धर्म-अध्यात्म लेख

पटाखों पर प्रतिबंध नहीं, प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी

सौरभ वाष्र्णेय
त्योहार भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। दीपावली जैसे पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक एकता और खुशियों के उत्सव भी हैं। दीपों की रोशनी, घरों की सजावट, मिठाइयों का आदान प्रदान और पूजा अर्चना हमारी सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं। लेकिन जब त्योहारों की खुशियां वायु प्रदूषण, सांस संबंधी बीमारियों और बच्चों बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर संकट बनकर सामने आने लगें, तब यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि उत्सव मनाने का तरीका कैसा हो। दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने एक बार फिर इसी महत्वपूर्ण सवाल को देश के सामने रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पटाखों पर प्रतिबंध की मांग पर सुनवाई करते हुए कहा कि लोगों के स्वास्थ्य और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने लोगों से कम प्रदूषण वाले तरीकों से त्योहार मनाने की अपील की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पटाखों से होने वाले नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करना जरूरी है। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। इस सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता और न्याय मित्र अपराजिता सिंह की टिप्पणी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। उन्होंने कहा कि यदि भगवानों को पता चले कि उनके नाम पर बच्चे पीडि़त हो रहे हैं और बीमार पड़ रहे हैं, तो वे भी हैरान रह जाएंगे। इस कथन का मूल संदेश स्पष्ट है कि धार्मिक आस्था का उद्देश्य मानव कल्याण होना चाहिए, न कि ऐसा कोई व्यवहार जो दूसरों के स्वास्थ्य और जीवन के लिए परेशानी पैदा करे। धर्म और परंपरा के नाम पर किए जाने वाले किसी भी कार्य पर विचार करते समय उसके सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण लंबे समय से गंभीर चिंता का विषय रहा है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों से उडऩे वाली धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और मौसम संबंधी परिस्थितियां प्रदूषण को प्रभावित करती हैं। दीपावली के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण इस समस्या को और बढ़ा सकते हैं। इसका प्रभाव विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों, दमा और अन्य सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर पड़ सकता है।
प्रदूषण का संकट किसी एक परिवार या वर्ग तक सीमित नहीं रहता। पटाखे जलाने वाला व्यक्ति कुछ मिनटों के उत्साह के बाद सामान्य जीवन में लौट सकता है, लेकिन उससे निकलने वाले धुएं का असर आसपास रहने वाले लोगों को भी झेलना पड़ सकता है। ऐसे में व्यक्तिगत खुशी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाता है।
यह भी समझना होगा कि प्रदूषण के लिए केवल पटाखों को जिम्मेदार ठहराकर बाकी स्रोतों की अनदेखी करना समाधान नहीं है। यदि सरकार वास्तव में दिल्ली-एनसीआर की हवा को स्वच्छ बनाना चाहती है, तो उसे सालभर प्रदूषण फैलाने वाले सभी प्रमुख स्रोतों पर प्रभावी कार्रवाई करनी होगी। पटाखों पर नियमों के साथ-साथ वाहनों, निर्माण स्थलों, औद्योगिक इकाइयों और खुले में कचरा जलाने जैसी गतिविधियों पर भी नियंत्रण आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी संकेत दिया कि किसी आदेश को लागू करने से पहले उसकी व्यावहारिकता पर विचार करना जरूरी है। केवल प्रतिबंध लगा देना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी आवश्यक है कि नियमों का पालन कैसे कराया जाएगा, उल्लंघन करने वालों पर किस प्रकार कार्रवाई होगी और आम लोगों को इसके प्रति जागरूक करने की क्या व्यवस्था होगी।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची द्वारा पटाखे फोडऩे के धार्मिक आधार पर सवाल उठाना भी विचारणीय है। भारतीय परंपराओं में दीपावली का प्रमुख संदेश अंधकार पर प्रकाश और अज्ञान पर ज्ञान की विजय है। दीप जलाना, पूजा करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और परिवार तथा समाज के साथ खुशियां बांटना इस पर्व की व्यापक सांस्कृतिक भावना को व्यक्त करते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि परंपराओं को समय, परिस्थिति और सामाजिक उत्तरदायित्व के अनुरूप समझा जाए।
मुख्य न्यायाधीश ने लोगों को जागरूक करने और अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने उस परंपरा का उल्लेख किया जिसमें दीप जलाने और फुलझडिय़ां जलाने जैसे सीमित साधनों से उत्सव मनाया जाता था। इसका आशय उत्सव की खुशियों को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा स्वरूप देना है जिससे दूसरों के जीवन और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
पिछले वर्ष दीपावली से पहले दिल्ली की वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई का स्तर 200 के पार पहुंचने की खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एनसीआर में निर्धारित शर्तों के तहत ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल की अनुमति दी थी। इसका उद्देश्य धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण तथा स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास था। हालांकि, ग्रीन पटाखों को प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त मान लेना भी उचित नहीं होगा। उनका वास्तविक प्रभाव उत्पाद की गुणवत्ता, निर्धारित मानकों और इस्तेमाल की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए केवल किसी उत्पाद को ग्रीन पटाखा कह देना पर्याप्त नहीं है। उसकी प्रामाणिकता की जांच, बिक्री पर निगरानी और निर्धारित समय तथा स्थान संबंधी नियमों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए प्रशासन को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। पुलिस, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय होना चाहिए। बाजारों में प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री रोकने के साथ-साथ लोगों को नियमों की जानकारी भी दी जानी चाहिए। स्कूलों, आवासीय समितियों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो, लेकिन आम नागरिकों को केवल दंड के भय से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की समझ से भी प्रेरित किया जाए।
पटाखों पर प्रतिबंध के पक्ष और विरोध में अलग-अलग तर्क दिए जाते रहे हैं। कुछ लोग इसे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की दृष्टि से जरूरी मानते हैं, जबकि अन्य धार्मिक परंपराओं और उत्सव मनाने की स्वतंत्रता का सवाल उठाते हैं। इन दोनों पक्षों के बीच संवाद और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नीति की आवश्यकता है। न्यायालय के सामने भी चुनौती यही है कि ऐसा आदेश तैयार हो जो कानूनी रूप से स्पष्ट होने के साथ व्यावहारिक रूप से लागू किया जा सके।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें प्रदूषण के कारणों पर लगातार निगरानी रखनी होगी और जनता को सही जानकारी उपलब्ध करानी होगी। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि त्योहार मनाने की स्वतंत्रता के साथ दूसरों के स्वास्थ्य और सुविधा का सम्मान करना जरूरी है।
दीपावली की असली चमक पटाखों के शोर में नहीं, बल्कि घरों में जलते दीपों, समाज में फैली खुशियों और जरूरतमंदों के जीवन में आने वाली रोशनी में है। यदि हम अपने उत्सवों को अधिक सुरक्षित, संवेदनशील और पर्यावरण के अनुकूल बना सकें, तो इससे परंपराओं का महत्व कम नहीं होगा, बल्कि उनका मानवीय पक्ष और मजबूत होगा। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने इसी व्यापक प्रश्न पर विचार करने का अवसर दिया है। अब आवश्यकता है कि अदालत के निर्देशों, प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिकों की जागरूकता के बीच तालमेल स्थापित हो। धार्मिक आस्था का सम्मान और जनस्वास्थ्य की रक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। वास्तविक संतुलन वही होगा जिसमें त्योहारों की खुशियां भी बनी रहें और किसी बच्चे, बुजुर्ग या बीमार व्यक्ति को उन खुशियों की कीमत अपनी सेहत से न चुकानी पड़े।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।