गाँधी जैसा कहीं दिखता है क्या?

अश्वनी कुमार

सुबह-सुबह जब मैं उठा तो फेसबुक से लेकर तमाम न्यूज़ चैनलों में गांधी की सत्य और अहिंसा का महिमामंडन किया जा रहा था। देशभक्ति गीतों के बीच बापू को याद करने राष्ट्रपति राजघाट में मौजूद थे। न्यूज़ वाले बता रहे थे की आज 2 अक्टूबर को सारे देश में माँस और शराब की बिक्री बंद है, सारे स्कूल-कॉलेज दफ्तरों में भी छुट्टियां है। लेकिन शायद वे ये बताना भूल गये की कल से फिर वे सभी माँस की दुकानें खुल जायेँगी, फिर रोजाना असंख्यक जीवों की हत्या की जायेगी। फिर से वे सारे शराब सरकारी बोतलों का ठप्पा लगाकर खुले बाज़ार में बेचीं जायेगी की आइये इसे पीकर अपना स्वास्थ-जीवन और परिवार तीनों का बड़ा गर्क कीजिये! सरकारी दफ्तर यानी तरक्की में बाधक! बिलकुल, साल के 365 दिनों में जिस देश में 200 दिन छुट्टियां ही होती है वहां भी बापू के प्रति अपनी दिखावटी सम्मान के लिए एक और छुट्टी देकर देश को एक दिन और पीछे ढकेल दिया जाता है। क्या बापू की विचारधारा यही थी की मेरे कारण मेरे देश का वक्त बर्बाद हो? उनके नाम का इस्तेमाल निजी स्वार्थ के लिए हो?

नोटों पर गाँधी की फोटो लगा देने से, अदालतों और दफ्तरों में बापू की तस्वीर टांग देने से या चौक-चौराहों पर धूल फाँकती मूर्ति बना देने से हमें क्या हासिल हुआ? बापू युग के बाद 1948 से लेकर अबतक क्या हमने गरीबों की अंतिम पंक्ति तक बुनियादी सुविधा भी मुहैया करा पाये हैं? जिनके सर पर छत नहीं, खाने को रोटी नहीं, पहनने को कपडे नहीं वैसा व्यक्ति पानी को भी तरसता है सुविधाएँ तो दूर की बात है। सत्य और अहिंसा के बारे में गाँधी कहते थे की ये ऐसा ताप है जो लोहे को भी पिघला दे। लेकिन अगर आज गाँधी होते तो उन्हें अपने कहे पर पछताना पड़ता क्योकि अहिंसा-अनशन-शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को लाठियों से कुचल दिया जाता है, सत्ता की गर्मी से उसे ही पिघला किया जाता है। अहिंसक भीड़ को हिंसक बंनाने पर मजबूर किया जाता है। इन प्रदर्शन कर रहे लोगों की यही गलती होती है की वे अपना हक़ माँगते हैं, रहने को छत माँगते हैं, खाने को रोटी मांगते हैं। बापू, आपको अपने ऊपर आजादी दिलाने का गर्व होता होगा तो वो आपकी गलतफहमी होगी, क्योकि ये सारे लोग जो हम पर राज कर रहे हैं ये बाहर से तो दिखने में भारतीय हैं लेकिन अंदर से एकदम अंग्रेज़! लोकतंत्र के नाम पर गरीबी का आंकड़ों के सहारे गला घोंटते पिछले 68 सालों से हमपर राज कर रहें हैं और इनके ही वंशज आगे करते भी रहेंगे इसमें कोई शक नहीं।

अहिंसा की परिभाषा मुझे तनिक भी समझ नहीं आती! गाँधी कहते थे की अगर कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर दो। पर मैं पूछता हूँ की दूसरे गाल पर भी थप्पड़ जड़ दे तो तीसरा कहाँ से लाएंगे? आज तो हालात ये हैं की एक गाल पर थप्पड़ लगाने वालों को हाथ-पैर तोड़कर उसे दुनिया से ही उठा दिया जाता है। गाँधी जयन्ती के दिन समूचा विश्व अंतराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मना रहा होता है। लेकिन कहीं से टेलीस्कोप लगाकर देखो तो की कहीं गाँधी जैसा दिखता है क्या? शांति का संदेश देनेवाले बुद्ध की धरती पर बुद्ध जैसा दिखता है क्या? नहीं! यूँ बड़े-बड़े परमाणु बमों से लैस मिसाइल, बम दागने को तैयार रॉकेट, तोपों से सजी दस गावों के बराबर युद्धपोत, जो दुनिया को मिनटों में नक्शों से मिटाने की क्षमता रखता है। बापू की धरती भारत, जहाँ सरकार के मुताबिक 40 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी दैनिक क्रय शक्ति 10 रु के आसपास है। जिस भारत में 40 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं वह भी तब जब सीमारेखा का मतलब ग्रामीण क्षेत्रों में 28रु व शहरी क्षेत्रों में 32 रु रोजाना कमाने की है। जिस देश में प्रतिदिन एक हज़ार लोग टीबी से मर जाते हैं, उस देश का स्वस्थ्य बजट 5 या 6 फीसदी होता है, जबकि रक्षा बजट 20 फीसदी के आसपास। यानी जो पैसा शिक्षा, चिकित्सा, रोजी-रोटी पर खर्च होना चाहिए वो पैसा हथियारों पर खर्च हो रहा है। एक सुखोई विमान की कीमत से भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 700 स्कूल या अस्पताल बन सकते हैं, एक पोतवाहक जहाज की कीमत से 3 हज़ार किलोमीटर रेलवे लाइन बिछ सकती है या एक हज़ार स्कूल खोले जा सकते हैं परन्तु विकास के लिए पैसे का अभाव हैं और विनाश के लिए पैसे का बहाव है। यही है गाँधी को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि! भीम राव अंबेडकर और आज की सरकारों के लिए हिंसा का मतलब भले ही मारपीट-खून खराबे का रहा हो पर, हम देशवासियों के लिए तो गरीबों का नीतिगत शोषण-उनका हक़ छीनना भी हिंसा है और गरीबों के ऊपर लालफीताशाही या न्याय न मिलना तो जीते जी मारे दिए जाने के सामान है। सत्य, अहिंसा नाम का इस्तेमान असत्य और हिंसा के लिए ही होने लगा है।

मैं थूकता हूँ इन नेताओं के चेहरे पर और पूछता हूँ “जिन गरीबों के हक़ के पैसे से तुम एयरकंडीशन बंगले में रहते हो, बड़ी लक्जरी गाड़ियों में चलते हो, शोषण करते हो, लोकतंत्र का गला घोटते हो, समाज को बांटते हो, उनके बीच दीवारें उठाते हो ऐसे में बापू का सत्य और अहिंसा के नाम पर आज उनकी पूजा करने का तुम्हे क्या अधिकार है?……

1 COMMENT

  1. सही चीर फाड़ की है लेखक श्री अश्विनी कुमार ने – लेकिन यह नककर खाने में तूती की आवाज़ जैसा है – किस को चिंता है देश की – अपना पेट भरना चाहिए – हाँ उस की भी कोई सीमा नहीं है – सब से बड़ी मुश्किल है कि किसी को शर्म भी नहीं आती – जो नेता नए नए आते हैं – बड़ी बड़ी बातें करते हैं – बड़े आदर्श दिखाते हैं – वादे करते हैं – कुर्सी मिलते ही सब भूल जाते हैं । किसी ने ठीक कहा है – ‘हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा’

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