‘दलित उद्धारक’ पत्रकारों के नाम खुला पत्र

Open-Letter-To-Journalistsनमस्ते भाई,
हो सकता है कि आपको मेरे संबोधन से भी आपत्ति हो क्योंकि रिश्तों की पवित्रता से अधिक महत्व आप भौतिकता को देते हैं लेकिन मैं साफ कर दूं कि इस पत्र में जो कुछ भी है वह एक राष्ट्रवादी लिख रहा है। एक ऐसा राष्ट्रवादी जो किसी तथाकथित राष्ट्रवादी राजनीतिक पार्टी का अंधभक्त नहीं है लेकिन उसे अपनी संस्कृति और सभ्यता पर बहुत गर्व है। आपसे निवेदन है कि कृपया अगले 10 मिनट के लिए आपने जिस भी ‘वाद’ का चश्मा पहन रखा है, उसे उतार कर रख दें और फिर इस पत्र को पढ़ें।

मैं पिछले कई सालों से जानने की कोशिश कर रहा था कि आखिर वामपंथियों की मूल समस्या क्या है? वे पत्रकारिता जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ धोखा कैसे कर सकते हैं, वे पत्रकार होते हुए भी अपनी कुत्सित मानसिकता पर ‘मानवतावाद’ का चोंगा डालकर पूरे देश पर थोपने का प्रयास कैसे कर सकते हैं? ऐसे कई सवाल मन में आते थे लेकिन इनका उत्तर मिलना नामुमकिन सा लगता था। इसका कारण यह था कि वामपंथी विचारधारा से संबन्ध रखने वाले जिन पत्रकारों या पत्रकारिता के शिक्षकों से मेरा संवाद होता था, वे एक सीमा तक ही वामपंथ को मानते थे। वे एक सीमा में थे शायद इसीलिए मेरा और उनका संवाद हो पाता था। लेकिन पिछले 2 सालों में मेरे सामने वामपंथ का जो रूप आया उसने मुझे पूरी तरह से हिलाकर रख दिया।

आप कहते हैं भारत में सवर्णों ने दलितों पर अत्याचार किए, क्या आपने वह इतिहास नहीं पढ़ा है जिसमें सामान्य वर्ग के जो लोग इस्लाम स्वीकार नहीं करते थे उनसे मुगल शासकों द्वारा मैला उठवाया जाता था। क्या आपने वह इतिहास नहीं पढ़ा है जिसमें वे लोग सहनशीलता की पराकाष्ठा का प्रदर्शन करते हुए अपना शीलभंग तक करवा लेते थे। मैं मानता हूं कि कुछ तथाकथित सनातनी पूजा पद्धति को मानने वालों ने ऐसे लोगों को खुद से दूर कर दिया, उन्हें मंदिरों में नहीं जाने दिया लेकिन साहब आप उस दौर का वह इतिहास क्यों भूल जाते हैं, जब मेरे कुल के बड़े, विनायक दामोदर सावरकर ने तथाकथित सवर्ण होते हुए भी ‘अपनों’ के विरोध में अछूत माने जाने वाले वर्ग को मंदिर में प्रवेश दिलवाया था। और यह सब उन्होंने उसी उद्देश्य के साथ किया था जिस उद्देश्य के साथ आज मैं यह पत्र लिख रहा हूं।

आप अपने नाम के आगे ‘सवर्ण सूचक शब्द’ इसलिए लगाते हैं ताकि जब दलित उद्धार के नाम पर कोई आग भड़के तो उस आग में घी डालते हुए आप जता सकें कि देखो, हम सवर्ण होते हुए भी दलितों के साथ खड़े है… आप ऐसा इसलिए करते हैं ताकि जो वामपंथ पूरी दुनिया से शून्य के स्तर तक पहुंचता जा रहा है उसे दलितों के सहारे समाज में प्रतिस्थापित कर सकें। आप संघ को गालियां देते हैं, मैं संघ को बहुत करीब से जानता हूं और पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि संघ की मूल विचारधारा में कहीं कोई बुराई नहीं है। और बुराई होगी भी कैसे, जिस संगठन के एक-एक सिद्धान्त पर लोगों ने बिना किसी स्वार्थ के अपना जीवन खपा दिया उसमें बुराई की संभावना तो नगण्य हो जाती है। मैं जिस संगठन से आता हूं वहां ना ही किसी की जाति पूछी जाती है और ना ही जाति के आधार पर किसी को सम्मान दिया जाता है। लेकिन जब आपसे संघ की बात करो तो आप बजरंग दल, साध्वी प्राची और बीजेपी पर आ जाते हैं।

अरे, संघ की मूल विचारधारा पर बात करिए ना। वामपंथ के नाम पर पूरे देश में गिने-चुने लोग बचे हैं फिर भी आपके समर्थक ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ एवं ‘भारत मुर्दाबाद’ के नारे लगाते हैं और उनके मामले पर आप कह देते हैं कि किस-किस को नियंत्रण में रखें? अरे साहब, आप चार लफंगों पर नियंत्रण नहीं रख सकते और उम्मीद करते हैं कि संघ की शाखा में कभी-कभार गए लोगों पर विश्न का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन पूर्ण नियंत्रण रखें। अरे! आपके पूरे देश में आपके जितने कार्यकर्ता हैं उससे कहीं अधिक संघ के स्वयंसेवक अपना अलग संगठन बनाकर दुनिया भर में बिना किसी स्वार्थ के काम कर रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा वर्ग के दौरान मेरे प्रांत प्रचारक ने अपने वक्तव्य के दौरान कहा था कि हम संघ के स्वयंसेवक हैं, ऐसा व्यवहार में आना चाहिए… मैंने उसे माना और वापस आने के बाद जब 11वीं की परीक्षा के दौरान रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरा तो अपना जातिसूचक शब्द हटा दिया… वर्तमान जातिव्यवस्था को खत्म करने के लिए मैंने स्वयं से शुरुआत की… और यही कारण है कि जब आपसे बात करता हूं तो आप तर्कहीन हो जाते हैं… इसके विपरीत एक बार अपने बारे में सोचिए, आप तो पहला सवाल ही यही करते हैं कि ‘कौन जात हो?’ हद हो गई यार, लेकिन अब यह नहीं चलेगा कि तुम खेलो तो गोल्फ और हम खेलें तो कंचा।

मैं अगर जाति व्यवस्था की मूल अवधारणा आपको समझाने की कोशिश करता हूं तो आप कहते हैं कि तुम जातिवाद के समर्थक हो, तुम्हें अपने सवर्ण होने पर गर्व है, तुम्हारे इसी गर्व के कारण दलित पिछड़ गए हैं। अरे भइया, मैं जातिवाद का समर्थक नहीं हूं, मैं मानता हूं कि वर्तमान जाति व्यवस्था हमारे लिए सबसे बड़ी समस्या है। लेकिन उसके मूल रूप को नकार देना मेरे बस में नहीं क्योंकि मैं उसका अध्ययन कर रहा हूं। जिसे आज आप सवर्ण कहते हैं, मैं उसका हिस्सा नहीं हूं। ‘मैं श्रेष्ठ हूं’, ऐसा मानना गलत नहीं है लेकिन सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ हूं यह कहना और मानना पूर्णतया गलत है। स्वयं को श्रेष्ठ मानने और श्रेष्ठ होने में कोई बुराई नहीं है… मैं चाहता हूं कि सभी श्रेष्ठ हों और स्वयं को श्रेष्ठ मानें। आखिर जो हैं उसे मानने में क्या बुराई है? बशर्ते पहले सभी श्रेष्ठ हों तो… और इसमें हम सबकी जिम्मेदारी है कि श्रेष्ठ बनें और दूसरों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करें, हम तो उस परंपरा के लोग हैं जो ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ में विश्वास रखते हैं। यानि सिर्फ मैं ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व श्रेष्ठ बने। अब अगर आपको श्रेष्ठ बनने में भी बुराई नजर आती है तो यह आपका दृष्टिदोष है और इसके लिए आपको किसी चिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि इसका इलाज कोई चिकित्सक कर ही नहीं सकता।

बांटने की राजनीति तो आपकी विचारधारा के कारण आपके व्यवहार में व्याप्त हो गई है। आपको सीधी सी बात समझाने की कोशिश करो कि कर्म के आधार पर जाति व्यवस्था का निर्धारण किया गया था तो आप कहते हो कि ब्राह्मण को मुख से और शूद्र को पैर से क्यों निकला हुआ बताया। अरे पैर कौन सी खराब चीज है, मैं जिस परंपरा से आता हूं उसमें अगर हनुमान अपने बाल्य काल में सूर्य के अहंकार को तोड़ने के लिए अपना मुख बड़ा करके भानु को अपने मुख तो रख लेते हैं तो वहीं राजा बली के भक्ति भाव से परिपूर्ण अहंकार को तोड़ने के लिए वामन रूप में उस ईश्वर स्वरूप को अपने पैरों का उपयोग ही करना पड़ता है।

मैं साफ-सफाई करने को जब एक सामान्य कर्म बताता हूं तो आप कहते हैं कि वह कोई बड़ी बात नहीं। वास्तव में यह कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि मैं जिस संगठन से आता हूं उसके प्रशिक्षण वर्ग में ‘श्रम साधना’ नाम का एक कालांश होता है, उसमें हमें हर दिन मैदान से लेकर टॉइलट्स तक साफ करना होता है। वहां ऐसा नहीं होता कि आपका व्यक्तिगत टॉइलट आपको साफ कराना है। उस वर्ग में प्रत्येक ‘जाति’ के लोग होते हैं और हमें उस काम को करने में कोई शर्म नहीं आती क्योंकि यह तो एक सामान्य कर्म है।

आपके लिए मनुस्मृति कुत्सित मानसिकता से लिखी गई एक पुस्तक मात्र हो सकती है, लेकिन अगर आप ऐसा कहते हैं तो उसका कोई तर्क तो होगा, कोई आधार तो होगा। मैंने जितना पढ़ा है उतने में कोई बुराई नहीं दिखी अगर आपको दिख रही है तो कृपया हमें भी बताइए। और अगर है भी तो उसे इग्नोर करके सिर्फ अच्छी बातों को मानने में क्या बुराई है? आपकी विचारधारा में एक सीमा तक अच्छाइयां हैं, हम तो उनको स्वीकार करने के लिए तैयार बैठे हैं। लेकिन आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आप दुनिया भर की संस्कृतियों के भारतीय संस्कृति से उत्कृष्ट होने के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। आपसे जब संवाद करने की कोशिश की जाती है तो आप हम दोनों की विचारधाराओं को विपरीत छोर का मान लेते हैं। अरे साहब! राजनीति छोड़िए… और राष्ट्रनीति की बात करिए… एक राष्ट्र जहां सब एक हों… सबकी एक विशिष्ट पहचान हो… जहां कोई भेदभाव न हो…खुद को बदलिए… तब बदलेगी व्यवस्था… कुछ न करिए तो कम से कम संवाद क्षमता तो रखिए।

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