लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य

लोग मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी। बहिर्मुखी लोगों के दिल और दिमाग की खिड़कियाँ बाहर की ओर खुली रहती हैं जबकि अन्तर्मुखी प्रवृत्ति वाले लोगों के मन-मस्तिष्क की खिड़कियां और दरवाजे अन्दर की ओर खुले रहते हैं।

आम तौर पर अन्तर्मुखी लोेगों को रहस्यमयी और अनुदार समझा जाता है और बहिर्मुखी लोगों को बिन्दास और उदार। लेकिन असल में अन्तर्मुखी एवं बहिर्मुखी व्यक्तियों के बारे में जो धारणाएं होती हैं उन्हें सही नहीं माना जा सकता।

इन दोनों ही किस्मों के लोगों की वृत्तियां उदार-अनुदान और अच्छी-बुरी सभी प्रकार की हो सकती हैं। अन्तर्मुखी लोग उदार भी हो सकते हैं और बहिर्मुखी लोग अनुदार भी। हकीकत यह है कि बहिर्मुखी लोगों में से ज्यादार लोग नकलची और लोक दिखाऊ भी हुआ करते हैं।

आदमी कैसा भी हो, अन्तर्मुखी या बहिर्मुखी। लेकिन दोनों ही प्रकार के लोगों को भीतरी तौर पर दुःखी नहीं होना चाहिए। जहाँ दुःख होता है वहाँ दोनों ही प्रकार के लोगों का व्यक्तित्व विफल है। अन्तर्मुखी लोगों के बारे में यह समझा और सोचा जाता है कि ये प्रायःतर किसी न किसी समस्या से ग्रस्त और दुःखी रहते हैं और कई समस्याओं के जाल अपने आस-पास बुन लिया करते हैं।

कई लोग अन्तर्मुखी लोगों को उदास, दुःखी या अवसाद ग्रस्त मानते हैं जबकि यह सच नहीं है। असल में देखा जाए तो बहिर्मुखी स्वभाव वालों की तुलना में अन्तर्मुखी स्वभाव वाले लोग ज्यादा मस्त और आत्म आनंद में निमग्न हुआ करते हैं और ऎसे ही लोग पूरी एकागर््रता के साथ अपने फर्ज को पूर्ण करके ही चैन लेते हैं।

आत्म आनंद की प्राप्ति सामान्य लोगों के बस में नहीं हुआ करती है। यह उन्हीं लोगों को प्राप्त हो सकती है जिन लोगों में हर स्थिति में समत्व भाव होता है और भारीपन हो अथवा जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि उच्चतम संस्कारों और आदर्शों से परिपूर्ण हो अथवा आध्यात्मिक स्तर काफी ऊँचा हो। ऎसी स्थिति में अन्तर्मुखी स्वभाव वाले लोग आत्म आनंद में मस्त रहते हुए जीवन लक्ष्यों की प्राप्ति को गति प्रदान करते रहते हैं।

जो लोग अन्तर्मुखी स्वभाव वाले होते हैं उनके लिए संवेदनशील होना स्वाभाविक है और ऎसे लोग अक्सर दुःखी होने लगते हैं। अन्तर्मुखी होना अच्छी बात है कि लेकिन संवेदनाओं का उतना बड़ा कैनवास भी नहीं होना चाहिए कि बाहरी तत्व और कारक हमें प्रभावित कर सकें। अन्तर्मुखी होने वाले लोगों को चाहिए कि वे बाहरी कारकों से अप्रभावित रहें और उसी दिशा में आगे बढ़ें जो आनंद और मस्ती भरा है और जिससे जीवन के हर क्षण में सुकून का दरिया अपने आप बहता रहे।

बड़े से बड़े बहिर्मुखी लोग भी जीवन में एक ऎसे मोड़ पर आ ही जाते हैं जहां उन्हें अन्तर्मुखी होना ही पड़ता है और ऎसे में जीवन में उस मोड़ पर जाकर उन्हें अन्तर्मुखता के आनंद से साक्षात होता है और तब लगता है कि यह आनंद उन्हें यदि जीवन के आरंभ में प्राप्त होता तो कितना अच्छा होता।

जो लोग अन्तर्मुखी हैं वे ही जीवन में आत्मीय आनंद और उच्चतम लक्ष्यों को प्राप्त कर पाते हैं और इसी किस्म के लोग जीवन में महानतम कर्मयोग को अंजाम दे पाते हैं। अन्तर्मुखी होने का मतलब है अपने भीतर झांकना।

जो बाहर की ओर झाँकने के आदी हैं उनकी प्रसन्नता के भाव क्षणिक और अस्थायी आनंद देने वाले होते हैं जबकि अपने भीतर झाँकने का अभ्यास कर लेने वाले लोग आत्म जागृति के सोपान तय करते हुए कम समय में उसे प्राप्त कर लेते हैं जो बहिर्मुखी लोग बरसों गुजार कर भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

अन्तर्मुखी रहें तथा आत्मीय आनंद में डूबे रहें। ऎसा हो जाने पर अन्तर्मुखी लोग उन लोगों से ज्यादा व्यापक और स्थायी लोकप्रियता अर्जित कर सकते हैं जो बहिर्मुखी स्वभाव वाले हैं।

One Response to “अन्तर्मुखी भले रहें अन्तर्दुखी न रहें”

  1. Binu Bhatnagat

    अच्छा लेख है, अंतर्मुखी होने का अर्थ दुखी रहना नहीं है।बहिर्मुखी माने जाने वाले लोग भी अंदर से दुखी रहने वाले हो सकते हैं।

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