बांध का उद्घाटन से पहले ही ढह जाना!

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ललित गर्ग – एक बांध उद्घाटन होने से पहले ही ढह गया, भ्रष्टाचार के एक और बदनुमे दाग ने राष्ट्रीय चरित्र को धंुधलाया है, समानान्तर काली अर्थव्यवस्था इतनी प्रभावी है कि वह कुछ भी बदल सकती है, कुछ भी बना और मिटा सकती है। यहां तक की लोगों के जीवन से खिलवाड़ भी कर सकती… Read more »

बड़ी अदालत में बड़ा अन्याय

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भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आप किसी भी भारतीय भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते। हिंदी का भी नहीं। हिंदी राजभाषा है। यह हिंदी और राज दोनों का मजाक है। यदि आप संसद में भारतीय भाषाओं का प्रयोग कर सकते हैं तो सबसे बड़ी अदालत में क्यों नहीं? सबसे बड़ी अदालत में सबसे बड़ा अन्याय है, यह ! देश के सिर्फ चार उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग हो सकता है- राजस्थान, उप्र, मप्र और बिहार! छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु ने भी स्वभाषा के प्रयोग की मांग कर रखी है।

बढ़ते अपराध एक बार फिर से बिहार को बदनामी की किसी नयी टैगिंग से नवाज देंगे …..

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वर्तमान मुख्यमंत्री जी का पहला कार्यकाल अपराध नियंत्रण के लिए ही जाना जाता है और इसको लेकर मुख्यमंत्री जी ने काफी सुर्खियां भी बटोरी थीं , लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल से मुख्यमंत्री जी का सर्वोपरि एजेंडा राष्ट्रीय फलक पर छाने और खुद की छवि को खुद ही चमकाने का हो गया और यहीं से अपराध नियंत्रण की कमान ढीली होनी शुरू हुई … मैं मानता हूँ कि आंकड़ों के हिसाब से कई अन्य प्रदेशों से बिहार में अपराध अभी भी कम है और अराजक स्थिति जैसी नौबत

नकारात्मक संघर्ष पर टिकी बिहार की डर्टी पॉलिटिक्स का यही असली रूप रंग है

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  अभीअभी निवृत्त हुए याने भूतपूर्व हुए बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम माझी का पटना में धरना- ड्रामा खत्म भी नहीं हुआ कि चौथी बार पुनः तख्तनशीन हुए वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश भी उपवास पर बैठ गए। माना कि जीतनराम तो महज ‘उतारा’ कर रहे हैं। किन्तु नीतीश को क्या हो गया ? क्या अरुण जेटली द्वारा… Read more »

बिहार में वर्तमान राजनीति, सिद्धांत और नैतिक चेतना से खाली

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-आलोक कुमार-    हर समय तुष्टीकरण व धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाले हमारे प्रदेश (बिहार) के मुखिया ने जनता से जैसी दूरी बनाई है ऐसे मुखिया से कभी सुशासन की अपेक्षा की जा सकती है क्या ? बिहार का गिरता राजनैतिक स्तर और चुनावी राजनीति को ध्यान में रखकर की जा रही तुष्टीकरण का परिदृश्य… Read more »

“सड़ता हुआ अनाज और सुप्त-सुशासन”

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– आलोक कुमार-    बिहार एक तरफ़ तो कुपोषण से ग्रस्त है, सूबे की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अनाज के लिए लालायित है। इस साल अकाल की मार भी झेली जनता ने, दूसरे राज्यों से अनाज मंगाया जा रहा है तो दूसरी तरफ प्रशासन के परिसर में ही अनाज की बर्बादी बदस्तूर जारी है।… Read more »

समाजवाद पर आधारित लोकतांत्रिक मूल्यों का कैसा स्वरूप है सुशासनी बिहार ?

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-आलोक कुमार-   सुशासन बाबु (नीतीश कुमार) इसके लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं कि देश और बिहार की जनता उन्हें सिद्धांतवादी स्वीकार करे। इसलिए वे बीच-बीच में समाजवाद, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया इत्यादि का नाम भी उच्चारित करते रहते हैं। लेकिन देश की जनता, विशेषकर बिहार की जनता उनकी असलियत से वाकिफ़ हो चुकी है कि उनके खाने के… Read more »

समग्र विकास का दावा छलावा नहीं तो और क्या है ?

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-आलोक कुमार-   सामाजिक समीकरणों से सत्ता को साधने की कोशिश कोई स्थायी नतीजे नहीं दे सकती, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक दिशा का निर्माण करती है जिसमें जनता को “सताया” ज्यादा जाता  है और जनता की “सेवा” कम की जाती है। आज यही हो रहा है  बिहार में। आजकल बिहार में एक और महत्त्वपूर्ण ‘मिशन’ जारी है… Read more »

इस बिहार का विकास क्‍यूं नहीं

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सरिता कुमारी  पिछले कुछ दशकों में देश के जिन राज्‍यों ने विकास की नई परिभाषा गढ़ी है उनमें बिहार का नाम सबसे उपर लिखा जा सकता है। कभी कुव्यवस्था और पिछड़ेपन का दंश झेलने वाला बिहार अब विकास की नई उचांईंयां छू रहा है। देश के कई नामी-गिरामी औद्योगिक घरानों ने राज्य में भारी निवेश… Read more »

बिहार के बाढ़ ग्रसित क्षेत्रों में सरकार की स्‍वास्‍थ्‍य नीति

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निशात खानम  बिहार के बदलते परिदृश्‍य का समाज के सभी वर्गों ने स्वागत किया है। आशाओं और आंकाक्षाओं के अनुरूप राज्य सरकार ने जिन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा ध्यान दिया है उनमें स्वास्थ्य सेवा भी शामिल है। इनके लिए सरकार ने जमीनी स्तर से योजनाओं को अमल में लाना शुरू किया है। प्राथमिक चिकित्सालयों, जिला… Read more »