राजेश जैन
दक्षिण एशिया की राजनीति में भारत और नेपाल का रिश्ता सबसे अनोखा, जटिल और सबसे भावनात्मक रिश्तों में से एक माना जाता है। दुनिया में बहुत कम ऐसे पड़ोसी देश हैं जिनके बीच सीमाएं भी खुली हों और समाज भी इतने गहरे स्तर पर जुड़े हों। भारत और नेपाल का संबंध केवल दो सरकारों का संबंध नहीं है; यह सदियों से साझा संस्कृति, धर्म, भाषा, व्यापार, परंपराओं और मानवीय रिश्तों का जीवंत उदाहरण रहा है लेकिन यही रिश्ता समय-समय पर अविश्वास, राष्ट्रवाद, सीमा विवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की वजह से तनावपूर्ण भी हो जाता है।
हाल के दिनों में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक बयान ने फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भारत-नेपाल संबंध बार-बार सीमा विवाद और राजनीतिक असहजता के मोड़ पर क्यों पहुंच जाते हैं। बालेन शाह ने नेपाली संसद में कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाली भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया बल्कि नेपाल ने भी कुछ भारतीय इलाकों पर कब्जा कर रखा है। बयान के बाद नेपाल की संसद में हंगामा मच गया। विपक्ष ने उनसे सबूत मांगे, विदेश मंत्रालय को सफाई जारी करनी पड़ी और सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई। पहली नजर में यह एक सामान्य राजनीतिक बयान लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह उस गहरे बदलाव का संकेत है जो पिछले कुछ वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में दिखाई दे रहा है। यह केवल सीमा विवाद का मामला नहीं है। इसके पीछे राष्ट्रवाद, भू-राजनीति, चीन की बढ़ती भूमिका, नेपाल की नई राजनीतिक सोच और भारत की पारंपरिक पड़ोसी नीति से जुड़ी कई परतें मौजूद हैं।
रोटी-बेटी का रिश्ता: इतिहास से वर्तमान तक
भारत और नेपाल का रिश्ता आधुनिक सीमाओं से कहीं पुराना है। हिमालय से गंगा के मैदान तक फैली सांस्कृतिक धारा ने दोनों देशों को हजारों वर्षों से जोड़े रखा है। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर और भारत की काशी के बीच धार्मिक संबंध हों या जनकपुर और अयोध्या का सांस्कृतिक जुड़ाव-दोनों देशों ने हमेशा एक-दूसरे को प्रभावित किया है। नेपाल के लाखों नागरिक भारत में शिक्षा प्राप्त करते हैं, रोजगार करते हैं और व्यापार से जुड़े हैं। भारतीय शहरों में नेपाली समुदाय सहज रूप से घुला-मिला दिखाई देता है। भारत की सेना में गोरखा रेजिमेंट का गौरवपूर्ण इतिहास दोनों देशों के भरोसे और साझेदारी का प्रतीक रहा है। खुली सीमा ने इस रिश्ते को और विशेष बनाया है। दुनिया के अधिकांश देशों के विपरीत भारत और नेपाल के नागरिक बिना वीजा और पासपोर्ट के एक-दूसरे के यहां आ-जा सकते हैं। यही वजह है कि भारत-नेपाल संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक संबंध भी हैं। राजनीतिक तनाव पैदा हो सकते हैं लेकिन जनता के स्तर पर अपनापन अक्सर बना रहता है।
1950 की संधि
भारत-नेपाल संबंधों की आधुनिक संरचना काफी हद तक 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि पर आधारित है। इस संधि का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग, व्यापार और नागरिक आवाजाही को आसान बनाना था। उस समय चीन में कम्युनिस्ट क्रांति और हिमालयी क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति को देखते हुए भारत नेपाल को अपनी सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता था। इस संधि ने नेपाल को भारत के साथ विशेष आर्थिक और सुरक्षा संबंध दिए। व्यापार, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़े। लेकिन समय के साथ नेपाल में यह धारणा मजबूत होने लगी कि यह संधि बराबरी के आधार पर नहीं बनी थी। नेपाल के कई राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी इसे “असमान संधि” बताते रहे हैं। भारत इस संधि को सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग के लिए महत्वपूर्ण मानता है, जबकि नेपाल इसे अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति से जोड़कर देखता है। यही कारण है कि संधि की पुनर्समीक्षा की मांग समय-समय पर उठती रहती है।
सीमा विवाद: नक्शों से ज्यादा भावनाओं की लड़ाई
भारत और नेपाल के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दा सीमा विवाद का है। कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और सुस्ता जैसे क्षेत्रों को लेकर दोनों देशों के दावे अलग-अलग हैं। नेपाल का कहना है कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार महाकाली नदी के उद्गम के आधार पर सीमा तय होनी चाहिए, जबकि भारत बाद के प्रशासनिक नियंत्रण और पुराने नक्शों का हवाला देता है।
यह विवाद 2020 में सबसे ज्यादा उभरा, जब भारत ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया। इसके जवाब में नेपाल ने संविधान संशोधन कर नया नक्शा पारित किया, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया। नेपाल में इसे राष्ट्रीय अस्मिता का मुद्दा बना दिया गया। सड़कों पर प्रदर्शन हुए और भारत विरोधी भावना तेज हो गई।
भारत इन क्षेत्रों को अपनी रणनीतिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानता है क्योंकि ये चीन सीमा के बेहद करीब स्थित हैं। मानसरोवर यात्रा और सीमा व्यापार के लिहाज से भी लिपुलेख का विशेष महत्व है। दूसरी ओर नेपाल इसे अपनी संप्रभुता का प्रश्न मानता है। बालेन शाह का हालिया बयान भी इसी राजनीतिक वातावरण की उपज माना जा रहा है। उन्होंने ब्रिटेन की संभावित भूमिका का जिक्र कर नया विवाद खड़ा कर दिया। भारत हमेशा सीमा विवादों को द्विपक्षीय तरीके से सुलझाने की नीति पर कायम रहा है, इसलिए नेपाल की ओर से तीसरे पक्ष का संकेत नई दिल्ली के लिए असहज करने वाला था।
चीन फैक्टर: बदलती भू-राजनीति का केंद्र
भारत-नेपाल संबंधों को अब चीन के बिना समझना संभव नहीं है। पिछले एक दशक में चीन ने नेपाल में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ाया है। सड़क, रेल, हाइड्रोपावर और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में चीन का निवेश लगातार बढ़ रहा है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत नेपाल को चीन एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है। वह चीन के साथ आर्थिक और राजनीतिक संबंध बढ़ाकर भारत के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। नेपाल की राजनीति में भी चीन की भूमिका पहले से कहीं अधिक सक्रिय दिखाई देती है।
भारत के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। नई दिल्ली हमेशा नेपाल को अपनी उत्तरी सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा मानती रही है। खुली सीमा और हिमालयी भूगोल के कारण भारत नहीं चाहता कि कोई बाहरी शक्ति नेपाल में अत्यधिक प्रभाव स्थापित करे।
हालांकि नेपाल के सामने एक व्यावहारिक सच्चाई भी है। उसका अधिकांश व्यापार भारत से होता है। पेट्रोलियम, खाद्यान्न, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरतों का बड़ा हिस्सा भारत से आता है। लाखों नेपाली भारत में काम करते हैं। ऐसे में चीन प्रभाव बढ़ा सकता है, लेकिन भारत की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता।
2015 की नाकेबंदी
भारत-नेपाल संबंधों में 2015 का वर्ष एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। नेपाल ने नया संविधान लागू किया, जिसका मधेशी समुदाय ने विरोध किया। मधेश आंदोलन के दौरान भारत-नेपाल सीमा पर आपूर्ति बाधित हो गई। नेपाल में यह धारणा बनी कि भारत ने “अनौपचारिक नाकेबंदी” की है।
हालांकि भारत ने हमेशा कहा कि यह समस्या सीमा पर चल रहे आंदोलन की वजह से थी लेकिन नेपाल में भारत विरोधी भावना तेजी से बढ़ी। नेपाली राजनीति में यह मुद्दा आज भी बेहद संवेदनशील है। कई नेपाली इसे भारत की “हस्तक्षेपकारी नीति” का उदाहरण मानते हैं।
इस घटना ने नेपाल की जनता और राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से में यह भावना पैदा की कि भारत नेपाल पर दबाव बनाने के लिए अपनी आर्थिक निर्भरता का उपयोग कर सकता है। यही वह दौर था जब चीन ने नेपाल में अपनी सक्रियता और बढ़ा दी।
आर्थिक रिश्ते: तनाव के बीच भी मजबूत साझेदारी
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक स्तर पर भारत और नेपाल की साझेदारी लगातार मजबूत बनी हुई है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। नेपाल के आयात का बड़ा हिस्सा भारत से आता है। भारतीय कंपनियां नेपाल में बैंकिंग, दूरसंचार, शिक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश कर रही हैं।
हाल के वर्षों में बिजली व्यापार और हाइड्रोपावर सहयोग दोनों देशों के संबंधों का नया सकारात्मक आयाम बनकर उभरा है। नेपाल जलविद्युत उत्पादन की अपार क्षमता रखता है। भारत नेपाली बिजली खरीदने में रुचि दिखा रहा है। इससे नेपाल की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।
डिजिटल कनेक्टिविटी के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ रहा है। यूपीआई आधारित भुगतान प्रणाली और सीमा पार डिजिटल लेनदेन दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को आधुनिक रूप दे रहे हैं। यह दिखाता है कि राजनीतिक तनाव के बावजूद व्यावहारिक सहयोग जारी है।
जल संसाधन और सुरक्षा की राजनीति
नेपाल को दक्षिण एशिया का “वाटर टावर” कहा जाता है। कोसी, गंडक और महाकाली जैसी नदियां दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन जल संसाधनों को लेकर सहयोग के साथ-साथ विवाद भी रहे हैं।
नेपाल में अक्सर यह शिकायत उठती रही है कि भारत को जल परियोजनाओं से ज्यादा लाभ मिला, जबकि नेपाल को अपेक्षित फायदा नहीं मिला। बाढ़ नियंत्रण, बांध निर्माण और जल प्रबंधन को लेकर भी मतभेद सामने आते रहे हैं। फिर भी जलविद्युत और ऊर्जा सहयोग भविष्य के रिश्तों का सबसे सकारात्मक आयाम बन सकता है।
दूसरी ओर सुरक्षा चुनौतियां भी कम नहीं हैं। खुली सीमा अवसर भी देती है और जोखिम भी पैदा करती है। नकली मुद्रा, तस्करी, मानव तस्करी और आतंकवादी गतिविधियों के लिए सीमा के दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है। दोनों देशों के बीच खुफिया सहयोग और सुरक्षा समन्वय लंबे समय से चलता रहा है लेकिन राजनीतिक अविश्वास कई बार इस सहयोग को प्रभावित करता है।
जनता बनाम राजनीति
भारत-नेपाल संबंधों की सबसे दिलचस्प बात यह है कि सरकारों के बीच तनाव बढ़ सकता है, लेकिन जनता के रिश्ते अक्सर सामान्य बने रहते हैं। नेपाल के लाखों नागरिक भारत में रहते और काम करते हैं। हजारों नेपाली छात्र भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं। दोनों देशों के बीच अंतरविवाह आम बात है।
भारत के धार्मिक शहरों में नेपाली श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं, जबकि नेपाल के मंदिर भारतीय पर्यटकों से भरे रहते हैं। दोनों देशों की भाषाएं, खान-पान, संगीत और सामाजिक जीवन में इतनी समानताएं हैं कि राजनीतिक तनाव भी इन्हें पूरी तरह अलग नहीं कर पाता।
यही मानवीय रिश्ता दोनों देशों के संबंधों की सबसे बड़ी ताकत है। यही कारण है कि तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत और नेपाल कभी पूरी तरह दूर नहीं हो पाते।
भविष्य की राह
भारत और नेपाल दोनों को यह समझना होगा कि 21वीं सदी की राजनीति केवल ऐतिहासिक निकटता के भरोसे नहीं चल सकती। नेपाल बराबरी और सम्मान चाहता है। भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता। चीन इस पूरे समीकरण में अपनी जगह मजबूत करना चाहता है।
ऐसे में दोनों देशों को संवाद और विश्वास आधारित संबंधों की नई संरचना विकसित करनी होगी। 1950 की संधि की पुनर्समीक्षा पर खुली बातचीत हो सकती है। सीमा विवादों के समाधान के लिए स्थायी तंत्र बनाया जा सकता है। शिक्षा, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा और युवा सहयोग को नई प्राथमिकता दी जा सकती है।
भारत को नेपाल के साथ “बड़े भाई” की बजाय “साझेदार” की तरह व्यवहार करना होगा। वहीं नेपाल को भी यह समझना होगा कि भावनात्मक राष्ट्रवाद और संतुलन की राजनीति के बीच व्यावहारिक कूटनीति जरूरी है।
राजेश जैन