कविता

भय-निःशब्दता का स्वप्न-विस्फोट

“भय मुट्ठी बाँध, उन्मेष जगाता यह काल;
क्षोभ स्वयं को भूल, निःशब्द हुआ है संसार।
प्रेम और विरक्ति मिलकर लय हो जाते,
एक बूँद बन ठहर जाता है सारा विस्तार।

स्नेह और घृणा भी संग-संग मिट जाते,
न्याय-अन्याय की रेखाएँ धुँधली सदैव;
सत् और असत् नामहीन होकर बहते,
त्याग और भोग का न रहता कोई भेद।

मंद किरणों में तितलियाँ कोमल उड़तीं,
निशा-पक्षी स्वप्नों की लहरें बिखेरें;
संध्या के प्राणी बनते शाकाहारी,
मृदु संगीत में आलोक भी घुलकर ठहरें।

मौन—अंतर का वाचाल बन जाता,
दिन-रात बिना सीमा के विचरता;
पर और अपर का भेद मिटाकर,
हाथों में हाथ लिए शांति-नदी सा बहता।

अट्टहास और आर्तनाद सब,
काल-द्वार पर ठिठके रह जाते;
विकृत मुस्कानें सारी मिटकर,
मानव-प्रभात में पुनः जन्म पाते।

क्रूरता—करुणा की गोद में सोती,
मुख छिपाकर पाती शाश्वत निद्रा;

मानव-आत्माएँ विविधता में एक,
किशोर-निर्मल संतोष से खिल उठता विश्व सारा।”