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त्योहारों पर ‘कल्चरल अटैक’

( परंपरा, बाज़ार और बदलती पहचान) 

-डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत की सांस्कृतिक संरचना में त्योहारों का स्थान केवल आनंद और उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समाज की ऐतिहासिक स्मृति, आर्थिक संरचना, प्रकृति के साथ संबंध और मानवीय संवेदनाओं के गहरे ताने-बाने से जुड़े होते हैं। यहाँ त्योहार जीवन के हर पहलू को स्पर्श करते हैं—खेती, ऋतु परिवर्तन, पारिवारिक संबंध, सामूहिकता और आस्था। लेकिन वर्तमान समय में यह प्रश्न गंभीरता से उठाया जाने लगा है कि क्या हमारे पारंपरिक त्योहार अपनी मूल आत्मा से दूर होते जा रहे हैं? क्या उन पर एक प्रकार का ‘कल्चरल अटैक’ हो रहा है, जो धीरे-धीरे उनकी असल पहचान को बदल रहा है?

‘कल्चरल अटैक’ शब्द भले ही आक्रामक प्रतीत होता हो, लेकिन इसका आशय किसी एक वर्ग या समूह पर आरोप लगाना नहीं है। यह उस धीमी, सूक्ष्म और कई बार अनदेखी प्रक्रिया की ओर संकेत करता है, जिसके माध्यम से परंपराएँ अपने मूल सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ से हटकर नए अर्थ ग्रहण करने लगती हैं। यह परिवर्तन कभी स्वाभाविक होता है, तो कभी सुनियोजित आर्थिक और वैचारिक प्रभावों का परिणाम भी हो सकता है।

भारतीय त्योहारों की जड़ें मुख्यतः कृषि और प्रकृति से जुड़ी रही हैं। देश का अधिकांश समाज सदियों तक कृषि-आधारित रहा है, इसलिए फसल, मौसम और भूमि के साथ उसका गहरा रिश्ता रहा। फसल कटने की खुशी, नई बुवाई की शुरुआत, वर्षा के आगमन का स्वागत—ये सब त्योहारों के माध्यम से व्यक्त होते थे। इन उत्सवों में किसान केंद्र में होता था, क्योंकि वही अन्न का उत्पादक था और वही समाज की जीवन-रेखा को बनाए रखता था। ऐसे त्योहारों में आडंबर कम और सहभागिता अधिक होती थी। लोग मिलकर गाते-बजाते, सामूहिक भोज करते और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते थे।

लेकिन जैसे-जैसे समाज में शहरीकरण बढ़ा, औद्योगिकीकरण हुआ और बाजार की ताकतें मजबूत हुईं, त्योहारों का स्वरूप भी बदलने लगा। अब त्योहारों को केवल सांस्कृतिक या सामाजिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक अवसर के रूप में भी देखा जाने लगा। बाजार ने त्योहारों को उपभोग से जोड़ दिया—जहाँ खरीदारी, सजावट और प्रदर्शन को प्रमुखता मिलने लगी। त्योहारों के साथ ‘ऑफर’, ‘डिस्काउंट’ और ‘शुभ खरीदारी’ जैसे विचार जुड़ गए, जिसने उनके मूल स्वरूप को प्रभावित किया।

यह बदलाव केवल बाहरी नहीं है, बल्कि मानसिकता में भी आया है। पहले त्योहारों का अर्थ था—मिलना-जुलना, साझा करना और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना। अब कई जगहों पर यह प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुका है—किसने कितना खर्च किया, किसने क्या खरीदा, किसका आयोजन कितना भव्य था। इस प्रक्रिया में त्योहारों की आत्मा कहीं पीछे छूटती चली गई।

त्योहारों पर ‘कल्चरल अटैक’ की चर्चा करते समय एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—लोक परंपराओं का हाशिए पर जाना। भारत में हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट परंपराएँ रही हैं, जो स्थानीय जीवनशैली, भाषा और संसाधनों से जुड़ी होती थीं। लेकिन आज मीडिया और बाजार के प्रभाव में एक प्रकार की सांस्कृतिक एकरूपता (cultural homogenization) देखने को मिल रही है। कुछ खास त्योहारों और उनके खास तरीकों को पूरे देश में मानक बना दिया गया है, जिससे स्थानीय विविधताएँ धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं।

उदाहरण के लिए, कई ऐसे लोकपर्व जो कभी कृषि और ग्रामीण जीवन से जुड़े थे, अब शहरी और धार्मिक व्याख्याओं में बदल गए हैं। उनकी मूल भावना—जो श्रम, प्रकृति और सामूहिकता से जुड़ी थी—अब पौराणिक कथाओं और बाजार-प्रेरित प्रतीकों के पीछे दबती जा रही है। इससे समाज के उस वर्ग की भूमिका कम होती जा रही है, जो वास्तव में इन त्योहारों की आत्मा रहा है—यानी किसान और श्रमिक।

यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि हर बदलाव को नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। संस्कृति का स्वभाव ही परिवर्तनशील होता है। समय के साथ उसमें नए तत्व जुड़ते हैं, और यही उसकी जीवंतता का प्रमाण है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यह परिवर्तन असंतुलित हो जाता है—जब वह समाज के मूल आधार को कमजोर करने लगता है।

आज के संदर्भ में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम अपने त्योहारों के मूल अर्थ को समझ पा रहे हैं? क्या हम यह पहचान रहे हैं कि वे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रतिबिंब भी हैं? यदि त्योहारों में किसान की भूमिका को भुला दिया जाता है, यदि श्रम के सम्मान को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह एक गंभीर सांस्कृतिक असंतुलन का संकेत है।

त्योहारों को बाजार से पूरी तरह अलग करना संभव नहीं है, और न ही यह आवश्यक है। बाजार भी समाज का ही एक हिस्सा है और वह अपनी भूमिका निभाता है। लेकिन यह जरूरी है कि बाजार त्योहारों की आत्मा पर हावी न हो। उपभोग और आडंबर के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि त्योहारों की मूल भावना जीवित रह सके।

इस दिशा में समाज की जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि लोग स्वयं यह समझें कि त्योहारों का वास्तविक अर्थ क्या है, तो वे उन्हें उसी भावना के साथ मनाने का प्रयास करेंगे। स्थानीय परंपराओं को पुनर्जीवित करना, सामूहिक आयोजनों को बढ़ावा देना और प्रकृति के साथ अपने संबंध को मजबूत करना—ये कुछ ऐसे कदम हैं, जो इस सांस्कृतिक असंतुलन को कम कर सकते हैं।

शिक्षा और मीडिया की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि वे त्योहारों की गहराई और उनके सामाजिक संदर्भ को सही तरीके से प्रस्तुत करें, तो समाज में जागरूकता बढ़ सकती है। इसके साथ ही, नीति-निर्माताओं को भी इस दिशा में विचार करना चाहिए कि कैसे लोकसंस्कृति और ग्रामीण परंपराओं को संरक्षित और प्रोत्साहित किया जाए।

अंततः, ‘कल्चरल अटैक’ का मुकाबला किसी एक दिन या एक प्रयास से नहीं किया जा सकता। यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें समाज के हर वर्ग को अपनी भूमिका निभानी होगी। हमें अपने त्योहारों को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में भी देखना होगा—एक ऐसी जिम्मेदारी, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखे।

त्योहारों की असली शक्ति उनकी भव्यता में नहीं, बल्कि उनकी सादगी और अर्थपूर्णता में है। यदि हम इस बात को समझ सकें और अपने जीवन में उतार सकें, तो कोई भी ‘कल्चरल अटैक’ हमारी सांस्कृतिक पहचान को कमजोर नहीं कर पाएगा। बल्कि, हम अपनी परंपराओं को नए समय के साथ संतुलित करते हुए उन्हें और अधिक समृद्ध बना सकेंगे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने त्योहारों को फिर से परिभाषित करें—उन्हें उपभोग का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव, प्रकृति के सम्मान और श्रम की गरिमा के उत्सव के रूप में देखें। तभी हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को सही मायने में सहेज पाएंगे और आने वाली पीढ़ियों तक उसकी मूल भावना को पहुँचा सकेंगे।

डॉ. प्रियंका सौरभ