लेखक परिचय

विमलेश बंसल 'आर्या'

विमलेश बंसल 'आर्या'

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under कविता, साहित्‍य.


holiएक हो जावें, पर्व होली का मनावें, कुहुक रही हैं कोयल डालियाँ।

फ़ाग गवावें, कृपा ईश्वर की पावें, झूम रही हैं जौ की बालियाँ।।
एक हो जावें…..

मासों में अंतिम मास फाल्गुन विदाई का।
देने संदेशा आया, प्रेम और भलाई का।
जगें जगावें, भेद हर दिल के मिटावें, पावन बनावें हृदय प्यालियाँ।।
एक हो जावें ….

टेसू पलाश चन्दन, प्रेम रस में तृप्त होकर।
कह रहे हैं सीख मानव, फेंक न तू कीच गोबर।
खिलें खिलावें, महक सबको महकावें, दें न किसी को गन्दी गालियाँ।।
एक हो जावें—-

होवें सुखी और स्वस्थ, महके सभी का घर ।
बेहिचक बे-रोक टोक, भावना बने सुपर।
मिलें मिलावें, खावें नव अन्न खिलावें, भर भरकर बांटें गूँजा थालियाँ।।
एक हो जावें——

कोई न पोशाक नव, हमको यहां पहननी होती।
शुद्ध हो संकल्प प्यारा, साफ हो बस तन पर धोती।
यज्ञ रचें रचावें, विमल अमृत को पावें, आनंद मनावें दे दे तालियाँ।।
एक हो जावें—-
फ़ाग गवावें, कृपा ईश्वर की पावें, झूम रही हैं जौ की बालियाँ।।

(तर्ज : गोरी हैं कलाइयाँ……)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *