ईश्वर-वेद-देश भक्त, आदर्श महापुरुष तथा विश्व के सच्चे हितैषी ऋषि दयानन्द

मनमोहन कुमार आर्य

               परमात्मा की सृष्टि में अनेक अनादि, नित्य शाश्वत् आत्मायें जन्म लेती हैं। अधिकांश ऐसी होती हैं जो जन्म लेती हैं और मर जाती हैं। लोग उन्हें जानते तक नहीं। इनका जीवन अपने सुख समृद्धि में ही व्यतीत होता है। इसके विपरीत कुछ आत्मायें ऐसी भी होती हैं जो मनुष्य जन्म लेकर अपने स्वार्थों हितों का त्याग कर देश समाज सहित मानवता का ऐसा उपकार करती हैं कि जिनके संसार के जाने के शताब्दियों बाद तक लोग उनको स्मरण कर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते रहते हैं और उनके कार्यों से प्रेरणा ग्रहण कर लाभान्वित होते रहते हैं। ऋषि दयानन्द ऐसे ही एक महान ऋषि एवं महापुरुष थे। महापुरुष तो संसार में बहुत हुए परन्तु सभी महापुरुष ऋषि नहीं थे। ऋषि दयानन्द सच्चे महान पुरुष होने के साथ आदर्श मानव, मानवता के सच्चे पुजारी, सच्चे ईश्वर व देश भक्त, समाज सुधारक, अज्ञान व अविद्या के निवारक, मनुष्यों को ईश्वर व आत्मा के सच्चे स्वरूप से परिचित कराकर उसे ईश्वर के चरणों में ले जाकर उनके दुःखों को दूर करने वाले तथा उनका सर्वविधि कल्याण करने वाले अद्वितीय ईश्वर के पुत्र व महान आत्मा थे। हमारा सौभाग्य है कि हमने उनके साहित्य के माध्यम से उनकी संगति की है और उसकी सहायता से अज्ञान की निवृत्ति सहित ईश्वर, आत्मा तथा अपने कर्तव्यों का बोध प्राप्त किया है। ऋषि दयानन्द विषयक साहित्य का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यदि ऋषि दयानन्द का प्रादुर्भाव न होता तो हमारा प्राचीन वैदिक धर्म, वैदिक संस्कृति, मानवता तथा हमारा देश व समाज सुरक्षित न रहता। उन्होंने वैदिक धर्म सहित मानवता की भी रक्षा की है। ऋषि दयानन्द ने संसार को ईश्वर का सच्चा परिचय देकर विश्व समुदाय को उससे मिलाया है। ईश्वर से मिलकर ही मनुष्यों के सभी दुर्गुण व दुःख दूर होते हैं, आत्मा की उन्नति होती है, जन्म व मरण के बन्धनों टूटते हंै, जीवन स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ का पर्याय बनता है। ऋषि दयानन्द के इन्हीं कार्यों से विश्व का सारा समुदाय उनका ऋणी व कृतज्ञ है। जब तक संसार में सूर्य, चन्द्र तथा तारें हैं, ऋषि दयानन्द के शुभ कार्य सदैव स्मरण किये जायेंगे। वह विश्व के योग्यतम महापुरुष थे जो सदैव अमर रहेंगे। उनका जीवन आदर्श जीवन है। जिस समय भारत के समस्त आर्य-हिन्दू व अन्य मनुष्य उनके जीवन को अपना आदर्श बनाकर उसके अनुरूप बनने का प्रयत्न करेंगे, वही समय इस सृष्टि के इतिहास का सबसे सुखद दिवस व समय होगा।

               ऋषि दयानन्द एक साधारण मनुष्य की ही भांति गुजरात के मोरवी प्रदेश में टंकारा नामक एक साधारण ग्राम में जन्मे थे। कुशाग्र बुद्धि होने के कारण शिवरात्रि व्रत करते हुए उन्हें मूर्तिपूजा की निरर्थकता का बोध हुआ था। उन्होंने सबके कल्याणकारी सच्चे शिव ईश्वर की खोज में गृह त्याग किया। वह देश के प्रायः सभी धार्मिक विद्वानों से मिले थे और उनसे ईश्वर आत्मा का सत्यस्वरूप जानने का पुरुषार्थ किया था। वह सच्चे सिद्ध योगी भी बने। योगी वह होता है जो समाधि अवस्था को सिद्ध कर ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल होता है। इस दृष्टि से ऋषि दयानन्द एक सफल योगी थे। योगी बनने के बाद भी वह विद्या रूपी जल में स्नान करना चाहते थे। उनकी यह अभिलाषा मथुरा में स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की पाठशाला में वेद व्याकरण वा आर्ष पाठविधि से अष्टाध्यायी-महाभाष्य तथा निरुक्त आदि ग्रन्थों के अध्ययन तथा गुरु के सत्योपदेशों से पूर्ण हुई। यहां अध्ययन कर ऋषि दयानन्द पूर्ण ज्ञानी, जो की कोई भी जीवात्मा बन सकती है, बने थे। सन् 1863 में विद्या पूरी होने पर उनके भविष्य के कार्यों का निर्धारण गुरु व शिष्य की मंत्रणा से हुआ। उन दिनों भारत देश व विश्व अज्ञान व अविद्या से ग्रस्त था। देश के लोग अन्धविश्वासों तथा सामाजिक कुरीतियों में फंसे थे। देश की गुलामी ने देशवासियों का दुःख कहीं अधिक बढ़ा दिया था। अंग्रेज भारत की जनता का शोषण करने के साथ उन पर अन्याय भी करते थे। देश की जनता का न धर्म सुरक्षित था न ही जीवन। देश के लोगों का स्वाभिमान नष्ट हो चुका था। इससे पूर्व मुस्लिम शासन में भी यही होता रहा था। इससे देश व देशवासियों को बाहर निकालने की ओर किसी का भी ध्यान नही था। स्वामी विरजानन्द और स्वामी दयानन्द ने देश को इन सभी भंवरों व आपदाओं से मुक्त कराने के लिये अज्ञान, अन्धविश्वास तथा मिथ्या सामाजिक परम्पराओं का खण्डन करने तथा इनके स्थान पर सत्य विद्या के ग्रन्थ वेदों का प्रचार करने का इतिहास में प्रथमवार अद्भुत उल्लेखनीय महत्वपूर्ण कार्य करने सहित मनुष्य को सच्चा मानव बनाने का उद्योग किया। इस कार्य के लिये उन्होंने देश के अनेक प्रमुख स्थानों को चुना। वहां जाकर उन्होंने जनता को वेदज्ञान पर आधारित उपदेश दिये। अज्ञान व अन्धविश्वासों पर चोट की। लोगों को अन्धविश्वासों को छोड़ने की प्रेरणा की और असत्य को छोड़कर सत्य का ग्रहण करने का आह्वान किया।

               ऋषि दयानन्द का व्यक्तित्व महान था। वह सरल संस्कृत में भाषण उपदेश देते थे। जनता के हृदय उनके उपदेशों को सुनकर चमत्कृत सन्तुष्ट होते थे। उनको उनकी बातों का विश्वास हो जाता था। स्वार्थी लोग उनसे चिढ़ते उनको हानि पहुंचाने में तत्पर रहते थे। उन्होंने मूर्तिपूजा की सत्यता उसके वेदों में विधान पर 16 नवम्बर, 1869 को काशी के लगभग 30 शीर्ष पंडितों से शास्त्रार्थ किया था और विजयी हुए थे। लोग स्वार्थवश इस वेद विरुद्ध कार्य को छोड़ नहीं सकेे। इसके साथ ही ऋषि दयानन्द सभी धार्मिक व सामाजिक अन्धविश्वासों व मिथ्या परम्पराओं का खण्डन भी वेद प्रमाण, युक्ति व तर्कों से करते थे। लोगों ने उनके उपदेशों की महत्ता को समझकर उन्हें अपने विचारों को लेखबद्ध करने का अनुरोध किया जिसका परिणाम अपूर्व सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के रूप में आया। इसके साथ ही उन्होंने पंचमहायज्ञविधि नाम की अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं क्रान्तिकारी पुस्तक भी लिखी। यह पुस्तक आज भी सभी सत्कर्मों की प्रेरणा करने वाली वैदिक धर्मावलम्बियों की सन्ध्या आदि पांच महायज्ञों के विधान की प्रमुख पुस्तक के रूप में प्रतिष्ठित है। इन पुस्तकों के अतिरिक्त ऋषि दयानन्द ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य, संस्कार विधि, आर्याभिविनय आदि अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया। यह ग्रन्थ अविद्या दूर कर मनुष्य की आत्मा की उन्नति करने सहित देश व समाज की उन्नति में भी सहायक हैं। ज्ञान व विज्ञान की उन्नति की प्रेरणा भी इन ग्रन्थों के अध्ययन से मिलती है। वेद प्रचार, शास्त्रार्थ तथा लोगों की शंकाओं का समाधान करते हुए वैदिक धर्म के स्थाई प्रचार व प्रसार के लिये ऋषि दयानन्द ने दिनांक 10 अप्रैल, सन् 1875 को देश की प्रमुख व्यवसायिक नगरी मुम्बई में आर्यसमाज नामक एक क्रान्तिकारी संगठन व आन्दोलन की स्थापना की थी। यह आन्दोलन स्थापना के कुछ काल बाद ही पूरे विश्व में फैल गया। सारे संसार के लोग इससे परिचित हैं। विश्व से अज्ञान, अन्धविश्वास तथा पाखण्डों को दूर करने में आर्यसमाज की ऐतिहासिक प्रमुख भूमिका है। ईश्वरीय ज्ञान वेदों का पुनरुद्धार भी ऋषि दयानन्द व उनके आर्यसमाज ने ही किया है। उपनिषदों तथा दर्शनों सहित मनुस्मृति आदि अन्यान्य ग्रन्थों की महत्ता को बता कर व इन ग्रन्थों पर हिन्दी टीकायें लिखकर इनका भी उद्धार एवं प्रचार आर्यसमाज ने किया है। सत्यार्थप्रकाश विश्व का ऐसा एकमात्र ग्रन्थ है जो असत्य को दूर कर सत्य का प्रकाश करता है। यदि ऋषि दयानन्द न आते और वेद प्रचार न करते तो संसार ईश्वर के सत्यस्वरूप से परिचित न हो पाता। वेदों के सत्य वेदार्थ भी संसार को प्राप्त न होते। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ जैसा युगान्तरकारी ग्रन्थ न मिलता। लोग अपनी आत्मा का सत्य परिचय न प्राप्त कर पाते और उसकी उन्नति का साधन वेदों का स्वाध्याय व ईश्वर के ध्यान-चिन्तन आदि को प्राप्त न हो पाते।

               देश की आजादी में भी ऋषि दयानन्द की प्रमुख भूमिका है। देश को आजाद कराने का विचार भी ऋषि दयानन्द ने ही सबसे पहले दिया। सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में उन्होंने स्वराज्य को विदेशी राज्य की तुलना में सर्वोपरि उत्तम बताकर देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया था। आर्यसमाज के सभी अनुयायी देश की आजादी के आन्दोलन में किसी किसी रूप में सक्रिय थे। क्रान्तिकारियों के आद्य गुरु पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा पं. गोपाल कृष्ण गोखले के गुरु गोविन्द रानाडे ऋषि दयानन्द के प्रमुख शिष्यों में थे। ऋषि दयानन्द के विचारों के प्रचार प्रसार से ही छल, भय व प्रलोभन आदि कुत्सित साधनों द्वारा देश की हिन्दू जनता का विदेशी मतों द्वारा किया जाने वाला धर्मान्तरण रूका। हिन्दू समाज के अन्धविश्वास दूर हुए। डीएवी स्कूल, कालेज व गुरुकुलों की स्थापना से देश से अविद्या का अन्धकार छंटा तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति हुई। ऋषि दयानन्द का जीवन चरित पढ़कर विदित होता है कि वह इतिहास के प्रमुख महापुरुषों में अनन्य महापुरुष व अद्वितीय ऋषि थे। सत्यार्थप्रकाश व वेदभाष्य का लेखन, आर्यसमाज की स्थापना, अविद्या दूर करने के कार्य तथा देशभक्ति की भावना की प्रेरणा आदि कार्य उनके स्मारक के तुल्य कार्य हैं। हम अनुभव करते हैं कि ऋषि दयानन्द के समान सत्य को मानने तथा सत्य को मनवाने वाला उन जैसा अन्य कोई महापुरुष संसार में कभी उत्पन्न नहीं हुआ। इस कार्य को करते हुए उन्होंने अपने प्राणों की भी कभी परवाह नहीं की थी। हमारे आदर्श ऋषि दयानन्द ही हैं। हमें उनका अनुयायी होने में गौरव का अनुभव होता है। संसार को उनके मार्ग का अनुसरण कर ही सुख, शान्ति व सभी क्षेत्रों में सफलता मिल सकती है। ऋषि दयानन्द ने अपने सभी कार्यों से वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को बढ़ाया है। उन्होंने यह भी बताया कि सभी मनुष्य व प्राणी एक ही ईश्वर के पुत्र व पुत्रियां होने से एक ईश्वर के परिवार के सदस्य हैं। हम ऋषि दयानन्द के कार्यों व ऋणों को स्मरण करते हैं और उन्हें नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

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