छोड़ न जाओ  दिल अभी भरा नहीं

                      प्रभुनाथ शुक्ल 

रसोई से मुझे कुछ गुनगुनाने की आवाज आ रही थी। मैं सुनने की कोशिश कर रहा था। अंदर श्रीमती जी साठ के दशक का गीत…मुझे न जाओ छोड़ कर दिल अभी भरा नहीं गुनगुना रहीं थीं। गीत को सुनकर माथा ठनक गया। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था कि यह क्या हो रहा है। पचपन की उमर में बचपन का खेल कहां से चल रहा है। हम दोनों के बीच तीसरा कौन आ गया। मेरे पाँव के की जमीन खिसक गयीं। मेरी हालत दिल फ़िल्म के नायक वेचारे सलमान की तरह हो गई। मुझे नींद न आए मुझे चैन न आए…।

मैं चोरी-चोरी चुपके-चुपके पत्नी को रसोई में यह सब करते देख रहा था। अंदर का दृश्य देखर मैं बेहोश हो गया। पत्नी जी हथेलियों में एक खूबसूरत चमकदार लाल टमाटर लेकर उससे प्यार जता रहीं थीं और साथ में यह गीत भी गुनगुना रहीं थीं।…मुझे न आओ छोड़ कर दिल अभी भरा नहीं। उस बेचारे टमाटर को न सब्जी में डालना चाहती थीं और न हरी धनिया के साथ अदरक की चटनी बनाना चाहती थीं। क्योंकि टमाटर की महंगाई ने उनकी रसोई का जायका बिगाड़ दिया था। जबकि चटनी उन्हें बेइंतहा पसंद है। महंगाई की वजह से वह टमाटर को खुद से अलग नहीं करना चाहती थीं। जितना टमाटर से प्यार कर रहीं थीं उतना तो कभी बच्चों से भी प्यार करते नहीं देखा। फिर वहीं गीत गनगुनाने लगीं….जनम-जनम का साथ है हमारा तुम्हारा।

टमाटर से पत्नी जी बेइंतहा प्यार करती हैं। क्योंकि टमाटर बगैर उनकी रसोई का कोई मतलब ही नहीं निकलता। इतनी महंगाई के बावजूद भी टमाटर से उनका इतना लगाव है कि उसे खरीदे बगैर नहीं रह सकती। यह दीगर बात है कि पहले जहां दो से तीन किलो खरीदती थीं अब पाव किलो लाती हैं।  टमाटर की सुरक्षा के लिए उन्होंने बाउंसर नहीं तैनात किया है। लेकिन उसकी हिफाजत में कोई कोर कसर नहीं रखी है। फ्रिज में उसे रखने के बजाय अलमारी के लॉकर में रखा है। तीन चाबी लगाने के बाद वह टमाटर निकालती हैं।

धर्म पत्नी जी का जब भोजन बनाने का वक्त होता है तो आलमारी के पास पहुँच लॉकर खोलती हैं। फिर उसमें रखे टमाटर को निकाल कर उसे देखती हैं। टमाटर के स्वाद और सुगंध का मानसिक अनुभव करते हुए रसोई में जाकर फिर खाना बनाती है। जिसका असर यह होता है कि पूरे खाने में टमाटर की महक और स्वाद अपने आप मिलने लगती है। पत्नी जी का यह मनोवैज्ञानिक तरीका हमें खूब भाने लगा है। टमाटर की महंगाई ने इतना असर किया है कि अब लोगों के जीने का तौर-तरीका भी बदल गया है। सरकारी कार्यालयों में घुसखोर बाबू अब नगद कैश की बजाय लोगों से पांच किलो टमाटर की मांग करने लगे हैं। क्योंकि अब नगद से अधिक टमाटर लेने में उनका फायदा है।

प्रिय पत्नी जी का टमाटर प्रेम देखकर मुझसे नहीं रहा गया और मैं सीधे किचन में घूस गया। अरे भाग्यवान,  इ सब क्या हो रहा है। अब तक तो हम कुछ दूसरा ही समझ रहे थे कि तुम्हें इस उमर में यह कैसा प्रेमरोग लगा। तुम्हारे गीत ने तो मेरे होश उड़ा गए थे। किचन में प्रवेश कर मुझे कुछ शांति मिली। नहीं तो हमारी हालात तो उस बेचारे की तरह हो गयीं थी जिसकी अधिकारी पत्नी दूसरे के प्यार में गिर गई। तुम्हारे गानों को सुनकर मुझे यही लगा कि मामला गड़बड़ है, लेकिन बेचारे टमाटर ने सब कुछ संभाल लिया। हम टमाटर के शुक्रगुजार हैं जिसने मेरा घर उजाड़ने से बचा लिया। 

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