-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

अनेक राष्ट्रीय और प्रतिष्ठित कहलाने वाले समाचार-पत्रों में तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया में पैड न्यूज (धन देकर मनचाही खबर छपवाने या प्रसारित करवाने) की गूंज सुनाई देती रही है। मीडिया के तथाकथित बडे-बडे पत्रकार ऐसे-ऐसे हथकण्डों में लिप्त पाये जा रहे हैं, जिनकी किसी पत्रकार से सपने में भी आशा नहीं की जा सकती! इसके अलावा टीआरपी बढाने के नाम पर इलेक्ट्रोनिक चैनलों ने सारे स्थापित प्रतिमानों को ध्वस्त कर दिया है। यही नहीं आजकल मीडिया के बडे-बडे नामों साथ कुछ ऐसे लोग भी पत्रकार बनकर जुड गये हैं, जिनका काम ही अपनी स्थिति का मनमाना प्रयोग करना है।

इन लोगों के कारण सत्ताधारी लोगों को और नौकरशाहों को अपनी मनमानी करने में व्यवधान हो रहा है। ऐसे में इन लोगों की काली कारगुजारियों के नाम पर देश के सम्पूर्ण मीडिया पर लगाम लगाने के लिये सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने मीडिया पर प्रत्यक्ष या परोक्ष नियन्त्रण लगाने के लिये 12 मई, 2010 को एक कमेटी गठित करने का एलान किया है। फिक्की के सेक्रेटरी जनरल अमित मित्रा की अध्यक्षता में यह कमेटी गठित की गयी है। इसमें पत्रकारों को भी उनकी औकात दिखादी है और उन्हें नाम मात्र का प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है। केवल एक नीरजा चौधरी को इसमें शामिल किया गया है, जबकि इस कमेटी में अन्य सभी कमेटियों की भांति वर्तमान या सेवानिवृत्त ब्यूरोक्रेट्‌स को जगह दी गयी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव के अलावा सेवानिवृत ब्यूरोक्रेट डीएस माथुर को भी रखा गया है। अहमदाबाद के एक डायरेक्टर को भी इसमें जगह दी गयी हैं।

उक्त कमेटी में नामित ब्यूरोक्रेट्‌स पत्रकारों एवं मीडिया पर कतरने के लिये टीआरपी की विकृतियों को रोकने के बहाने चिन्तन करेंगे और तीन महीने के अन्दर-अन्दर अपनी रिपोर्ट सरकार को देंगे। इससे पहली नजर में यह बात स्वतः प्रमाणित हो चुकी है कि अब तक सरकार को चलाने वाले आईएएस अब मीडिया को हांकने (डण्डे के बल पर जानवर को चलने को विवश करने को हांकना कहते हैं) का प्रयास कर रहे हैं। जिसको लेकर मीडिया जगत में विरोध की आवाज उठना स्वाभाविक है। फिर भी तथाकथित बडे-बडे मीडिया घराने इस मामले में आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साध लें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

यह बात सही है कि मीडिया को नियन्त्रित करना आज के राजनेता एवं प्रशासनिक लोगों (आईएएस) की उच्चतम प्राथमिकता में शामिल है, लेकिन क्या यह बात बताने की जरूरत है कि प्रशासनिक अफसरों की भांति प्रिंट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोगों ने भी अपना-अपना रोब-दाब दिखाना शुरू कर दिया है। ऐसे मीडियाकर्मी भी जिसकी चाहे, जब चाहें चड्डी उतारने से नहीं चूकते हैं। जिस प्रकार लोग पुलिस से डरते हैं, उसी प्रकार से आजकल लोग मीडिया के लोगों से भी डरने लगे हैं और मीडिया को खुश रखने के लिये वाकायदा नीतियाँ बनाई जाने लगी हैं। मीडिया दूसरों पर बेशक कीचड उछालता है, लेकिन मीडिया में हर प्रकार का भ्रष्टाचार एवं व्यभिचार गहराई तक व्याप्त है। मीडिया के लोग जहाँ एक ओर लोगों को ब्लेक मेल करते हैं, वहीं दूसरी ओर मुसीबत में फंसे लोगों से रिश्वत प्राप्त करके उनके विरुद्ध खबरों को दबा भी देते हैं। अन्यथा उछालने में भी पीछे नहीं रहते।

मैं इस मामले में राजस्थान की राजधानी जयपुर सहित राज्य के प्रमुख शहरों का दस्तावेजी साक्ष्यों से प्रमाणित उदाहरण पेश करना चाहूँगा। कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति यहाँ के दोनों लीडिंग दैनिकों में खबर उठा कर देख सकता है। जब भी राजस्थान के किसी भी शहर में किसी जौहरी के यहाँ छापा पडता है या किसी जौहरी द्वारा अधोषित आय उजागर की जाती है तो हमेशा इन दैनिकों में लिखा जाता है कि एक जौहरी के यहाँ पर छापे के दौरान इतनी अघोषित आय उजागर हुई। जौहरी का नाम कभी भी उजागर नहीं किया जाता है। इस प्रकार की खबरें प्रकाशित करने से यह बात सहज ही समझी जा सकती है कि मीडिया यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति के नाम को उजागर होने से रोक रहा है तो इसके पीछे कोई तो कारण होगा ही! अकारण तो ऐसा नहीं किया जाता होगा?

केवल इतना ही नहीं, बल्कि ऐसे अपराधियों के नाम उजागर नहीं करके मीडिया, पाठकों के मीडिया के माध्यम से हर सार्वजनिक एवं गुप्त या अपराधिक बातों को तथ्यात्मक जानकारी पाने के संवैधानिक मूल अधिकार का भी हनन करता है। ऐसे भ्रष्ट एवं पक्षपाती मीडिया को राजनैताओं के साथ मिलकर नौकरशाहों द्वारा नियन्त्रित करने का कानूनी प्रयास किया जाना कोई एक दिन की घटना नहीं है। इसकी आधारशिला तो स्वयं भ्रष्ट मीडियाकर्मियों द्वारा अपने चरित्र को गिराकर बहुत पहले ही रखी जा चुकी है।

इसके अलावा मीडिया द्वारा नौकरशाहों को राजा-महाराजाओं की भांति कवरेज देना भी तो मीडिया का ही अतिउत्साही काम है। जिससे आईएएस लॉबी की ताकत तेजी से बढी है। मीडिया ने आईएएस को उसी प्रकार से पालापोसा है, जिस प्रकार से भिण्डरवाले को पालापोसा गया था। सब जानते हैं कि भिण्डरवाले को पालने की कीमत क्या चुकानी पडी थी। अब मीडिया को भी अफसरशाही को पलक-पांवडों पर बिठाने की कीमत तो चुकानी ही पडेगी। जिस प्रकार से साँप को कितना ही दूध पिलाओ वो काटता ही है। उसी प्रकार से अफसरशाही कभी भी किसी की नहीं हो सकती है। मीडिया के कुछ स्वार्थी लोगों द्वारा जो अनैतिक-अपराध किया गया है, उसकी कीमत हर सच्चे एवं समर्पित मीडियाकर्मी को चुकानी पड सकती है!

यहाँ एक बात और समझने वाली है, वो यह कि मीडिया के विरुद्ध कितना भी कठोर नियन्त्रणकारी नियम या कानून बन जाये, मीडिया के स्वामियों की सेहत पर तो कोई फर्क पडने वाला है नहीं, क्योंकि मीडिया उनके लिये-पत्रकारिता धर्म-तो है नहीं। अब तो सभी जानते हैं कि-मीडिया उद्योग-बन चुका है और उद्योग को चलाने के लिये अफसरशाही एवं राजनेताओं को खुश करना पहली प्राथमिकता है। समस्या केवल उन संवेदनशील लेखकों, विचारकों, पत्रकारों और चिन्तकों को आने वाली है, जो वास्तव में आज भी अपने-पत्रकारिता धर्म-से जुडे हुए हैं। लेकिन मीडिया के क्षेत्र में ऐसे लोगों का कोई वजूद है या नहीं? इस बात का चिन्तन भी ऐसे ही लोगों को करना होगा, क्योंकि प्रशासन एवं मीडिया उद्योग की नजर में तो ऐसे लोगों का कोई वजूद है नहीं!

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