों को। अगर भूले से भी नारी शोषण पर कोर्इ स्टोरी भी की, तो उसका प्रस्तुतीकरण बेहद सनसनीखेज होता है। कौन भूल सकता है, आरूषि कांड जिसमें मीडिया ने आरूषि के पिता को दोषी बनाने में कोर्इ कसर बाकी नहीं छोड़ी थी? ऐसे एक नहीं अनेकों प्रसंग मिल जाएंगे, जहां धर्म विमुख पत्रकारों ने पत्रकारिता की कलुशित ही नहीं कलंकित भी किया है। नारी हितों का दम भरने वाले मीडिया घरानों में नारी का शोषित होना अब आम बात हो गयी है।

क्या आम आदमी मीडिया की पहुँच से दूर हो गया है ? अक्सर ये सवाल उठाया जाता है, और सच भी है देश की अधिसंख्य जनता की बुनियादी समस्याओं से आँख फेर चुकी है भारतीय मीडिया। ऐश्वर्या राय के बढ़ते पेट पर नजर रखते-रखते मीडिया आम जन से जुड़ी समस्याओं पर नजर नहीं रख पा रहा है। आश्चर्य की बात है, बढती महँगार्इ बेखौफ भ्रष्टाचार और आत्महत्या करने वाले किसानों की खबरें अब खबरिया चैनलों की सुर्खियों से दूर होती जा रही हैं। लैक्मे इंडिया फैशनवीक को कवर करने के लिए जहाँ सैकडो़ं मान्यता प्राप्त पत्रकार पहुँच जाते हैं, वहीं गरीबी से त्रस्त परिवार के सामूहिक आत्मदाह पर चुप्पी साध लेते हैं।

टी.आर.पी. और विज्ञापन की होड़ में शामिल ये खबरिया चैनल भूला बैठे हैं, नैतिकता और आदशो को। सास बहू और साजिश या राखी का इंसाफ अब प्रमुखता से दिखाये जाने वाले न्यूज कंटेंट का हिस्सा बन गया है। उस पर ब्रेकिंग खबरें, राखी तोडेंगी बाबा का ब्रहमचर्य, क्या साबित करती हैं? जो दिखता हे वो बिकता है कि तर्ज पर चलते हुए, मीडिया के ठेकेदार भूल गए हैं पत्रकारिता का धर्म। क्या छोड़े, क्या दिखायें नहीं अब चर्चा होती है, क्या न दिखायें। अत: खबरिया चैनलों पर बिग बास सरीखे दर्जनों फूहड़ रियलीटी शो को परोसने की होड़ मची रहती है। इन शोज में आधे-अधूरे कपड़ों में निहायत भद्दा प्रस्तुतिकरण देने वाली कन्याओं से क्या नारी की असिमता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगता ? कपड़ों की तरह बॉययफ्रेंड बदलने वाली सिने तारिकाएँ क्या भारतीय नारी का प्रतिनिधित्व के योग्य हैं ? लिव इन रिलेशनशिप पर बिंदास बोलने वाली बालाएँ क्या शोषित हो सकती हैं ?

जवाब हमेशा न ही होगा, मगर फिर भी इन माडर्न गर्ल्स के कासिटंग काउच’ के किस्से सुर्खियों में बने रहते हैं। राखी को न्यायाधीश मान बैठे ये खबरनवीस भूल गए हैं, न्याय की परिभाषा। न्याय की कीमत किसी निर्दोष की जान तो कभी नहीं हो सकती, लेकिन गंदा है पर धंधा है ये।

अब सवाल ये है कि निरंकुश मीडिया की लगाम कौन कसेगा। इसके तीन रास्ते हैं, पहला सरकार या सेंसर बोर्ड इनके कंटेंटस पर निगाह रखे और आवश्यकता पड़ने पर जुर्माना एवं लाइसेंस रदद करने के आवश्यक कदम उठाये। दूसरा मीडियाकर अपने स्व-विवेक से राष्ट्र की सभ्यता और संसक्ति के अनुरूप अपना प्रस्तुतिकरण करें, जिसमें संपूर्ण राष्ट्र के बहुसंख्यक वर्ग का हित चिंतन समिमलित हो। तीसरा और अंतिम विकल्प है, दर्शक ऐसे चैनलों का निषेध करें जो पीत पत्रकारिता में संलग्न हैं। अंतत: रोजाना उठने वाली इस बहस का परिणाम चाहे जो भी हो, पर इस बहस ने बटटा लगा दिया है मीडिया के चरित्र पर। मिशन से होकर प्रोफेशन तथा अंतत: सेनसेशन और कमीशन के फेर में उलझी हमारी पत्रकारिता, पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास का प्रतिनिधित्व तो कतर्इ नहीं करती। अंतत: मीडिया शुद्धिकरण की ढेरों आशाओं के साथ सिर्फ ये ही कह पाउँगा –

अब तो दरवाजे से अपने नाम की तख्ती उतार।

शब्द नंगे हो गये शोहरत भी गाली हो गयी।।

 

 

4 Responses to “मीडिया का नैतिक पतन : एक विवेचना”

  1. इंसान

    भूखे को दो और दो चार नहीं, चार रोटियां दिखतीं हैं| स्वयं में दोनों उत्पादक और उपभोक्ता स्वरूप, सामाजिक वातावरण समय के प्रवाह में मानव संघर्ष और सफलता का जीता जागता इतिहास है| जैसा बीज होगा तैसा फल होगा| जहां देश का लगभग सतहत्तर प्रतिशत जन समुदाय मात्र बीस रूपए से कम दैनिक आय पर निर्वाह कर रहा हो (अर्जुन सेनगुप्ता), वहां के अमानुषिक सामाजिक वातावरण में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ, मीडिया की क्या स्थिति होनी चाहिए? उसके नैतिक पतन होने के पहले प्रश्न होना चाहिए कि भारत में मीडिया कब और क्योकर प्रारम्भ हुआ?

    संक्षिप्त में, स्वतंत्रता के बहुत पहले कलकत्ता में अंग्रेजों द्वारा स्थापित अंग्रेज़ी भाषा में मुद्रित मीडिया द्वारा स्थानीय समाचार के अतिरिक्त देश में उनका प्रभुत्व और सत्ता बनाए रखने संबंधी सूचनाएं वितरित हुआ करती थीं| देश में विदेशी सत्ता की सेवा में लगे मूल निवासी दूसरे सरकारी विभागों की तरह मीडिया में भी कार्यरत थे| उस समय की शैक्षिक स्थिति के अनुसार साहित्य और प्रांतीय भाषा की महत्वता होने पर क्षेत्रीय भाषाओँ में मुद्रित मीडिया और लोगों में राजनैतिक सोच नहीं थी| बताया गया है कि देश विभाजन के समय स्वतंत्र भारत के नए उजागर नेताओं और विशेषकर विदेशी राज्य की सेवा करते मीडिया में राष्ट्रवाद के अभाव और राजनैतिक निपुणता और अभ्यास न होने के कारण क्षेत्रीय भाषाओं के समाचार पत्रों द्वारा खुल्लम खुल्ला आंखों देखा हाल प्रस्तुत कर पश्चिम में समूचे पंजाब और पूर्व में बंगाल में कत्लेआम के दौर में लाखों प्राणियों ने अपने प्राण गवां दिए थे| पिछले चौंसठ वर्षों से वही मीडिया भारत में सत्ताधारी कांग्रेस की सेवा में लगा हुआ है| मीडिया में कैसे नैतिक पतन की बात हो रही है?

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  2. B K Sinha

    बहुत बढ़िया सिद्धार्थ मिश्र जी आपके लेख को मै आखिरी लाइन तक साँस रोक कर पढ़ गया बेवाक तस्वीर आपने खींची है इस सम्बन्ध में मै एक बात और जोड़ देना चाहूँगा हिंदी अख़बारों के बारे में आज सम्पादकीय की इस्थिति इस प्रकार की हो गयी है जैसे पोस्टकार्ड पर लिखा हुआ समाचार वह भी इससे विस्तृत होता था .माना जमाना फास्ट चल रहा है पर इतनी बेरुखी क्यों अपनी बात को खुल कर कहने की आपने ठीक कहा पूंजीपति मालिकों के ये गुलाम है और गुलाम की क्या हैसिअत होती है यह सभी जानते है .खैर इससे भी महत्व पूर्ण बात जो मै कहने जा रहा हूँ वह है भारतीय भाषाओँ का बलात्कार खास कर हिंदी का कोई लेख हो उसमे अंग्रेजी के शब्दों की भरमार रहती है ढूँढने पर सिर्फ है मै तुम इत्यादि शब्द ही मिल पाते है वर्ना मैनोरिटी सिकुरीती कमेन्ट इत्यादि शब्दों का प्रयोग बहुतायत रूप से किया जाता है प्रभात खबर के संपादक एक हरिवंश जी है इधर वे लन्दन गए थे वहां लन्दन इस्कूल आफ इकनामिक्स में बिहार के विकास की चर्चा नामक खबर को इकठ्ठा करने के लिए गए थे वहां से आ कर प्रभात खबर में एक धाँसू सा लेख लिखा जो दो दिन तक पुरे दो ढाई पन्ने को भरे हुए थे खैर कोई बात नहीं अख़बार उनका है मेरा तो नहीं वो जितना चाहे भरे पर हिंदी से बलात्कार करने का हक़ उन्हें किस ने दिया पुरे लेख में अंग्रेजी शब्दों की भरमार थी खैर एक बढ़िया काम उन्होंने किया क़ि कोष्ठक में हिंदी अनुवाद भी देते थे इसी तरह हिंदी के शब्दों का अंग्रेजी अनुवाद कोष्ठक में दे देते थे मुझे लग रहा था क़ि मै अख़बार नहीं शब्द कोष के पन्ने उलट रहा हूँ हालाँकि इससे मेरे शब्द सामर्थ्य में वृद्धि ही हुई और वे इसके लिए धन्यवाद के पात्र भी है पर लेख का तो कबाड़ा हो गया और हिंदी बेचारी अपने फटे चीते कपड़ों में अपना लाज बचाती एक कोने में खड़ी थी तो ये हाल है हमारे हिंदी पत्रकारों और संपादकों का कभी एक जमाना था जब रघुवीर सहाय जैसे लोग दिनमान के संपादक हुआ करते थे लोग पहले सम्पादकीय पढ़ते थे फिर बाद में दूसरे अन्य लेख इसी प्रकार मै कादम्बिनी के रामानंद दोषी और साप्ताहिक हिन्दुस्थान की
    संपादिका मृणाल पांडेजी के सम्पादकीय जो पत्रिका की मुख्य आलेख हुआ करते थे इसी कई अख़बार हिंदी और अंग्रेजी के हुआ करते थे जो अपने संपादको के लेखों की वजह से बिकते थे तब क्या उन्हें पैसों की जरूरत नहीं थी नहीं उन्हें इसकी जरूरत नहीं थी वे सम्पादकीय के बहाने साहित्य रचते थे एक साप्ताहिक अंग्रेजी पत्रिका है मेन स्ट्रीम , बहुत पतली सी है पर विज्ञापन के लिए सामग्री से समझौता नहीं किया इस लिए वह एक सन्दर्भ ग्रन्थ की तरह बनता जा रहा है पीत पत्रकारिता और भोंडे चैनल इतिहास नहीं रच सकते है हाँ स्वाद जरूर बिगाड सकते है और जनमानस यह कभी समझ नहीं पायेगा कि अच्छी चीज क्या होती है.
    धन्यवाद
    बिपिन कुमार सिन्हा

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    • सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

      siddhartha mishra

      धन्यवाद आपके प्रोत्साहन से मुझे प्रेरणा मिलेगी

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