लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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तनवीर जाफ़री

भारतीय राजनीति में इन दिनों ‘सूत न कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा’ वाली कहावत को हूबहू चरितार्थ होती देखा जा सकता है। हालांकि लोकसभा चुनाव अभी 2014 में होने हैं परंतु ‘कौन बनेगा प्रधानमंत्री इस बात को लेकर देश के कुछ प्रमुख नेताओं में काफी होड़ मची हुई है। सक्रिय राजनीति से बैकफुट पर जा चुके लालकृष्ण अडवाणी, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की फिलहाल पतली हो रही हालत को देखकर एक बार फिर यह आस लगा बैठे हैं कि हो सकता है उनके राजनैतिक जीवन के इस अंतिम पड़ाव में ही सही पर शायद इसी बार उनकी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा पूरी हो जाए। उधर गुजरात के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के सामने ‘वाईब्रेंट गुजरात’ का ढोल पीटते-पीटते स्वयं को भाजपा का सबसे कद्दावर नेता समझने लगे हैं। और उनकी इसी गलतफहमी ने उन्हें भी यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि ‘वाईब्रेंट गुजरात’ के बाद क्यों न ‘वाईब्रेंट भारत’ का राग अलापने का सिलसिला शुरू कर दिया जाए। लिहाज़ा वे भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में एक गंभीर उम्‍मीदवार के रूप में पहली बार शामिल होते दिखाई दे रहे हैं। कमोबेश कुछ ऐसी ही स्थिति बिहार के मु यमंत्री नितीश कुमार की भी है। मीडिया ने उन्हें सुशासन बाबू तथा विकास बाबू जैसी उपाधियां देकर उनका दिमाग चौथे आसमान पर पहुंचा दिया है। लिहाज़ा राजनैतिक समीकरणों के मद्देनज़र तथा अपने पक्ष में मीडिया द्वारा पीट रहे ढिंढोरे के मद्देनज़र वे भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ से खुद को बाहर नहीं रखना चाह रहे हैं। ऐसे में एक ज़रूरी सवाल यह उठता है कि देश को नेतृत्व देने का शौक़ पालने वाले इन नेताओं की आखिर अपनी ज़मीनी हकीकत क्या है? पार्टी स्तर पर इनके भीतरी हालात जब पूरी तरह इनके पक्ष में नहीं हैं फिर आखिर भारत जैसे विशाल देश के प्रधानमंत्री बनने का सपना यह नेता कैसे पाल लेते हैं?

दरअसल पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मोरारजी देसाई, और नरसिंहा राव आदि भारत के उन प्रधानमंत्रियों के नाम है जो लगभग सभी अपनी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। परंतु देश में चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर तथा विश्वनाथ प्रताप सिंह ऐसे प्रधानमंत्रियों में गिने जाते हैं जो जोड़-तोड़ कर तथा इधर-उधर से समर्थन लेकर यहां तक कि अपने वैचारिक विरोधियों तक का समर्थन हासिल कर देश के प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पदों तक पहुंचे। इसी प्रकार एच डी देवगौड़ा व इंद्रकुमार गुजराल देश के ऐसे दो प्रधानमंत्री हुए हैं जिन्हें भाग्यवश प्रधानमंत्री पद पर बैठने वाला नेता कहा जा सकता है। यानी प्रधानमंत्री पद के दो दावेदारों की लड़ाई के बीच इन नेताओं की ‘लॉटरी’ लग चुकी है। और गठबंधन सरकारों के इन्हीं प्रधानमंत्रियों ने क्षेत्रीय स्तर के नेताओं को भी ऐसी गलतफहमी पालने के लिए मजबूर कर दिया है कि देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए उसके पास 272 सांसदों का समर्थन होना कोई ज़रूरी नहीं बल्कि पांच-दस, पंद्रह-बीस या पच्चीस सांसदों के साथ भी देश का प्रधानमंत्री बना जा सकता है। और इसी सोच ने न सिर्फ नितीश कुमार व नरेंद्र मोदी के मन में प्रधानमंत्री पद की इच्छा जागृत कर दी है बल्कि मायावती,लालू प्रसाद यादव व मुलायम सिंह यादव जैसे क्षेत्रीय नेता भी स्वयं को प्रधानमंत्री पद का योग्य व मज़बूत उ मीदवार समझने लगे हैं।

ऐसे में प्रश्र यह है कि जो नेता देश को प्रधानमंत्री के रूप में नेतृत्व प्रदान करने का सपना पाल रहे हैं आखिर उनकी अपनी दलीय स्तर की ज़मीनी हकीकत क्या है? देश को नेतृत्व देने का दम भरने वाले यह नेता अपने पैरों के नीचे की खिसकती हुई ज़मीन से भी बाखबर हैं अथवा नहीं? अब लाल कृष्ण अडवाणी को ही ले लीजिए। भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा निकाल कर अन्ना हज़ारे के आंदोलन के समय सड़कों पर उतरे लोगों को अपने साथ जोडऩे जैसी राजनैतिक चाल ज़रूर चल रहे हैं परंतु भाजपा की रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ साफतौर पर उन्हें इस बात के लिए खबरदार कर रहा है कि वे अपनी रथयात्रा तो भले ही निकालें परंतु स्वयं को प्रधानमंत्री पद के लिए हरगिज़ पेश न करें। पार्टी में भी उनके संभावित प्रधानमंत्री बनने को लेकर एक राय नहीं है। ऐसे में क्या यह सवाल उचित नहीं है कि जब आपकी पूरी पार्टी ही आपके साथ नहीं है फिर आखिर आप किस बलबूते पर देश को नेतृत्व देने की बात सोच रहे हैं। जब भाजपा शासित राज्यों के सभी मु यमंत्री आपके नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर रहे फिर आखिर वैचारिक मतभेद रखने वाले संभावित गठबंधन दलों से आप यह उम्‍मीद कैसे रख सकते हैं कि वे आपको देश का प्रधानमंत्री स्वीकार करेंगे?

यही स्थिति नरेंद्र मोदी की भी है। हिंदू वोट बैंक की राजनीति कर उन्होंने स्वयं को गुजरात के एक मज़बूत भाजपाई नेता के रूप में स्थापित कर लिया है। और गुजरात के इसी वोट बैंक के बल पर वे अब स्वयं को प्रधानमंत्री पद का एक सफल उम्‍मीदवार समझने लगे हैं। स्वयं को इस स्थिति तक पहुंचाने में मोदी ने भी कोई कम ‘तपस्या’ नहीं की है। पूरे देश में ‘वाईब्रेंट गुजरात’ का ढिंढोरा पीटने के लिए उन्होंने एक अमेरिकी कंपनी को उच्चस्तरीय व हाईटेक विज्ञापन तैयार करने का ठेका दिया था। अमिताभ बच्चन जैसे लोकप्रिय अभिनेता को राज्य का ब्रांड एंबेसडर भी इसी मकसद से नियुक्त किया। बंगाल से हटाए गए टाटा के नैनो कार प्रोजेक्ट को गुजरात में जगह देकर देश को यह बताने की कोशिश की कि गुजरात जैसे विकसित राज्य में उद्योगपति किस प्रकार खुशी-खुशी अपना निवेश कर रहे हैं। और समय-समय पर रतन टाटा, अनिल अंबानी व सुनील मित्तल जैसे उद्योगपतियों के मुंह से अपने बारे में कसीदे सुनकर भी मोदी के भीतर की गुप्त इच्छाएं हिचकोले खाने लगती हैं। इन हालात में मोदी का प्रधानमंत्री बनने के विषय में सोचना ज़ाहिर है कोई ज्य़ादा अटपटा नहीं लगता। परंतु फिर वही अडवाणी जैसी समस्या नरेंद्र मोदी के सामने भी आ खड़ी होती है। यानी क्या आपके साथ आपकी पूरी पार्टी का समर्थन है जो आप देश का प्रधानमंत्री बनने के सपने ले रहे हैं? शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा क ार्यकारिणी की बैठक के दौरान यह कहते दिखाई देते हैं कि पार्टी में अडवाणी जी से वरिष्ठ कोई नेता ही नहीं तो पार्टी के गुजरात प्रभारी कहते हैं कि यदि मोदी को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला तो वे देश के अब तक के सबसे सफल प्रधानमंत्री साबित हो सकते हैं। इतना ही नहीं बल्कि अडवाणी व नरेंद्र मोदी दोनों की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं भा रही। यही वजह है कि आमतौर पर गुजरात के सोमनाथ से अपनी रथ यात्राएं शुरू करने वाले अडवाणी इस बार बिहार के सिताब दियारा से अपनी यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं वह भी समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण के जन्म दिन के अवसर पर बिहार के मु यमंत्री नितीश कुमार से हरी झंडी पाकर। यानी अडवाणी की ओर से नरेंद्र मोदी को भी खुला संदेश दिया जा रहा है कि उन्हें नितीश कुमार से कोई आपत्ति नहीं न ही नीतिश को अडवाणी की यात्रा से कोई आपत्ति है जबकि ठीक इसके विपरीत नितीश कुमार बिहार के अल्पसं यक समुदाय को मोदी से फासला बनाए रखने के ही बार-बार संदेश देते आ रहे हैं।

अब आईए ज़रा नितीश कुमार की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की भी ज़मीनी हकीकत का अंदाज़ा लगाया जाए। अन्य नेताओं की ही तरह नितीश कुमार भी हवा भरे गुब्बारे की तरह प्रधानमंत्री पद की ओर लपकने की जुगत भिड़ा रहे हैं। परंतु हकीकत यह है कि इस समय उन की अपनी पार्टी के भीतर विरोध व विद्रोह के स्वर उठ रहे हैं। विपक्षी दल नहीं बल्कि स्वयं उनकी अपनी पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उनकी कार्यशैली तथा विकास के उनके दावों को खुले आम चुनौती दे रहे हैं। राज्य के कई जेडीयू विधायकों व कई सांसदों का यह मानना है कि पिछले विधान सभा चुनावों में जबसे नितीश कुमार पूर्ण बहुमत से पुन: सत्ता में आए है तब से उनका दिमाग चौथे आसमान पर पहुंच गया है। उनके विरोधी जेडीयू नेतागण ही यह आरोप लगा रहे हैं कि नितीश कुमार का सुशासन व विकास का प्रचार महज़ एक ढोंग, ड्रामा तथा मीडिया व अफसरशाही की मिलीभगत के सिवा और कुछ नहीं है। नितीश कुमार के समकक्ष पूर्व सांसद व राज्य में मंत्री रहे जेडीयू विधायक छेदी पासवान तो खुले तौर पर नितीश कुमार की मुख़ालफत करते हुए यह कहते हैं कि नितीश कुमार जन कल्याण संबंधी योजनाओं पर होने वाले खर्च के बजट को संबंधित योजनाओं पर खर्च करने के बजाए राज्य सरकार का झूठा कसीदा पढऩे वाले विज्ञापनों पर खर्च कर रहे हैं। पासवान का आरोप है कि 122 करोड़ रुपये का खर्च अब तक केवल राज्य सरकार की तारीफ के पुल बांधने वाले इन्हीं लोक-लुभावने झूठे विज्ञापनों पर खर्च किया जा चुका है।

जेडीयू के यही नेता राज्य में घोर भ्रष्टाचार का भी सरेआम इल्ज़ाम लगा रहे हैं तथा जनकल्याण संबंधी योजनाओं के प्रचार को महज़ एक शोर शराबा व ढोंग बता रहे हैं। नितीश की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर यही नेता उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं तथा उनके इस य़ाली पुलाव पकाने की कोशिशों को सपने देखने जैसी बातों की संज्ञा दे रहे हैं। जेडीयू के ही इन्हीं नेताओं का यहां तक कहना है कि आगामी लोकसभा चुनावों में राज्य में जेडीयू के निर्वाचित होने वाले सांसदों की संख्‍या स्वयं यह बता देगी कि नीतिश कुमार बिहार में कितने पानी में हैं ऐसे में प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना उसी समय धराशाही हो जाएगा। प्रधानमंत्री पद के उपरोक्त समस्त दावेदारों के अपने दलों की भीतरी स्थिति फिलहाल तो यही संदेश दे रही है कि यह नेता भले ही देश का प्रधानमंत्री बनने के सपने क्यों न ले रहे हों परंतु दरअसल इनके अपने पैरों के नीचे की ज़मीन स्वयं खिसकती जा रही है। बेहतर होगा देश के इस सर्वोच्च पद पर नज़रें गड़ाने से पूर्व अपने दलीय हालात को ठीक तरह तथा अपनी आलोचनाओं व विरोध के कारणों को बखूबी समझने का प्रयास करें।

8 Responses to “प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के पैरों तले खिसकती ज़मीन”

  1. SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR

    ये भारत देश है सरदार यहाँ हाथ भर जमीन के लिए भाई भाई का हाथ काट लेता है …..और देश भ्रष्टाचारियो के सरदार प्रधान मंत्री ने हजारो एकड़ जमीन अमेरिका द्वारा पाले जा रहे आतंकवादियों को दान में दे दी ……

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  2. एल. आर गान्धी

    L.R.Gandhi

    अन्ना भी अपना आन्दोलन देश के दुर्भाग्य के नाम पर ही चला रहे हैं. आज़ादी से पहले बहुमत और योग्यता होने के बावजूद किस प्रकार सुभाष को नकार दिया गया ..आज़ादी के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल की उपेक्षा कर नेहरु को देश की बाग़ डोर थमा दी गई . आज उसी दुर्भाग्य की छाया १२५ साल पुराणी पार्टी और इस महान देश पर देश का काल बन कर छाई है … वह दुर्भाग्य पूर्ण छाया है … गाँधी ‘

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  3. vimlesh

    भ्रष्ट नेता+ भ्रष्ट मंत्री + भ्रष्ट संत्री + भ्रष्ट अधिकारी + भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी +असामाजिक तत्त्व +आतंकवादी + पाशचात्य संस्कृति =”सेकुलरिज़्म”

    सेकुलरिज़्म के पाँच मुख्या गुण है …..

    १-चोरी २-चुगली ३-कलाली ४-दलाली ५-छिनाली

    सर्व गुण संपन्न खलिश सेकुलर हमारी राजमाता है ना प्रधानमंत्री पद के लिए सर्व उपयुक्त उम्मीदवार उन्ही के चरण कटहल में देश का निर्माण हो रहा है

    और आगे भी होता रहेगा यह मेरा नहीं लेखक का कथन है शेस पार्टियों से उनका घर नहीं संभालता देश क्या संभालेगे खाक.

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  4. dharmvir kajla

    चंदर जी हम आपके साथ ह
    धर्मवीर काजला
    फतेहाबाद
    हरियाणा

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  5. आर. सिंह

    R.Singh

    जाफरी साहब आपने अपने लेखमें कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं की धज्जिय तो उड़ा दी,पर आपने यह तो बताया नहीं की आपकी दृष्टि में प्रधान मंत्री के पद का वास्तविक अधिकारी कौन है और क्यों है?
    दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ,वह यह है की नितीश कुमार को दावेदारों की श्रेणी में खड़ा करके आपने मीडिया का साथ दिया है,जो खामहखाह उनके नाम को उछाल रहाहै जब की नितीश ने ऐसा कभी दर्शाया ही नहीं.ऐसे भी नितीश कुमार पेशे से अभियंता हैं,अतः मेरे विचार से धरातल पर ही चलने की कोशिश करते हैं आसमान में छलांग नहीं लगाते और उनको जमीनी हकीकत मालूम है.आपने जिन नेताओं के विचारों के आधार पर नितीश कुमार के कार्य प्रणाली पर ऊँगली उठाई है,क्या कभी उनकी भी प्रमाणिकता की जाँच करने की चेष्टा की है?खाने वाले सब नेता और अफसर नितीश से नाराज हैं,पर जनता खुश है.नितीश कुमार को फिल हाल इससे अधिक कुछ चाहिए भी नहीं.
    ऐसे भी अन्ना हजारे के आन्दोलन के चलते बहुत से नेताओं को दिवा स्वप्न दिखने लगा है,पर कांग्रेस अभी भी थोडा अक्ल से काम ले और एक सशक्त लोक पाल बिल सामने लाये तो सब दलों और नेताओं की कलई खुल जायेगी

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  6. Anil Gupta,Meerut,India

    श्री तनवीर जाफरी जी का आलेख एकपक्षीय प्रतीत होता है. उन्होंने अडवाणी जी एवं नरेन्द्र मोदी तथा नितीश कुमार तक ही स्वयं को सीमित रखा है. लेकिन कांग्रेस के नेताओं के बारे में मौन हैं. शायद उन्हें लगता है की कांग्रेस के अन्दर केवल खानदान ही दावेदार है. जाने देश का ये परिवार मोह कब छूटेगा? मिडिया भी इसमें खानदान का सहायक है. लेकिन एक बात बिलकुल साफ़ है की इस समय देश बदल चाहता है और अन्य दावेदारों के मुकाबले देश की जनता मोदी को ज्यादा पसंद कर रही है जैसा की हाल में हुए कुछ ओपिनियन पोल में प्रगट हुआ है. केवल कुछ डाई हार्ड आलोचकों को छोड़ दें तो मोदी सारे देश को एक तरक्की पसंद इमानदार नेता के रूप में स्वीकार्य है. लेकिन लेखक के अपने पूर्वाग्रह हैं इसलिए बार बार उन्हें एक शेतान के रूप में दर्शाने का अभियान चलाया जाता है.जबकि कांग्रेस के नेताओं ने हमेशा ही हिन्दू मुस्लिम कार्ड को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है. आखिर १९६९ में गुजरात में २६०० लोगों की दंगों में मौत कांग्रेस के राज में ही हुई थीं.१९७० में महाराष्ट्र में दंगों में सेंकडों लोग कांग्रेस के वसंतदादा पाटिल के राज में ही मारे गए थे. १९८७ में यु.पी. में कांग्रेस के वीर बहादुर सिंह के राज में सेंकडों बेगुनाह मुसलमानों की पी ऐ सी के हाटों हत्या करवाकर लाशों को गंगनहर में किसने फिंकवाया था? लेकिन अफ़सोस ये सब फिर भी सेकुलर हैं. २००२ के गोधरा कांड में ५८ निर्दोष कारसेवकों को ट्रेन की बोगी में जिन्दा जलने के बाद भड़के दंगे में ११०० में से लगभग साढ़े तीन सौ हिदू भी मारे गए थे.

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  7. vimlesh

    जाफरी साहब

    सोनिया गधी से बेहतर कोई प्रधानमंत्री हो ही नहीं सकता .

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  8. SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR

    भ्रष्टाचार की सीधी लड़ाई आम आदमी को लड़नी होगी और इस सीधी लड़ाई में लाखो भारतीयों का कलेजा सरदार पटेल,भगतसिंह,सुखदेव,चंद्रशेखर आजाद,सुभाष चन्द्र बोस आदि…….जैसा चाहिए ,किन्तु आज जब भ्रष्ट भारत सरकार और राज्य सरकारों की महा भ्रष्ट पुलिस के डंडे और गोलिया चलती है तो ९९% लड़ाई लड़ने वाले चूहों की तरह भाग खड़े होते है और 1% ही श्री अन्ना हजारे की तरह मैदान में डटे रह पाते है | सुप्रीम कोर्ट ने भी हाथ खड़े कर दिए है की भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ने वालो की सुरक्षा के लिए देश में कोई क़ानून ही नहीं है| देश के भ्रष्ट नेताओं और मंत्रियो ने ऐसा कोई कानून बनाया ही नहीं, जिस प्रकार अंग्रेजो ने आजादी के लिए जान देने वालो के लिए कोई क़ानून नहीं बनाया था | मैंने सूना था की देश का क़ानून सर्वोपरि है किन्तु यहाँ तो देश के न्यायालय भी भ्रष्ट नेताओं की जमात पर निर्भर है , यही कारण है की हमारे देश में न्याय और क़ानून भ्रष्ट नेताओं,मंत्रियो और अमीरों की जेब में रखा रुपिया है वे जैसा चाहते है खर्च करते है | जँहा तक लोकपाल विधेयक का सवाल है वहा भी संसद और विधान सभा की तरह बहुमत भ्रष्ट नेताओं,मंत्रियो,संतरियो,अधिकारिओ और अमीरों का ही होना तय है अर्थात फैसला भ्रष्टाचार के पक्ष में ही होना है | आज निरा राडिया २ग़ स्पेक्ट्रुम घोटाले में शरद पवार की अहम् भूमिका बता रही है तो भी देश का कानून चुप है यही कानून जब किसी गरीब आम भारतीय को किसी शंका के आधार पर भी पकड़ता है भारतीय भ्रष्ट पुलिस गरीब भारतीय नीरा या शरद को पागल कुत्ते की तरह इतना दौड़ा कर मारती है की वह निर्दोष होकर भी पुलिस जैसा चाहती है वैसा अपराध कुबूल कर लेते है कई बार तो भरष्ट नेताओं,मंत्रियो,संतरियो, अधिकारिओ और अमीरों के अपराध भी गरीब भारतीयों के गले बांध दिए जाते है | इसलिए आदरणीय अन्ना का लोकपाल विधेयक फ़ैल होना तय है,क्योकि देश को लाखो सरदार पटेल,भगतसिंह,सुखदेव,चंद्रशेखर आजाद,सुभाष चन्द्र बोस चाहिए जो अंग्रेजो की तरह भ्रष्टाचारियो को काटकर भारत माता को बलि चड़ा दे | तभी भारत माता भ्रष्टाचारियो की गुलामी से आजाद हो सकती है| या…………
    भारत सरकार यदि इमानदारी से भरष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण करना चाहती है तो देश से भ्रष्टाचार मिटाने का काम मुझे ठेके पर दे दे जैसे सारे सरकारी काम केंद्र और राज्य सरकारों ने ठेके पर दे रखे (जिनसे देश के भ्रष्ट नेताओं,मंत्रियो,संतरियो,अधिकारिओ,कर्मचारियो और काला बाजारी अमीरों को भरपूर कमीशन मिलता है | सरे हरराम्खोर ऐश कर रहे है और गरीब जनता भूखो मर रही है |) मै ६३ वर्षो के भ्रष्टाचार की कमाई को मात्र ७ वर्षो में वसूल करके सरकारी खजाने में जमा कर दूंगा और भ्रष्टाचार को जड़ मूल से उखाड़ फेकुंगा , मेरी भ्रष्टाचार निवारण की प्रक्रिया के बाद कोई भी नेता,मंत्री,संत्री,अधिकारी,कर्मचारी और कालाबजारी भ्रष्ट होने से पहले हजार बार सोचेगा |
    मुझे कुल वसूली का मात्र 0.०७% मेहनताना ही चाहिए |
    मई पिछले २५ वर्षो से देश के भ्रष्ट कर्णधारों को लिखता आ रहा हु की मुझे भ्रष्टाचार मुक्त भारत का काम ठेके पर दे दो ,मै ६३ वर्षो के भ्रष्टाचार की कमाई को मात्र ७ वर्षो में वसूल करके सरकारी खजाने में जमा कर दूंगा और भ्रष्टाचार को जड़ मूल से उखाड़ फेकुंगा| मेरे पत्रों को पड़कर देश के भ्रष्ट कर्णधारों को सांप सूंघ जाता है |
    “भ्रष्टाचार सामाजिक अन्याय का जन्म दाता है और सामाजिक अन्याय उग्रवाद और आतंकवाद का जन्म दाता है”
    मात्र-ज़न-लोकपाल विधेयक से ’भ्रष्टाचारमुक्त भारत’ क्या सम्भव है?
    नहीं क्योकि……………
    रामदेव Vs अण्णा = “भगवा” Vs “गाँधीटोपी सेकुलरिज़्म”?? इसतरह का हिसाब है लोक तंत्र के चौथे खम्बे का जबकि इस खम्बे पर भी देश की जनता को विश्वास नहीं रहा इस पर भी भ्रष्टाचार की लगी जंग जनता को स्पष्ट दिखाई दे रही है |जँहा तक सेकुलरिज़्म का सवाल है उसका गणित आम जनता की समझ से बाहर hai ……………..

    भ्रष्ट नेता+ भ्रष्ट मंत्री + भ्रष्ट संत्री + भ्रष्ट अधिकारी + भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी +असामाजिक तत्त्व +आतंकवादी + पाशचात्य संस्कृति =”सेकुलरिज़्म”
    सेकुलरिज़्म के पाँच मुख्या गुण है …..१-चोरी २-चुगली ३-कलाली ४-दलाली ५-छिनाली
    वर्तमान में स्वयं को देश के कर्णधार समझाने वाले नेता इन पांचो गुणों से संपन्न है….. महेश चन्द्र वर्मा , प्रधान सम्पादक,
    सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार ,
    साप्ताहिक समाचार पत्र, इंदौर म.प्र.

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