बिहार में वर्तमान राजनीति, सिद्धांत और नैतिक चेतना से खाली

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-आलोक कुमार-   nitish

हर समय तुष्टीकरण व धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाले हमारे प्रदेश (बिहार) के मुखिया ने जनता से जैसी दूरी बनाई है ऐसे मुखिया से कभी सुशासन की अपेक्षा की जा सकती है क्या ? बिहार का गिरता राजनैतिक स्तर और चुनावी राजनीति को ध्यान में रखकर की जा रही तुष्टीकरण का परिदृश्य चिंतनीय विषय है। हालांकि बिहार ही वो राज्य है जिसका आरंभ से ही भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। स्वतंत्रता आन्दोलन से लेकर आजतक यहां से देश को न केवल बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ मिले हैं, बल्कि राजनीतिक मार्गदर्शन भी मिलता रहा है। दरअसल, यह वही धरती है जहां लोकतंत्र का जन्म हुआ। वैशाली विश्व का पहला लोकतांत्रिक राज्य था। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान राजनीति में अहिंसा का अध्याय यहीं से जुड़ा। चम्पारण का भारतीय इतिहास में विशेष स्थान है। स्वतंत्रता के दो दशक बाद जब देश में लोकतंत्र के आधारभूत मूल्यों पर कुठाराघात हुआ तो सम्पूर्ण स्वतंत्रता के लिए क्रांति का बिगुल यहीं फूंका गया। 70 के दशक में जेपी मूवमेंट का अभिकेन्द्र बिहार ही था।

कैसी विडंबना है कि आज उसी बिहार में वर्तमान राजनीति, सिद्धांत और नैतिक चेतना से खाली होती जा रही है ! पग-पग पर लोकतंत्र का मखौल उड़ाया जा रहा है। बिहार की जनता को “मदारी का बन्दर” समझा जा रहा है । ऐसा लगता है कि जातीय संकीर्णता, तुच्छ व सीमित उद्धेश्य और भ्रष्ट व् अतिशय महत्वाकांक्षा वाले राजनीतिज्ञों के भ्रम जाल ने बिहार की अस्मिता का ही अपहरण कर लिया है । ऐसा दिखाया जा रहा है कि यहां सब कुछ ठीक और सटीक है जबकि सच्चाई वीभत्स है। लोकतंत्र और समाजवाद की दुहाई देकर लोकतंत्र और समाजवाद की मूल अवधारणा को ही क्षरित किया जा रहा है। “जनता जनार्दन” ना हो कर “मर्दन” की विषय-वस्तु हो गयी है।

इनका मकसद एक ही है – किसी भी तरह अल्पसंख्यक समुदाय के थोक वोट मिल जाएं, ताकि अपनी अक्षमता को छुपा कर चुनाव जीते सकें। यदि अल्पसंख्यक समुदाय यह विचार कर लें कि हम उन्हें ही अपना मत देंगे, जो प्रत्याशी योग्य होगा, तब इन जैसे अधिकांश नेताओं का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि तब इन्हें अपने कार्य की गुणवता के आधार पर जनता से वोट मांगने पड़ेंगे और यह इनके लिए मुश्किल होगा। किसी राजनीतिक दल या नेता की अनुकम्पा से धर्म और जाति की सुरक्षा नहीं होती। धर्म का संबंध आस्था से जुड़ा हुआ है। आस्था कभी टूटती नहीं है और न ही इसे कोर्इ तोड़ पाता है। किसी भी राजनीतिक दल का शासन आने से न तो किसी धर्म पर कोर्इ आंच आएगी और न ही सद्भाव बिगड़ेगा। इसका जीवंत उदाहरण पिछले ग्यारह वर्षों का गुजरात है। पिछले ग्यारह वर्षों से गुजरात साम्प्रदायिक सदभाव की दृष्टि से देश का सबसे शांत प्रदेश बना हुआ है। पिछले ग्यारह वर्षों से गुजरात के किसी शहर में सेना तो क्या पुलिस भी नहीं बुलानी पड़ी है। इसका कारण यह है कि प्रदेश की सरकार ने अपनी प्रशासनिक क्षमता के बूते जनता में अपना विश्वास बनाया है।

गुजरात में मोदी की सरकार दो बार सत्ता में वापस इसलिए नहीं आयी कि उसने वोटों का ध्रुवीकरण कर दिया था, वरन इसलिए आयी कि उसने प्रदेश के विकास को प्राथमिकता दी थी। मोदी ने केवल विकास का मिथ्या प्रचार नहीं किया बल्कि विकास के आयामों को मूर्त रूप प्रदान किया, इस तथ्य को मोदी विरोधी भी निजी तौर पे मानते हैं। मैं गुजरात के ग्रामीण इलाकों में गया हूं और सार्वजनिक जीवन में भी गुजरात से जुड़े लोगों के सम्पर्क में रहता हूं। गुजरात का विकास दिखता है और गुजरात से जुड़े लोगों को मोदी की सरकार से गुरेज नहीं है। एक उदाहरण ही काफ़ी है जिस से गुजरात और बिहार के विकास का अन्तर साफ़ हो जाएगा ( ये जानकारी श्रद्धेय श्री जितेन्द्र राय जी के माध्यम से प्राप्त हुई है। श्री राय गुजरात में रहते हैं , मूलतः उत्तर प्रदेश के निवासी हैं , और इनके पास गुजरात में कृषि-योग्य जमीन है )। गुजरात की सरकार अपने किसानों की कृषि-योग्य जमीनों की मिट्टी की गुणवता की जांच करवाकर किसानों को ” SOIL HEALTH- CARD “उपल्ब्ध करवाती है ताकि किसानों को ये जानकारी और सहूलियत हो सके कि कौन सी फ़सल किस मिट्टी में उगानी है।

बिहार का सच्चे मायनों में विकास तब ही होगा जब हम अपने भविष्य के लिए संवेदनशील बनकर अपने मतदान का सही प्रयोग करेंगे। मेरा मानना है कि “सियासत यदि समाज व प्रदेश में विभ्रम की स्थिति बनाना चाहता है, तो ऐसी सियासत से दूरी बना लेनी चाहिए और बिहार में वो समय आ गया है ; बाकी तो बिहार की जनता के हाथों में है ! बिहार की अभागी जनता को घृणित राजनीति के भंवर से बाहर निकलने का रास्ता खुद ही ढूंढ़ना होगा।

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