समाज

परंपराओं से दूरी और टूटता सामंजस्य


राजेश खण्डेलवाल

आज का समाज एक अजीब अंतर्द्वंद्व से गुजर रहा है। एक तरफ हमारे पास तकनीक की रफ्तार है तो दूसरी तरफ रिश्तों की घटती गहराई। जब हम युवा पीढ़ी के रीति-रिवाजों से दूर होने, शादियों में देरी और परिवारों में बढ़ते मनमुटाव को देखते हैं, तो उंगली दूसरों पर उठाने से पहले खुद के गिरेबां में झांकना जरूरी हो जाता है।

हमने अपनी परम्पराओं को केवल बाहरी आडंबर और दिखावे तक सीमित कर दिया है। जब घर के बड़े रीति-रिवाजों के पीछे छिपे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अर्थ युवा पीढ़ी को नहीं समझा पाते, तो वे इसे ‘बोझ’ समझने लगते हैं। हम खुद तो अपनी जड़ों से कटे, लेकिन उम्मीद की कि बच्चे उन्हें थामे रखें। युवा पीढ़ी को दोष देने से पहले हमें यह सोचना होगा कि क्या हमने उन्हें परम्पराओं का ‘सौंदर्य’ दिखाया है या केवल ‘डर’?

आज शादियां 30 की उम्र पार कर रही हैं। इसके पीछे केवल करियर ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि बढ़ती अपेक्षाएं और कम होता ‘एडजस्टमेंट’ (सामंजस्य) का भाव है। हमने अपनी अगली पीढ़ी को ‘सफल’ होना तो सिखाया, लेकिन ‘सहज’ होना नहीं सिखाया। रिश्तों में ‘मैं’ की प्रधानता और ‘हम’ की कमी ने विवाह जैसे पवित्र बंधन को एक समझौते की तरह पेश कर दिया है, जिससे युवा कतराने लगे हैं।

आज के परिवारों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह है ‘अहंकार’ और ‘संवादहीनता’। कई बार बड़े-बुजुर्ग अपनी सत्ता छोडऩे को तैयार नहीं होते और नई पीढ़ी के नए विचारों को स्वीकार नहीं कर पाते।
आधुनिकता की दौड़ में युवा यह भूल जाते हैं कि अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। ‘प्राइवेसी’ के नाम पर अपनों से ही दूरी बनाना सामंजस्य को खत्म कर रहा है। हम भूल गए हैं कि एक घर तभी मंदिर बनता है, जब उसमें बड़ों का आशीर्वाद और छोटों का उत्साह साथ चले।

सच्चाई यह है कि हमने भौतिक सुखों को रिश्तों से ऊपर रख दिया है। हम स्वयं जिम्मेदार हैं क्योंकि हमने बच्चों को गैजेट्स तो दिए, लेकिन दादा-दादी की कहानियां नहीं। हमने उन्हें डिग्री दिलाई, लेकिन धैर्य और सहनशीलता के संस्कार नहीं दिए।
हमने अपनी सुविधाओं के लिए ‘न्यूक्लियर फैमिली’ को चुना, जिससे वे रिश्तों की गर्माहट भूल गए।

समय आ गया है कि हम आत्म-मंथन करें । यदि हम चाहते हैं कि हमारी परंपराएं जीवित रहें और परिवार महकता रहे, तो हमें अपनी जीवनशैली में लचीलापन लाना होगा। बड़ों को ‘मित्र’ बनना होगा और छोटों को ‘कृतज्ञ’। रिश्तों की डोर तभी मजबूत होगी जब उसे ‘अपेक्षाओं’ से नहीं, बल्कि ‘अपनत्व’ से बांधा जाएगा। याद रखिए, जड़ें अगर मजबूत न हों, तो आधुनिकता की आंधी किसी भी ऊंचे वृक्ष को धराशायी कर सकती है। क्या आप मानते हैं कि संवाद की कमी ही आज के पारिवारिक संघर्षों की सबसे बड़ी जड़ है?

राजेश खण्डेलवाल