व्यंग्य

आया चुनाव का मौसम !

कस्तूरी दिनेश

                             मौसम बदलने के पहले पूर्वाभास होने लगता है ! बारिश का मौसम आने वाला हो तो आकाश में काले-काले बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं |ठंडी बयार बहने लगती है | बिजली रानी भी बादलों के मंच पर यत्र-तत्र भांगड़ा करने लग जाती है ! मोर पंख फैलाए नाच-नाचकर मोरनी को रिझाने लगते हैं ! बसंत का मौसम हो तो कामदेव फूलों की सेना और कोयल की कूक लेकर धमक जाते हैं ! शीत तरह-तरह के खट्टे-मीठे फलों के साथ रंगीन स्वेटर,कार्डिगन और शाल लेकर लुभाने आता है तो ग्रीष्म हवा के गर्म-गर्म झकोरे के साथ मीठे-मीठे आमों का टोकरा लेकर दरवाजे की घंटी बजाता है ! सभी मौसम अपने-अपने ढंग से लुभाने-ललचाने में भिड़े रहते हैं !

                                  आजकल प्रकृति में एक नये निराले मौसम की इंट्री हो गई है चुनाव का मौसम ! इस मौसम के आते ही साल भर दिखाई न देने वाले नेतानामी बड़े-छोटे,आड़े-तिरछे,जहरीले जीव,मोहल्लों और घरों के आसपास बरसाती मेंढक की तरह फुदकते दिखाई पड़ते हैं !कोई आपको बेबात देखकर दांत निपोरे,दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करे,चरणों पर दण्डवत लोट  जाए,बिना मतलब आपका हालचाल पूछे तो समझ लीजिये चुनाव का मौसम आ गया है !

                                    कल भैया जी मिल गये | हमारे क्षेत्र के पूर्व विधायक रह चुके हैं ! पिछली बार जब वे चुनाव में खड़े हुए थे तो आश्वासनों और वादों की किस्म-किस्म की मिठाइयों के ढेर सारे डब्बों से उन्होंने मेरी झोली लबालब भर दी थी ! मेरे प्रति उनके-श्रद्दधा भाव से मैं गदगद था ! उनके चुनाव जीतने के बाद मैं याचक सुदामा,अपने मंझले लड़के की नौकरी के लिए जब अपने कृष्ण -कन्हैया विधायक के बंगले पहुंचा तो उनके ए.के.४७ से सुसज्जित  गोप बॉडी-गार्ड ने मुझे मेनगेट के बाहर से ही कटखने श्वान की तरह दुत्कारकर भगा दिया ! आज वही भैया जी फिर मेरे चरणों में दंडवत पड़े हैं ! मैं मास्टर आदमी,तत्काल समझ गया कि चुनाव का मौसम आ गया !  

                                              इस मौसम में चारो तरफ से वादों और आश्वासनों की गरज-बरस के साथ अनचाहे बरसात होती है | घर में हो,घर के बाहर हों आपका आकंठ भीगना तय है, भले ही आप अनिच्छा के कितने ही छाते-बरसाती क्यों न ओढ़े हुए हों ! शास्त्र-पुरानों में आकाशीय वर्षा के देवता इंद्र को माना जाता है परन्तु धरती पर अपने महान जिह्वा से वादों की बारिश करवाने का सामर्थ्य हमारे महान वादे-विहारी चुनाव-लड़ाकों के आलावा और किसके पास हो सकता है ? यह ढपोरशंखी महाशक्ति सिर्फ और सिर्फ उन्हीं के पास है !

                                        प्रकृतिजन्य मौसम तो वर्ष में एक ही बार आता है परन्तु चुनाव का मौसम देश में खंड-वृष्टि की तरह कहीं भी और कभी भी आपको आपाद-मस्तक भीगा सकता है ! मध्यावधि चुनाव,किसी प्रदेश विशेष का चुनाव,किसी सांसद या विधायक के गोलोकवास होने पर उस क्षेत्र के संसद या विधान परिषद चुनाव ऐसे ही खंड-वृष्टि वाले चुनाव हैं !

                                          तो बन्धु,यदि आपके मोहल्ले में बानरों के झुण्ड की तरह लोग नाचते-उछलते, “हमारा नेता कैसा हो,भैया जी जैसा हो !” “झाड़ू छाप में बटन दबाएँ और भैया  जी को विजयी बनाये”का तुमुल स्वर में नारा लगाते,डीजे के कान-फोडू आवाज के साथ गुजरे तो समझ लीजिएगा कि चुनाव का मौसम आ गया !   

कस्तूरी दिनेश