समाज

बिजली और पानी को पहाड़ों तक पहुंचना है

दीक्षा
पोलिंग, उत्तराखंड

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का पोलिंग गांव प्राकृतिक सुंदरता से भरा हुआ है। ऊंचे ऊंचे पहाड़ों की गोद में बसा यहां का जीवन शांत और सरल प्रतीत होता है। लेकिन इस शांति के पीछे यहां समस्याओं का एक बहुत बड़ा अंबार छुपा हुआ है, जो यहां के लोगों, खासकर महिलाओं और किशोरियों के रोजमर्रा के जीवन में साफ दिखाई देती है। पानी और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतें यहां अब भी एक संघर्ष बनी हुई हैं, और मौसम बदलते ही यह संघर्ष और भी अधिक कठिन हो जाता है। बारिश और बर्फबारी के दौरान यहां के हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि जीवन की सामान्य गति थम सी जाती है।

जिला बागेश्वर से करीब 25 किमी दूर कपकोट ब्लॉक स्थित पोलिंग गाँव की आबादी लगभग ढाई हजार है। अनुसूचित जाति बहुल इस गाँव में लगभग 350 मकान हैं। लेकिन यहां बिजली और पानी की समस्या वर्षों से बनी हुई है। गांव में पाइपलाइन तो बिछाई गई है, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी नहीं है। बरसात के दिनों में भूस्खलन के कारण पाइप लाइन बार-बार टूट जाती है, और सर्दियों में पानी जम जाने से सप्लाई रुक जाती है। ऐसे में गांव की महिलाओं और किशोरियों को कई किलोमीटर दूर पहाड़ी रास्तों से होकर पानी लाने के लिए जाना पड़ता है। यह रास्ता आसान नहीं होता, बल्कि फिसलन भरा और खतरनाक होता है, जिसमें हर कदम पर गिरने का डर बना रहता है।

बिजली की अनियमितता भी पोलिंग गांव की बड़ी समस्या है। यहां बिजली के खंभे और तार तो मौजूद हैं, लेकिन बारिश और बर्फबारी के समय ये अक्सर टूट जाते हैं, जिससे कई दिनों या हफ्तों तक बिजली नहीं रहती। इससे न केवल अंधेरा छा जाता है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, मोबाइल चार्जिंग, और अन्य जरूरी काम भी प्रभावित होते हैं। 32 साल की मीना खमरियाल बताती हैं कि बारिश के दौरान जब हफ्तों बिजली गायब रहती है तब उनकी और उनके बच्चों की समस्या बहुत बढ़ जाती है। 
वह कहती हैं कि बिजली न होने की वजह से उनके बच्चे रात में पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं, जिसे देख कर उन्हें बहुत तकलीफ होती है। वह कहती हैं कि गाँव में कुछ लोगों ने अपने घरों में सोलर लाइट की व्यवस्था कर रखी है, जिससे उनका जीवन काफी आसान हो गया है। लेकिन वह आर्थिक रूप से इतनी सक्षम नहीं हैं कि अपने घर में सोलर लाइट की व्यवस्था कर सकें। मीना कहती हैं कि सरकार को गाँव गाँव में लोगों को मुफ़्त सोलर लाइट उपलब्ध करानी चाहिए।

अगर हम पूरे उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें, तो सरकार की नल जल योजना के तहत हर घर तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के लगभग 75 से 80 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन पहुंच चुका है, लेकिन पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में यह व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाई है। पोलिंग गांव इसका एक उदाहरण है, जहां कनेक्शन तो हैं, लेकिन नियमित जल आपूर्ति अभी भी सुनिश्चित नहीं हो पाई है।

वहीं प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना के तहत उत्तराखंड में ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की गई है। वर्ष 2023–2024 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य में इस योजना के अंतर्गत लगभग 2.5 लाख से अधिक घरों को बिजली कनेक्शन प्रदान किया जा चुका है। इसके साथ ही उत्तराखंड ने लगभग पूर्ण घरेलू विद्युतीकरण का लक्ष्य हासिल कर लिया है, जिसका अर्थ है कि कागज़ों पर अब लगभग हर घर तक बिजली का कनेक्शन मौजूद है। यह उपलब्धि निश्चित रूप से एक बड़ी प्रशासनिक सफलता के रूप में देखी जाती है, क्योंकि इससे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों को भी बिजली नेटवर्क से जोड़ा जा सका है।

हालांकि, यदि बागेश्वर जैसे पहाड़ी जिलों की वास्तविक स्थिति पर नज़र डाली जाए, तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। यहां अधिकांश घरों तक बिजली के कनेक्शन तो पहुंच चुके हैं, लेकिन बिजली की आपूर्ति अब भी अनियमित बनी हुई है। विशेषकर बारिश और बर्फबारी के दौरान बिजली की लाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिससे कई गांवों में घंटों नहीं बल्कि दिनों और कभी-कभी हफ्तों तक बिजली नहीं रहती। इस तरह, कनेक्शन होने के बावजूद लगातार और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति का अभाव ग्रामीण जीवन को प्रभावित करता है। यह स्थिति इस बात को स्पष्ट करती है कि केवल बिजली पहुंचाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां भौगोलिक परिस्थितियां पहले से ही चुनौतीपूर्ण हैं।

दरअसल विकास केवल योजनाओं और आंकड़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका असर जमीनी स्तर पर लोगों के जीवन में दिखाई देना चाहिए। जब तक हर घर में साफ पानी और हर कमरे में रोशनी नहीं पहुंचेगी, तब तक प्रगति अधूरी रहेगी। इन पहाड़ों के बीच रहने वाली लड़कियां और महिलाएं हर दिन अपने संघर्ष से एक नई उम्मीद को जन्म दे रही हैं। अब समय है कि उनकी इस आवाज को सुना जाए और उनके जीवन में वास्तविक बदलाव लाया जाए, ताकि पहाड़ों का यह संघर्ष एक दिन खुशियों की गूंज में बदल सके और विकास की वास्तविक परिभाषा जमीन पर उतरती नजर आए।