कानून के डर की बजाए स्वनियमन ही दहेज़ प्रथा को खत्म करेगा

अनुशिखा त्रिपाठी

दहेज़ प्रताड़ना के बढ़ते मामलों के बीच महिला एवं बाल विकास मंत्रालय दहेज़ हत्या के दोषियों के लिए आजीवन कारावास की मांग करने वाला है| दरअसल देश में दहेज उत्पीड़न के कारण महिलाओं की मौत के मामलों में कमी नहीं आने से नाराज महिला एवं बाल विकास मंत्रालय दंड कानून में संशोधन के लिए जल्द कानून मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजने की तैयारी में है। हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने भी स्वीकार किया कि वे जल्द ही कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से कानून में संशोधन के लिए अनुरोध का प्रस्ताव भेज रही हैं, जिससे कि आरोप साबित होने पर दोषियों के लिए आईपीसी की धारा ३०४(ब) के तहत सिर्फ आजीवन कारावास का प्रावधान हो सके। फिलहाल इस धारा के तहत न्यूनतम सात साल और अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान है। तीरथ ने यह भी माना कि दहेज लोभ में होने वाली हत्याओं को हतोत्साहित करने के लिए कड़े कदम उठाना जरूरी है। इस बर्बरता से निपटने के लिए दोषियों को कुछ सालों की सजा की जगह आजीवन कारावास सबसे जायज विकल्प है। तीरथ के मुताबिक अदालती मामलों में परेशान महिलाओं की राह आसान करने के लिए भी वे कानून मंत्री से विचार विमर्श करेंगी ताकि महिलाओं के दीवानी या आपराधिक मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुलझाने की व्यवस्था हो सके। गौरतलब है कि दहेज़ की कुरीतियों पर सदियों से बहस जारी है व आजाद भारत का कानून इसे अपराध की श्रेणी में रखता है किन्तु भारतीय समाज दहेज़ के दानव से आजतक मुक्त नहीं हो पाया है| आधुनिक तथा पढ़े-लिखे परिवेश में भी दहेज़ प्रथा का चलन समाज के मानसिक दिवालियेपन की ओर इंगित करता है वहीं इस धारणा को पुष्ट करता है कि कुछ कुरीतियाँ समाज में घुन कर जाती हैं जिनसे शत-प्रतिशत पार पाना संभव ही नहीं है| वैसे भी दहेज़ का चलन कानून व्यवस्था के जरिए नहीं अपितु स्व नियमन द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है और यह स्व नियमन तभी आ सकता है जब दहेज़ से समाज में होने वाली कुरीतियों को समाज में रहने वाले दहेज़ लोभी खुद न भुगत लें|

दो वर्ष पूर्व अक्टूबर २०१० में उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा की खंडपीठ ने दहेज़ हत्या से जुड़े एक एक फैसले की सुनवाई करते हुए कहा था कि दहेज हत्या के मामले में फांसी की सजा होनी चाहिए। ये केस ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ कैटिगरी में आते हैं। कोर्ट ने यह भी माना था कि स्वस्थ समाज की पहचान यही है कि वह महिलाओं को कितना सम्मान देता है, लेकिन भारतीय समाज बीमार हो गया है। ज़ाहिर है न्यायाधीशों की सोच भी दहेज़ प्रताड़ना से हुई हत्या को जघन्यतम अपराध की श्रेणी में रहता है और ऐसा होना भी चाहिए| पर देश की लचर कानून व्यवस्था का दोष कहें या समाज में व्याप्त पुरुषवादी मानसिकता, दहेज़ प्रकरण के कई मामलों में महिलाओं के आरोप सिद्ध होने या उनका मामला रफा दफा होने में लंबा समय लग जाता है। इस दौरान महिला को बेवजह लंबा समय काटना पड़ता है, जबकि उसके परिवार और बच्चों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जबकि होना यह चाहिए कि दहेज़ मामलों को अधिकतम छह माह के अंदर निपटाया जाए। गौरतलब है कि भारतीय दंड संहिता के दहेज हत्या के संबंध में धारा ३०४ (ब) के तहत ८,६१८ मामले और भारतीय दंड संहिता का पति और उसके परिजनों की ओर से उत्पीड़न के खिलाफ धारा ४९८ (अ) के तहत ९९,१३५ मामले उजागर हुए हैं। ज़ाहिर है इतने अधिक मामलों में किसी भी न्यायालय को फैसला देने में देरी होगी ही|

दहेज़ के बढ़ते मामले समाज में अन्य कई कुरीतियों को भी जन्म देते हैं| मसलन कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों के पीछे भी लड़की की शादी के वक्त दहेज़ देने की बात सामने आती है| प्रसव पूर्व लिंग जांच परीक्षण भी इसी दहेज़ कुरीति का परिणाम है| हालांकि कानूनी डंडे की दम पर प्रसव पूर्व लिंग जांच परीक्षण मामलों में कमी आई है किन्तु इसे सफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि कानून का डर हर किसी में मन में और हर जगह हो यह संभव नहीं है| जहां तक बात दहेज़ प्रकरणों की है तो अधिकाँश मामले घर की इज्ज़त के नाम पर चारदिवारी से बाहर ही नहीं आ पाते हैं| आजकल तो यह भी देखने में आ रहा है कि लड़की भले ही लाख पढ़ी-लिखी या नौकरीपेशा क्यों न हो, दहेज़ की मांग तब भी की जाती है| और तब ऐसा महसूस होता है कि महिला सशक्तिकरण की बात करना हमारे सामाजिक तानेबाने को देखते हुए बेमानी ही है| दहेज़ प्रथा व उससे जुडी कुरीतियों पर ऐसा नहीं कि समाज अज्ञानी हो किन्तु जब कुरीति को जानते हुए भी समाज उसे स्वीकृति दे रहा है तो यह मानना पड़ेगा कि दहेज़ का चलन गलती नहीं बल्कि समाज की आदत बन गई है और यह आदत न तो पहले बदली थी और न निकट भविष्य में बदलने वाली है| जहां तक सजा बढ़ाने की बात है तो यह एक सार्थक पहल है पर इससे बहुत अधिक आशान्वित होने की जरुरत नहीं है| बदलाव कानून नहीं खुद में लाना होगा तभी इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ाई को जीता जा सकेगा|

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