व्यंग्य

कुत्तों की गिनती

पीयूष त्रिपाठी

बेसिक शिक्षा विभाग ने ऐतिहासिक आदेश जारी कर परिषदीय स्कूलों के शिक्षकों को सड़कों पर घूमने वाले आवारा कुत्तों की खोज और ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित करने का पावन दायित्व सौंपा है जहां पर कुत्तों का आतंक है। आखिरकार, पढ़ाना-लिखाना तो कोई भी कर लेगा लेकिन कुत्तों की गिनती और उनसे इंसानों को बचाने जैसे राष्ट्रीय महत्व का कार्य केवल शिक्षक ही कर सकते हैं।

दरअसल कुत्तों को लेकर हमारा समाज दो धड़ों में बंटा हुआ है। पहली श्रेणी वाले लोग किसी भी तरह के कुत्तों से बचना चाहते हैं जबकि दूसरी श्रेणी में आने वाले लोग आवारा कुत्तों तक को बचाने के लिए उनके प्रवक्ता बनकर आंदोलन पर उतर आते हैं। कुछ लोगों के लिए उनका कुत्ता ब्रूनो, टॉमी या शेरु होता है – क्यूट, लविंग, केयरिंग और इंटेलीजेंट। ऐसे लोग दूसरों से भी यह उम्मीद करते हैं कि बाकी सब भी उनके कुत्ते- ब्रूनो, टॉमी या शेरू को उनकी नजर से ही देखें। दूसरी श्रेणी में आने वाले लोग हर तरह के कुत्ते को कुत्ता ही समझते हैं, भले ही आप उन्हें अलसेशियन, जर्मन शेफर्ड, रोटवेलर और देसी कुत्ते के बीच का फ़र्क समझाने में कितनी ही माथापच्ची कर लें।

अच्छा तो यह होता कि कुत्तों की गणना के साथ-साथ कुत्ता प्रेमियों और कुत्ते से आतंकित लोगों की भी गणना कर ली जाती। फिर दोनों के बीच एक राष्ट्रीय सुलह सम्मेलन आयोजित किया जाता जिसमें यह तय होता कि आखिर कुत्तों का भविष्य क्या होना चाहिए? समाज में कुत्ता प्रेमियों और कुत्तों से नफरत करने वालों का एक साथ बना रहना सामाजिक वैमनस्य का कारण बन सकता है। समाज की भलाई इसी में है कि सब लोग मिल-जुल कर रहें। इसके लिए जागरूकता रैली, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर प्रतियोगिता और काउंसलिंग कैंप की जरूरत होगी। शिक्षक इस काम के लिए सबसे उपयुक्त सिद्ध हो सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वे हर दूसरे काम के लिए सिद्ध होते हैं।

आतंक तो बंदरों ने भी कम नहीं मचा रखा। पूरे कबीले के साथ वे आपके घर में बिना आमंत्रण के धावा बोल देते हैं और नुकसान करके चले जाते हैं। क्या ऑफ़िस, क्या स्कूल-कॉलेज, क्या अस्पताल और क्या रेलवे स्टेशन, उनका आतंक हर जगह फैला है। कुछ जगहों पर लाल रंग के बंदरों के आतंक का मुकाबला करने के लिए काले रंग वाले बंदरों के कट आउट लगाए गए हैं। बंदर तो बंदर ही होता है। कम से कम उन्हें तो अलग-अलग रंग में न बांटकर रंगभेद समाप्त किया जा सकता है। जैसे कुत्तों को पालतू बना कर उनका समाजीकरण किया जा चुका है, वैसे ही बंदरों को पालतू बनाकर उनका संरक्षण जरूरी है। बंदर को इंसान का पूर्वज कहा जाता है। पूर्वजों की पहचान और गणना की जिम्मेदारी भी शिक्षकों को ही मिलनी चाहिए। इंसानों को समझना है तो बंदरों को समझना जरूरी है। समझ, समाजीकरण और सद्भाव संवर्धन के काम को शिक्षकों से बेहतर और कौन अंजाम दे सकता है?

बंदर और कुत्तों के अलावा समस्या छुट्टा साँड़ों और नीलगायों से भी होती है। सांड को अगर छुट्टा छोड़ दिया जाए तो वह बिना किसी बात के किसी को भी सींग मार सकता है। नीलगाय खड़ी फसल को नष्ट कर देती है और कई मामलों में सड़क दुर्घटना का कारण भी बनती है। दीमक, सांप, चूहे या तो इंसानों का नुकसान करते हैं या फिर सामान बर्बाद कर देते हैं। भेड़ियों की पहचान थोड़ा मुश्किल काम है। वैज्ञानिक भेड़िये को कुत्ते की प्रजाति के अंतर्गत रखते हैं। कुछ भेड़िए इंसानों की खाल में छिपे हो सकते हैं। समाज को बचाने के लिए भेड़ियों की सही पहचान जरूरी है। इस नाज़ुक कार्य के लिए भी शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण देकर तैनात किया जा सकता है।

कुत्ते अपना भाग्य मनाएं कि उन्हें गिनने में इतनी तत्परता दिखाई जा रही है। इंसानों की गिनती ड्यू होने के पांच साल बाद तक भी नहीं हो पाई। जो इंसान से ऊपर उठकर मतदाता हो गए, वे इस मामले में भाग्यशाली हैं। परिषदीय विद्यालयों के शिक्षक बीएलओ बनकर उनका एसआईआर करने में व्यस्त हैं। प्राथमिक स्कूलों के बच्चे अभी भले ही प्राथमिकता का विषय न हों, जब बड़े होकर मतदाता बनेंगे तब शिक्षकों के ध्यानाकर्षण का केंद्र बन ही जायेंगे।

अगर सदियों से गधों को इंसान बनाने की जिम्मेदारी शिक्षकों ने उठाई है तो आवारा कुत्तों, सांपों, चूहों, नीलगाय, बंदरों और भेड़ियों से समाज को बचाने का फर्ज भी शिक्षकों को ही निभाना चाहिए। इसे उनकी योग्यता का विस्तार समझा जाए, नौकरी का अपमान नहीं।

इसी साल मध्य प्रदेश ने आँकड़े जारी कर बताया था कि गधों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। देश में गधों की घटती संख्या गंभीर चिंता का विषय है। राष्ट्रीय स्तर पर गधों की स्थिति का सही आकलन करने के लिए ‘अखिल भारतीय गधा संवर्धन परियोजना’ चलाई जानी चाहिए जिससे पूरे देश में गधों की स्थिति को बेहतर बनाने का ब्लू प्रिंट तैयार किया जा सके। गधों की पहचान और उनकी गिनती करने के लिए शिक्षकों से बेहतर और कौन हो सकता है? 

समाज सुधार के लिए जरूरी है कि समस्या की सही तरीके से पहचान हो सके। समस्या के सटीक आकलन के लिए डाटा चाहिए, आख़िर नीतियां तो डाटा के ही अनुसार बनेंगी। बाबू लोगों के पास पहले से ही इतना काम है कि उन्हें काम करने का वक्त नहीं मिल पा रहा। ऐसे में समस्या से निबटने का सबसे बढ़िया उपाय यह है कि शिक्षकों को ही काम पर लगा दो। 

आखिर जब भारत ‘विश्व गुरु’ बन चुका है तो उसके गुरुओं में यह योग्यता होनी ही चाहिए कि वे पढ़ाई लिखाई के अलावा चुनाव ड्यूटी, जनगणना, मतगणना, पशु गणना, कुत्ता गणना, गधा गणना, मिड डे मील, ड्रेस का वितरण, शौचालय की सफाई, दुल्हन का मेक अप, फॉलिक एसिड की टेबलेट का वितरण, किसानों को मोटे अनाज की पैदावार बढ़ाने को प्रोत्साहित करना, संचारी व कृमि रोगों से बचाव करना हेतु जागरूकता रैलियाँ निकालना, पोलियो ड्रॉप पिलाने आदि के साथ मोबाईल एप के माध्यम से हर गतिविधि को दर्ज कर अपडेट करते रहें। यह उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का नमूना भर है। 

जब शिक्षकों के लिए साल भर केवल अलग अलग तरह की गणना का ही काम बचा है, तो शिक्षा विभाग का नाम बदल कर गणना विभाग कर देना चाहिए और शिक्षकों को उनके दायित्वों के अनुसार गणना मित्र, गणना वीर, गणना सहायक, गणना सुपरवाइजर, सहायक गणना अधिकारी, प्रधान गणना अधिकारी और गणनाधीश आदि का नाम रख देना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह होना चाहिए कि विद्यालयों का नाम गणना केंद्र करके पठन पाठन को को-करिकुलर गतिविधि घोषित कर दिया जाए।

पीयूष त्रिपाठी