समाज

इच्छा मृत्यु केवल कानून ही नहीं, मानवीय गरिमा का प्रश्न

-ः ललित गर्ग:-

भारतीय समाज में यह गहरी धारणा रही है कि परिवार के किसी सदस्य की सेवा तब तक की जाए, जब तक उसके प्राण स्वाभाविक रूप से समाप्त न हो जाएं। जीवन की रक्षा और उसकी देखभाल को एक नैतिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता रहा है। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में रोगी की सेवा केवल चिकित्सा का विषय नहीं होती, बल्कि भावनात्मक, धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था से भी जुड़ी होती है। कई बार यह भी देखा गया है कि प्रियजन की मृत्यु के बाद भी उसे लंबे समय तक जीवन लौटने की आशा में संभालकर रखा जाता रहा है। लेकिन जब कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में पहुंच जाए, जहां से सामान्य जीवन में लौटने की कोई संभावना न हो और उसका अस्तित्व केवल कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणालियों पर निर्भर रह जाए, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल जैविक अस्तित्व को बनाए रखना ही जीवन की रक्षा है? या फिर जीवन की गरिमा को ध्यान में रखते हुए व्यक्ति को पीड़ा से मुक्ति देने का अधिकार भी स्वीकार किया जाना चाहिए?
इसी जटिल और संवेदनशील प्रश्न के केंद्र में 11 मार्च 2026 को भारत के सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा दिया गया वह निर्णय है, जिसमें गाज़ियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई। लगभग तेरह वर्षों से कोमा में जीवन बिताने वाले इस युवक के मामले में अदालत का यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश भर नहीं है, बल्कि जीवन, मृत्यु और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन खोजने का एक गंभीर एवं संवेदनशील प्रयास भी है। दरअसल, हरीश राणा का मामला हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि इच्छामृत्यु का प्रश्न केवल कानून का विषय नहीं है, बल्कि एक गहरी मानवीय कहानी भी है। यह एक ऐसे युवा की कहानी है, जिसका जीवन एक दुर्घटना के बाद अचानक बदल गया और जो तेरह वर्षों तक एक मौन जीवन-मृत्यु संघर्ष में जीता रहा। उस संघर्ष में शब्द नहीं थे, संवाद नहीं था, केवल एक स्थिर और असहाय जैविक अस्तित्व था। ऐसे में परिवार, चिकित्सकों और समाज के सामने यह कठिन दुविधा खड़ी हो जाती है कि जीवन को किस सीमा तक कृत्रिम रूप से बनाए रखा जाए।
इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 है, जो प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। समय के साथ न्यायपालिका ने इस अनुच्छेद की व्याख्या को व्यापक बनाते हुए यह स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार केवल सांस लेने या जीवित रहने का अधिकार नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी है। इसी संवैधानिक दृष्टिकोण ने आगे चलकर यह प्रश्न उठाया कि यदि व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है, तो क्या उसे गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी नहीं होना चाहिए? भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ा न्यायिक विमर्श धीरे-धीरे विकसित हुआ है। वर्ष 2011 में अरुणा शानबाग मामले में सर्वाेच्च न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। यह मामला एक ऐसी नर्स का था, जो दशकों तक कोमा की स्थिति में रही। उस निर्णय ने इस विषय पर व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया। इसके बाद वर्ष 2018 में कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को संवैधानिक मान्यता देते हुए ‘लिविंग विल’ की अवधारणा को स्वीकार किया। इसके अनुसार कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही यह लिखित रूप में व्यक्त कर सकता है कि यदि वह असाध्य स्थिति में पहुंच जाए तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणालियों पर निर्भर न रखा जाए।
हरीश राणा के मामले में चिकित्सा विशेषज्ञों के बोर्ड ने यह स्पष्ट किया कि निरंतर उपचार का कोई चिकित्सीय उद्देश्य शेष नहीं रह गया था। चिकित्सा केवल जैविक अस्तित्व को लंबा खींचने का माध्यम बन गई थी। ऐसे में अदालत की स्वीकृति इस कठिन सत्य को स्वीकार करती है कि जीवन की गरिमा केवल जीने में ही नहीं, बल्कि मृत्यु में भी बनी रहनी चाहिए। फिर भी इच्छामृत्यु का प्रश्न अत्यंत जटिल और विवादास्पद रहा है। दुनिया के अनेक देशों में इस विषय पर गंभीर नैतिक और कानूनी बहस चलती रही है। कई देशों ने इसे सीमित परिस्थितियों में कानूनी मान्यता दी है, जबकि कई अन्य देशों में इसके दुरुपयोग की आशंका के कारण इसे स्वीकार नहीं किया गया है। भारत में भी यह विषय संवेदनशील बना हुआ है, क्योंकि यहां पारिवारिक संबंधों, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक भावनाओं की भूमिका अत्यंत गहरी है।
इसी संदर्भ में जैन धर्म में प्रचलित संथारा या सल्लेखना की परंपरा भी कई बार चर्चा में आती रही है। जैन दर्शन में इसे मृत्यु का महोत्सव कहा गया है। संथारा का अर्थ है-जीवन के अंतिम चरण में धीरे-धीरे आहार और शरीर की आसक्तियों का त्याग करते हुए शांति एवं समाधिपूर्वक मृत्यु को स्वीकार करना। जैन आचार विचार में इसे आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का सर्वाेच्च रूप माना गया है। संथारा और आधुनिक इच्छामृत्यु के बीच अंतर भी है और समानताएं भी। संथारा का आधार आध्यात्मिक साधना और वैराग्य है, जबकि आधुनिक इच्छामृत्यु का आधार चिकित्सा विज्ञान और मानवीय पीड़ा से मुक्ति का विचार है। फिर भी दोनों के केंद्र में एक समान भाव दिखाई देता है-जीवन की अंतिम अवस्था में गरिमा और स्वायत्तता का सम्मान। हालांकि इस परंपरा को लेकर भी न्यायालयों में बहस होती रही है कि क्या इसे धार्मिक स्वतंत्रता माना जाए या आत्महत्या के रूप में देखा जाए। इस बहस ने यह स्पष्ट किया है कि जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न केवल कानूनी तर्कों से हल नहीं होते, बल्कि उनमें नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयाम भी शामिल होते हैं। प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक विनोबा भावे ने इस परंपरा की विशेष सराहना की थी। उन्होंने कई अवसरों पर यह इच्छा भी व्यक्त की थी कि यदि संभव हो तो वे भी जीवन के अंतिम क्षणों में इसी प्रकार की शांत, संयमित और जागरूक मृत्यु प्राप्त करना चाहेंगे।
इसीलिए हरीश राणा का मामला हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि संविधान की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदनशील व्याख्या में निहित है। जब न्यायपालिका जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए मानवीय गरिमा और करुणा को केंद्र में रखती है, तब वह केवल कानून का पालन नहीं करती, बल्कि समाज को अधिक संवेदनशील और मानवीय दिशा भी प्रदान करती है। यह भी सच है कि भारत में इच्छामृत्यु को लेकर अभी तक कोई समग्र और स्पष्ट कानून नहीं है। न्यायालय के दिशा-निर्देशों के बावजूद परिवारों और चिकित्सकों को कई बार जटिल प्रक्रियाओं और कानूनी आशंकाओं का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने स्वयं इस विषय पर एक व्यापक कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया है। ऐसा कानून बनाते समय दो महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना होगा। पहली, यह कि असाध्य रोगियों को अनावश्यक पीड़ा से मुक्ति मिल सके। दूसरी, यह कि किसी प्रकार के दबाव, स्वार्थ या आर्थिक कारणों से किसी व्यक्ति को इच्छामृत्यु के लिए विवश न किया जा सके। स्पष्ट प्रोटोकॉल, पारदर्शी चिकित्सा मूल्यांकन और रोगी की स्वायत्त इच्छा का सम्मान इस प्रक्रिया के आवश्यक तत्व होने चाहिए।
निश्चिततौर पर यह कहा जा सकता है कि हरीश राणा के मामले में दिया गया निर्णय केवल एक न्यायिक आदेश नहीं है, बल्कि संवैधानिक करुणा का एक उदाहरण है। इसमें न्याय, संवेदना और मानवीय गरिमा तीनों का संतुलित रूप दिखाई देता है। वास्तव में यह निर्णय हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि जीवन का सम्मान केवल उसे लंबा खींचने में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा को बनाए रखने में है। जब उपचार असंभव हो जाए और चिकित्सा केवल पीड़ा को बढ़ाने का माध्यम बन जाए, तब गरिमापूर्ण विदाई भी मानवीयता का ही विस्तार बन जाती है। इस दृष्टि से यह आवश्यक है कि भारत में इच्छामृत्यु के प्रश्न पर व्यापक सामाजिक संवाद हो और एक ऐसा संवेदनशील तथा संतुलित कानूनी ढांचा तैयार किया जाए, जो व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने और गरिमा के साथ मरनेकृदोनों का अधिकार सुनिश्चित कर सके।