आज़ादी : एक शब्द कितने मायने ! 

देवेंद्रराज सुथार

आज़ादी की कीमत पिंजरे में कैद तोता ही जान सकता है। जिसके पंख फड़फड़ाकर स्वर्ण सलाखों से टकरा रहे हैं। जिसकी आत्मा कैद की गुलामी से आज़ाद होने के लिए तड़प रही है। चीत्कार और पुकार के बीच संघर्ष करता यह तोता उन तमाम लोगों का प्रतीक है, जिनको 15 अगस्त, 1947 से पहले अंग्रेज सरकार अपने तलवे चाटने को विवश कर रही थी। भारतीयों को दास की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था। इज़्ज़त को चाबुक की मार से तार-तार किया जा रहा था। बहिन-बेटियों के देह के साथ खेला जा रहा था। नन्हे-मुन्ने बच्चों को अंग्रेजों के घरों में काम करने के लिए ठेला जा रहा था। इंसानियत को पेला जा रहा था। अनावश्यक कर और लगान की मार किसानों की कमर तोड़ रही थी। चहुंदिशा क्रूरता और नरसंहार के इस खेल को देख थरथरा रही थी। अब अंतर-मन से आवाज़ आ रही थी कि आख़िर कब तक गुलामी में हाथ सैल्यूट ठोकते रहेंगे। कब तक अंग्रेजों के हुक्म को अपने ही ज़मीन पर झेलते रहेंगे। आत्मा की पीड़ा और लाखों भारतीयों की हुंकारों ने आगाज किया इंकलाब की लड़ाई का और टूट पड़े असंख्य पुरोधा स्वतंत्रता के समर में देश को गुलामी की ज़ंजीरों से मुक्त कराने के लिए और गूंजने लगा यह स्वर- 

ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम,
तेरी राहों मैं जां तक लुटा जायेंगे,
फूल क्या चीज़ है तेरे कदमों पे हम,
भेंट अपने सरों की चढ़ा जायेंगे।

इस समर में कई घरों के इकलौते चिराग़ आज़ादी की बलिवेदी पर निसार हो गये। मां की कोख से जन्मे रत्न मातृभूमि की दुर्दशा को देख आज़ादी की जंग का लौहा लेते हुए मिट्टी में सदा के लिए विलीन गये। और जाते समय भी जिनकी जिह्वा पर अंग्रेजी क्रूरता के लिए ये शब्द आये-

इतिहास न तुमको माफ़ करेगा याद रहे,
पीढ़ियां तुम्हारी करनी पर पछताएगी !
बांध बांधने से पहले जल सूख गया तो,
धरती की छाती पर दरार पड़ जाएगी !

रक्तरंजित भूमि और असंख्यक क्रांति दीपों का आज़ादी की महाज्वाला प्रज्ज्वलन के लिए समर्पण देश को एक नई राह की ओर ले गया।

अब आज़ादी हर आंगन में नन्ही-सी हंसी बनकर थिरक रही थी। तिरंगे को नभ में चल रही हवाओं के साथ लहराते देख आंखें चमक रही थी। दलित-वंचित-पीड़ित-शोषित के मायूस चेहरे पर आशा की किरणें आगाज कर रही थी कि अब हर घर में खुशहाली होगी, बच्चों के मुख पर लाली होगी और खेतों में हरियाली होगी। लोकतंत्र की नींव रखने के साथ ही देश का पहला प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को चुना गया। सरदार वल्लभ भाई पटेल के अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप रियासतों का एकीकरण हुआ और डॉ. भीमराव अंबडेकर के प्रयासों ने देश का संविधान अल्प समय में तैयार कर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। बच्चों की शिक्षा के लिए शिक्षा मंत्री बनाया गया और हर गांव में पाठशालाएं खोलने के लिए स्वीकृति प्रस्ताव पारित किये गये। थोड़े समय के लिए सब कुछ सही चलता रहा। यह सब परतंत्रता की बेड़ियों से पड़े जिस्म पर घावों के लिए मरहम की तरह था। कहे तो बिलकुल जन्मों के प्यासे के लिए पानी को प्राप्त करने और भूख से व्याकुल भूखे के लिए भोजन प्राप्त करने के समतुल्य ही था।

लेकिन, आज़ादी के कुछ सालों बाद ही देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चयनित हुए जनप्रतिनिधियों की मानसिकता देशहित न रहकर स्वहित होने लगी। वस्तुतः राजनेताओं की विकृत मानसिकता और स्वछंद रवैये ने अय्याशी की समस्त सीमाएं तोड़ दी। पहले गोरे कालों को लूट रहे थे, तो अब काले ही कालों को लूटने पर तुलने लगे। विकास को परिभाषित करने के लिए जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के साथ ही अलमारी में फाइलों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन, ”जन” और ”कल्याण” धरती और आकाश की तरह कल्पनालोक में मिलते दिखे। जिन रचनाधर्मियों और कवियों ने जेल की दीवारों पर नाखूनों से ”वंदेमातरम” लिखकर आज़ादी की इबारत लिखीं थी। जिनकी पीठ पर पड़े कोड़ों की मार से निकले फोड़ों के फूटने पर आये लहू के कतरे-कतरे की यह पुकार थीं-

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

लेकिन, लोकतंत्र की गति ने आज़ादी के बाद देश की आज़ादी के पूर्व रही जस की तस विसंगतियों से भांपकर यह लिखने पर भी विवश किया-

काजू भुने हैं प्लेट में,
व्हिस्की गिलास में।
उतरा है रामराज,
विधायक निवास में।

इससे बड़ी विडंबना ओर क्या होगी कि लाठी के दम पर आज़ादी की मशाल जलाने वाले गांधी को गाली की संज्ञा देकर गोड़से को आराध्य मानकर मंदिर बनवाने की बात होने लगी। देश के नवयुवक और नवयुवतियों की दिशा पश्चिमीकरण ने पूर्णतयः भ्रमित कर दी। सरकारी कार्यालयों में लगी भ्रष्टाचार की दीमक ने अफ़सरों के ईमान को नोंच डाला। बेरोज़गारी ने नौकरियों और उच्च शिक्षा के प्रति आमजन का मोहभंग कर दिया। रोज़ नये-नये घोटालों और कांड ने जनप्रतिनिधियों की पोल खोलकर रख दी। वस्तुतः ऐसी आज़ादी की कल्पना गांधी के मस्तिष्क की उपज कभी नहीं रही होगी कि जिस देश में स्कूलों से ज़्यादा शराब के ठेके नज़र आते हो और नर की खान नारी कोठे पर जिस्म का सौदा करने के लिए मजबूर हो। जहां पैसों वालों के लिए कानून रखैल हो और गरीबों के लिए केवल जेल हो। जहां फुटपाथों पर मासूमों का बसेरा हो और अमीरों की गाड़ियों का पहिया जिनकी मौत बनता हो। तब जाकर लगता है आज़ादी को केवल एक ही वर्ग तक सीमित रखा गया। बस, उनके लिए ही अच्छे दिन और हर रात चांदनी है ! बाकि गरीबों की आंखों में तो आज भी पानी है।

खैर ! देश की समस्याओं का रोना हम सात दशक से रोते आ रहे हैं। इस बात से जरा भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश में प्रोब्लम नहीं है। लेकिन, सवाल उठता है कि क्या हम हर पन्द्रह अगस्त को यूं ही समस्याओं का जिक्र करते रहेंगे या फिर खुद भी देश के लिए कुछ करने के लिए खड़े होंगे। दरअसल, आज़ादी की भौतिकता तक सीमित न रहकर सोच और मन से आज़ाद होने की ज़रूरत है। आज़ादी का मतलब केवल अधिकारों की मांग के नाम पर उग्र प्रदर्शन करना भर नहीं है, बल्कि कर्तव्यों के प्रति भी सकारात्मक भूमिका निभाना है। नेताओं को कोसना ही नहीं है, बल्कि सही और ईमानदार व्यक्ति का सक्रिय मतदाता बनकर चुनाव करना भी है। क्या हमने कभी सोचा है कि आज देश का करोड़ों रुपया ”नमामि गंगे” और ”स्वच्छ भारत” अभियान पर ख़र्च क्यों करना पड़ रहा है? किसके कारण यह सब हो रहा है? आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ सीमा पर खड़े होकर गोली खाना ही नहीं है, बल्कि अपने स्तर पर छोटे-छोटे बदलाव करना भी है।

आईये ! इस स्वतंत्रता दिवस पर यह संकल्प लें कि हम इस वतन को घर की तरह मानकर इसके लिए सदैव तत्पर रहेंगे। चलते-चलते,

अंधा बेटा युद्ध पे चला तो ना जा,
न जा उसकी मां बोली,
वो बोला कम कर सकता हूं मैं भी
दुश्मन की एक गोली,
जिक्र शहीदों का हो तो
क्यों उनमें मेरा नाम न आये,
देखो वीर जवानों
खून पे ये इल्ज़ाम न आए !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,123 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress