लेख

हिमालय की दिव्य औषधियों-धातुओं के मिश्रण से गंगाजल अमृततुल्य बना !  

आत्माराम यादव पीव

                    भारत दार्शनिक देश है, जहा का दर्शन गंगाजल को अमृत मानता है और जीवन के अंतिम क्षणों में वुजुर्ग –बीमार व्यक्ति के मरणासन्न अवस्था में साँस टूटने से पहले गंगाजल मुख में डालने का चलन सदियों से है। मान्यता है गंगाजल ग्रहण करने के पश्चात शरीर त्यागनेवाला सीधा मोक्ष को प्राप्त होता है। वेदों के ऋषियों ने गंगा को ‘सुधा’ अर्थात अमृत कहा है। अमृत  के गुण गंगाजल में है या नहीं, इसका निर्णय अमृत प्राप्त किये बिना नहीं हो सकता, लेकिन अमृत का निर्वचन शाब्दिक विवेवन करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि अमृत उसी परमोपयोगी वस्तु की संज्ञा है जिसे मनुष्य सुख से ग्रहण करे और यह सुख लाखों करोड़ों लोग तीर्थराज प्रयाग सहित, ऋषिकेश, हरिद्वार आदि स्थानों की यात्रा कर गंगा स्नान कर गंगाजल को अपने घर पर पूजापाठ और अंतिम समय के लिए लेकर आने की तृष्णा नहीं त्याग पाता है। चूँकि गंगा के इसी अमृतमयी जल के प्रति लोगों में गहरी श्रध्दा होने के भाव को देश की सरकार ने गंभीरता से लेते हुए उन लोगों के लिए जो गंगातक नही पहुच पाते, गंगा को उनतक सहज उपलब्ध कराये जाने हेतु गंगाजल से भरे पात्रों को पोस्टऑफिसों के माध्यम से समूचे देश में उपलब्ध कराकर गंगाजल के अमृत होने पर मुहर लगा दी है।

हमारे देश में सदा से बुद्धिवर्धक वस्तुओं का आदर होता रहा है और हमारे ऋषि-महर्षि इस तत्वज्ञान में लीन, विचारक और विद्वान् होने से वेदों और उपनिषदों में पूर्व ही गंगाजल के गुणों का अनुभव कर चुके थे और इस धरा पर गंगा के आने के प्रयोजन को समझ चुके थे तभी महाराज भागीरथ के पूर्वजों की तपस्या का परिणाम महाराज भागीरथ को प्राप्त हुआ और उनके पूर्वजों का गंगासागर में मोक्ष प्राप्त हो सका। गंगाजल को मनीषियो ने प्रज्ञाकर होने से बुद्धिजीवियों के लिए यह अत्यन्त कल्याणकारी और उनके लिए उपकारक माना गया है और यह सभी ने ऋषियों ने आभास कर लिया की यह गंगाजल अमृत के सामान साधकों की प्रज्ञा को जाग्रत कर उनके मस्तिष्क की सुषुम्ना नाड़ियों को ब्राह्मी तथा शंखपुष्पी का बल देने वाला है। ब्राह्मी और शंखपुष्पी में जितने सोम गुण हैं, गंगाजल को निस्य व्यवहार में लाने से उतने ही सोमगुण शरीर में एकत्र होता है। मैंने प्रयागकुम्भ का इतिहास समेटे हिंदुस्थानी पत्रिका के जनवरी मार्च 2012 अंक में पढ़ा कि उन्माद के दो रोगी जब तक कोठरियों में बन्द रहे तब तक हो-हल्ला मचाते रहे। एकाएक वे दोनों कोठरी से भाग निकले। मानसिक और शारीरिक उष्णता से घबराकर दोनों गंगा में कूद पड़े, लोगों ने उन्हें मारा समझ लिए किन्तु एक चार मील पर और दूसरा ग्यारह मील पर जल से जीवित बाहर निकले, सभी आश्चर्यचकित थे कि उन दोनों का पागलपन छुमन्तर हो गया है।

      इस घटना के सकारात्मक पहलु को देखें तो उनके जीवित होने और उनका पागलपन दूर होने से यह बात साबित हुई कि गंगा का जल भी प्राणियों की प्रकृति, मन और आत्मा के सर्वथा अनुकूल है और अमृत होने की सार्थकता सिद्ध करता है। चूँकि वर्ष 2017 के जून माह में ऋषिकेश में गंगा स्नान के दरम्यान मैं स्वयं गंगा के तीव्र धारा में बह गया था तब मेरे साथी पत्रकारों मित्रों ने मुझे मरा समझ मेसेज शुरू कर दिए थे तब गंगा के तल में आधा किलोमीटर बह चुकने पर एक लोहे की सांकल देख मैंने उसे ताकत से थाम ली जिससे पत्थरों से टकरा कर मैं लहूलुहान हो गया किन्तु गंगा मेरे लिए काल से अचानक देवी बनकर मुझे प्राणदान दे चुकी थी और मैं सांकल थामे आखरी गुरजे की सीढ़ियों पर आश्रय पा चूका था। गंगा मेरे लिए अमृत बन गयी, तीव्रहवा के वेग से बहाकर ले जाने वाली गंगा में मेरे शरीर को सहारा दिया, मुझे मार्ग दिया और प्रतिकूलता के बबंडरों को अनुकूल बनाकर गंगा ने अपनी प्रकृति को बदलकर जीवनदायी बन शेष रही साँसों के उपहार को लौटा दिया । गंगा के विषय में वेदों में लिखा है कि गंगाजल शीतल, स्वच्छ, स्वादु, अतिरोचक, पथ्य, पाचक, पवित्र, तृष्णा और मोह-नाशक, जठराग्नि को तीव्र करने बाला तथा बुद्धिवर्द्धक है, मुझे जीवनदान मिलने पर मेरे लिए यह बात मुझे तो सटीक लगी।

हमारे धार्मिक ग्रंथों में प्रातः कालः गंगास्नान का इसलिए माहात्म्य है कि मनुष्य सम्पूर्ण रात्रि मोह की जननी निद्रा की गोद में पड़ा रहने तथा सुख-दुखमय स्वप्नों को देखने के पश्चात् अपनी चित्त-वृत्ति को वशीभूत नहीं रख पाता। यों किसी भी जल में मनुष्य स्नान कर सकता है। स्नान का काम निद्रा, श्रम का नाश करना है। सुश्रुत के चिकित्सा स्थान में लिखा है कि-स्नान निद्रा, दाह, श्रम, स्वेद, कंडू,, तृषा को नाश करने वाला, हृदय के लिए. हितकर, मल नाश करने में श्रो, समस्त इंद्रियों का शोधन करने वाला, तन्द्रा और पाप को नष्ट करने वाला, चित्त को प्रसन्न रखने वाला, पुरुषार्थ बढ़ाने वाला, रक्त शुद्ध करने वाला तथा अग्निदीपक है। स्नान करने से शरीर के रोमकूपों में चिपका हुआ मैल साफ हो जाता है और उन्हीं रोमकूपों द्वारा शुद्ध वायु शरीर में प्रवेश कर विषाक्त वायु बाहर निकलती है। स्नान करते समय रोमकूपों के द्वारा ही शीतलता शरीर में प्रवेश कर जठराग्नि को उत्तेजित करती है। रक्त की चाल मन्द हो जाने से निद्रा आने लगती है। स्नान करने से मांस-पेशियाँ तथा रक्त उत्तेजित होता है। रक्त तथा पेशियों की उत्तेजना से निद्रा, तन्द्रा तथा मोह आदि का नाश हो जाता है और शरीर में नई स्फूति, उत्साह उत्पन्न हो जाता है। स्नान के अनेक गुण होने पर भी यदि साधारण नदी-तालाव में न नहाकर मलमोहनाशिनि, तथा जठराग्नि को दीप्त करने वाली गंगा में स्नान किया जाय तो सोने में सुगन्ध बाली कहावत चरितार्थ होगी।।

कुछ तार्किकों का मानना है कि गंगास्नान न भी करें, केवल उसे पीने के ही काम में लायें तो भी स्नान के गुण शरीर में आ जायेंगे। जब शरीर में आहार की पाचन क्रिया प्रारम्भ होती है, पाचक पित्त के द्वारा आँतों में अन्न का रसभाम रंजक पित्त की सहायता से रक्त में बदल जाता है और छोटी-छोटी तथा महीन नसों में होकर शरीर में परिभ्रमण करता है। तब रक्त में घनत्त्व आरम्भ हो जाता है। रक्त के घनरूप में होने से शरीर में खुश्की पैदा होती है। फलरूप प्यास का अनुभवः होने लगता है। पानी पीने से रक्त घनरूप में नहीं बदलने पाता । शरीर को अधिक जल मिलने के कारण, रक्त की दौड़ तेजी से शुरू हो जाती है। जल पीने से रक्त का धनत्व नष्ट हो जाता है, वह अपनी मर्यादा के अन्दर आ जाता है और सूक्ष्म नसों में सुगमता से परिभ्रमण प्रारम्भ कर देता है। पीने के बाद शरीर में परिभ्रमण करनेवाले रक्त के साथ मिलकर जल सारे शरीर में चक्कर काट आता है। इस भाँति जल, रक्त के साथ शीघ्र ही शरीर के प्रत्येक प्रान्त में पहुँचकर रत्तः-परिभ्रमण में सहायक बन जाता है। रक्तसंचार से हो प्राणियों का जीवन है और रक्त की चाल नियमित रखने के लिए जल की बड़ी आवश्यकता है। इस काम के लिए विशुद्ध जल का होना अनिवार्य है। गंगाजल स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभदायक है। स्वच्छ, रोचक तथा स्वादु होने से रसना इसे सहज ग्रहण कर लेती है। शीतल तथा तृष्णा और मोह का नाशक होने के कारण यह शरीर के रक्त को चाल को अधिक उत्तेजित करने में समर्थ होता है।

        हिमालय की दिव्य औषधियों, मणियों तथा धातुओं के मिश्रण से लम्बी घारा में बहने के कारण गंगाजल विषनाशक, पुष्टिकर तथा आरोग्यकर है। भारतीय नदियों की खास विशेषताएँ हैं।  प्रयाग के संगम पर आप देखेंगे कि गंगा और यमुना दोनों बहनें आपस में मिली हुई है, पर दोनों की धाराएँ दो दिशाओं में विभक्त हैं। उस स्थान का जल परस्पर दूध-पानी की तरह मिलकर एक नहीं हो पाया है; अपितु सर्वथा भिन्न है। गंगाजल स्वच्छ है तो यमुना-जल गंभीर श्यामवर्ण। इसी तरह गंगोत्तरी की रासायनिक तथा वैज्ञानिक विशेषता है। गंगोत्तरी के जल को लेकर उसमें किन्हीं घातुओं को अग्नि में तप्त करके छोड़ें, घातुएँ जल में बुझकर ठंडी पड़ जायेंगी, पर जल नहीं सूखेगा। उनकी तौल बराबर उतनी-की-उतनी बनी रहेगी। गरम धातु को ठंढे जल में छोड़ने से अवश्य जल सूखेगा, यह मामूली बात है, पर गंगोत्तरी के लिए यह नियम लागू नहीं होता, इस आश्चर्य को अनेक तीर्थ-यात्री अनुभव करने गंगा की और दौड़े चले आते है ताकि गंगा की दिव्यता से अपना कल्याण कर सके।

आत्माराम यादव पीव