सितंबर के चौथे रविवार को अंतर्राष्ट्रीय डॉटर्स डे
डॉ घनश्याम बादल
दुनिया भर में सितंबर के चौथे रविवार को हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय डॉटर्स डे मनाया जाता है।
कभी बेटी के जन्म पर घर में सन्नाटा और बेटे के जन्म पर उत्सव भारतीय समाज की सामान्य तस्वीर हुआ करता था। बेटी को पराया धन, बेटे को वंश का वाहक और बुढ़ापे का सहारा मानने वाली सोच ने सदियों तक बेटियों के हिस्से में असमानता लिखी। दहेज, बाल विवाह, शिक्षा से वंचित रखना और संपत्ति में हिस्सेदारी से बचना इसी मानसिकता के अलग-अलग रूप रहे हैं।
आज समय बदला है। बेटी अब घर की चौखट तक सीमित नहीं रही वह अंतरिक्ष, खेल के मैदान, सेना प्रशासन, विज्ञान, चिकित्सा, न्यायपालिका, राजनीति, उद्योग, कला और साहित्य तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। छोटे शहरों और गांवों की बेटियां भी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, कारोबार और खेल में नए रास्ते बना रही हैं। यह बदलाव भारतीय समाज की बदलती मानसिकता का महत्वपूर्ण संकेत तो है लेकिन तस्वीर अभी पूरी नहीं बदली है।
आज भी बेटी और बेटे के बीच भेदभाव अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। कहीं बेटी की शिक्षा को दूसरे दर्जे का माना जाता है, कहीं उसकी कमाई पर परिवार का अधिकार समझा जाता है, कहीं विवाह को उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया जाता है और कहीं उसके करियर तथा जीवनसाथी के चुनाव पर सामाजिक दबाव हावी है। हिंसा, बाल विवाह, पोषण में असमानता, कार्यस्थल की बाधाएं और डिजिटल उत्पीड़न जैसी चुनौतियां भी उसके रास्ते में हैं।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि समाज बेटी को पढ़ाना और नौकरी करना तो स्वीकार करने लगा है, लेकिन उसके अपने निर्णय लेने के अधिकार को स्वीकार करने में अब भी संकोच करता है। आधुनिक मोबाइल, आधुनिक स्कूल और आधुनिक कपड़े मानसिक आधुनिकता की गारंटी नहीं हैं। आधुनिकता तब आएगी जब बेटी के सपनों को बेटे के सपनों जितना ही स्वाभाविक माना जाएगा।
बेटियां बढ़ रही शान से आसमान की ओर, अभी बाकी है बहुत उड़ान।
बेटी को सशक्त बनाने का अर्थ केवल उसे शिक्षा देना नहीं, उसे अपने जीवन का निर्णय लेने योग्य बनाना है। बेटे की पढ़ाई परिवार का निवेश है तो बेटी की पढ़ाई भी उतना ही बड़ा निवेश है। बेटे को संपत्ति में अधिकार है तो बेटी को भी होना चाहिए। बेटे की असफलता को अनुभव मानने वाला समाज बेटी की असफलता को उसकी सीमा क्यों मानता है? समानता का अर्थ किसी एक को विशेष सुविधा देना नहीं, बल्कि दोनों के लिए अवसर और सम्मान की समान जमीन तैयार करना है।
आज बेटियों के लिए सुरक्षा जितनी ज़रूरी है, उससे कम ज़रूरी स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता नहीं।सुरक्षा के नाम पर उसकी आवाज़, आवागमन या पसंद पर पहरा लगाना सशक्तीकरण नहीं हो सकता। उसे शिक्षा के साथ आत्मरक्षा, कानून की जानकारी, डिजिटल सुरक्षा और वित्तीय समझ भी देनी होगी।
बेटियों को स्वयं भी अपने भविष्य के प्रति सजग होना होगा। डिग्री को केवल नौकरी का साधन नहीं ज्ञान और निर्णय क्षमता का आधार बनाना होगा। अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को समझना होगा। ग़लत व्यवहार के सामने चुप्पी को संस्कार समझने से बचना होगा और ज़रूरत पड़ने पर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ कहने का साहस रखना होगा। डिजिटल युग में यह भी ज़रूरी है कि वे सोशल मीडिया की चमक के साथ उसके ख़तरों को भी समझें और अपनी निजी जानकारी तथा प्रतिष्ठा की रक्षा करना सीखें।
परिवार की सोच में बदलाव ही बेटियों के वर्तमान एवं भविष्य के लिए सबसे निर्णायक है। बेटी की सफलता को केवल अच्छे विवाह या बेहतर वर मिलने से जोड़ना बंद करना होगा। बेटी डॉक्टर, वैज्ञानिक, अधिकारी, खिलाड़ी या उद्यमी इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इससे उसकी ‘शादी की कीमत’ बढ़ेगी, बल्कि इसलिए कि उसकी प्रतिभा परिवार और समाज दोनों को समृद्ध करती है।
भारत ने बेटियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून और योजनाएं तो बनाई हैं लेकिन कानून सामाजिक मानसिकता का स्थान नहीं ले सकता। असली परिवर्तन तब होगा जब बेटी के जन्म पर खुशी बेटे जितनी होगी, उसकी शिक्षा पर खर्च बोझ नहीं, भविष्य में निवेश माना जाएगा; संपत्ति में उसका अधिकार कागज़ पर ही नहीं, व्यवहार में भी स्वीकार किया जाएगा और उसके जीवन के फैसलों में उसकी इच्छा को केंद्रीय स्थान मिलेगा।
दुनिया के अनेक हिस्सों में महिलाओं ने शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन वैश्विक स्तर पर लैंगिक समानता अभी भी अधूरी है। समान अवसर, समान वेतन, नेतृत्व में भागीदारी, घरेलू जिम्मेदारियों का संतुलित बंटवारा और हिंसा से सुरक्षा जैसे प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं। इसलिए बेटी दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि समाज की प्राथमिकताओं को परखने का दिन भी है।
हमें बेटी को केवल ‘देवी’ कहकर ऊंचे आसन पर बैठाने की नहीं उसे बराबरी, अवसर, और संरक्षण के नाम पर नियंत्रण से मुक्त करना होगा।
किसी समाज की प्रगति का पैमाना यह नहीं कि उसकी कितनी बेटियां बड़े पदों तक पहुंचीं। असली कसौटी यह है कि एक सामान्य परिवार की सामान्य बेटी को भी अपने सपने देखने, अपनी राह चुनने और अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का कितना अवसर मिला।
आइए, इस बेटी दिवस पर संकल्प लें कि बेटी और बेटे के बीच भेदभाव को घर से ही समाप्त करेंगे। बेटी की शिक्षा और सपनों पर अनावश्यक पहरा नहीं लगाएंगे, उसके अधिकारों को बेटे के बराबर मानेंगे, उसकी आवाज़ का सम्मान करेंगे और उसे इतना शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक बनाएंगे कि वह अपने जीवन के फैसले आत्मविश्वास से स्वयं ले सके क्योंकि बेटी को बचाना केवल उसका जीवन बचाना है, उसे पढ़ाना उसका भविष्य बनाना है, लेकिन उसे अपने फैसले खुद लेने
जिस दिन उसका जन्म उत्सव और उसकी स्वतंत्रता स्वाभाविक अधिकार होगी—उस दिन बेटी दिवस केवल कैलेंडर की तारीख नहीं बल्कि एक बदले हुए समाज की पहचान बन जाएगा।
डॉ घनश्याम बादल