आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
भारत की सभी पुण्यदायिनी नदियों में पुण्य सलिला गंगा एवं यमुना के समान सरस्वती की पवित्रता एवं महता की कल्पना देश के प्रत्येक सनातनी के ह्रदय में चिरस्थायी है जिसका सर्वमान्य साक्ष्य प्रयागराज में इन तीनों नदियों के संगम को त्रिवेणी के रूप में स्वीकारा गया है. मैं वर्ष 1989 के प्रयाग कुम्भ के पूर्व में इस संगम पर पहुंचा तब नाविक ने बताया की किले के पास अक्षयवट के भीतर से सरस्वती नदी यमुना- गंगा के संगमस्थल पर मिलती है किन्तु मुझे सरस्वती नदी के दर्शन और सरस्वती नदी के जल से स्नान से वंचित ही रहना पड़ा. तब से आज तक यही युक्ति प्रचलित है कि ‘सरस्वती’ नदी का लोप हो जाने के कारण उसका अस्तित्व तो है किन्तु इस नदी के जल प्रवाह का मार्ग आज भी दृश्यमान नहीं है, किन्तु इसे लेकर प्रयागराज के विद्वानों के बीच मतभेद अवश्य दिखाई देता है जो देश के किसी भी कोने से संगम स्नान को आने वाले हर व्यक्ति को सरस्वती के लोप होने की बात सुनाता है किन्तु साक्ष्य के रूप में कुछ भी देखने को नहीं मिलता. सनातन धर्म के प्रति गहरी आस्था और विश्वास के रहते लोग पाप धोने की धुन में और पुण्य अर्जित कर मोक्ष की कामना में इतने आसक्त होते है की वे दृश्यमान को भी झुठलाकर चलते बनते है. यह विषय मेरे लिए जिज्ञासा का नही अपितु सरस्वती नदी के उद्गम और प्रयाग संगम के साथ उसके अंतिम पड़ाव तक को उद्घाटित करने का है ताकि वेदों-पुराणों और शास्त्रों में वर्णित पुण्य सलिला माँ सरस्वती नदी के मूल को जाना जा सके।
‘महाभारत’ पुराण में उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार हम माँ सरस्वती नदी को जानने और समझने का प्रयत्न करें उसके पूर्व ‘ऋग्वेद’ में ‘सरस्वती’ का वर्णन केवल एक दो स्थलों में उपलब्ध होता है जिसे वेद का परिशिष्ट माना गया है। ‘महाभारत’ में अनेक ऐसे स्थल हैं जहाँ सरस्वती की पवित्रता, महत्ता एवं प्रवाह का ऐसा विशद वर्णन है जिसे पढ़कर उसके केवल कल्पित होने की धारणा एक अनविकार चेष्टा मात्र प्रतीत होती है। ‘वनपर्व’ में सरस्वती की महिमा का वर्णन करते हुए पुलस्त्य ऋषि धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं— कुरूक्षेत्र तीर्थ को सबसे पवित्र कहते हैं, कुरूक्षेत्र से भी पवित्र है सरस्वती नदी, सरस्वती से भी पवित्र है उसका तीर्थ और उन तीर्थों से भी पवित्र हैं पृथूदक। वह सब तीर्थों में उत्तम है, जो पृथूदक तीर्थ में जपपरायण होकर अपने शरीर का त्याग करता है, उसे पृनमृत्यु का भय नहीं होता। यह बात भगवान् सनत्कुमार तथा महात्मा व्यास ने कही है जिससे यह प्रमाणित होता है कि महाभारत काल में ‘सरस्वती’ की पवित्रवा पूर्णतया स्थापित हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त ‘धनपर्व’ के अन्य श्लोकों से भी यह सिद्ध होता है कि महाभारत काल में ‘सरस्वती’ नामक एक नदी का अस्तित्व था जिसकी पवित्रता एवं पापनाशक गुणों का ज्ञान ऋषियों को भली-भाँति हो चुका था।
यदि यह निश्चित है कि प्राचीन भारत में ‘सरस्वती’ नाम की नदी का अस्तित्व था तो फिर उसका प्रवाह-मार्ग किस दिशा में था और क्या वह प्रयागराज में आकर गंगा और यमुना से मिली थी ? ‘महाभारत’ में इस पवित्र नदी के सम्बन्ध में जो प्रमाण उपलब्ध हैं उनसे केवल इतना ही निश्चित हो सकता कि इस नदी का प्रवाह पश्चिम में कुरुक्षेत्र के उत्तर की और था। वनपर्व में कुरुक्षेत्र का वर्णन करते हुए महर्षि पुलस्त्य ऋषि कहते हैं– दक्षिणेत सरस्वत्या दृषद्वत्युत्तरेण ये बसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टये ।। (वनपर्व, श्लोक 4) अर्थात् जो सरस्वती के दक्षिण और दृषद्वती के उत्तर, कुरुक्षेत्र में वास करते है, बे मानो स्वर्गलोक में ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त तत्र मासं वसेद् धीरः सरस्वत्यां युधिष्ठिर । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः ॥ श्लोक-5 नारदजी कहते हैं- युधिष्ठिर | वहाँ सरस्वतीके तट-पर धीर पुरुष एक मास तक निवास करे; क्योंकि महाराज ! ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष और नाग भी उस परम पुण्यमय ब्रह्मक्षेत्रको जाते हैं ॥
‘सरस्वती’ के उद्गम स्थान के सम्बन्ध में, यद्यपि कुछ निश्चित रूप से कहना कठिन है तथापि यह अनुमान किया जा सकता है कि इसका उद्गम हिमालय के किसी बन-प्रदेश में रहा होगा जिसे ‘महाभारत’ में ‘सौगन्धिक वन’ की संज्ञा दी गई है। तद् वनं प्रविशन्नेव सर्वपापैः प्रमुच्यते । ततश्चापि सरिच्छ्रेष्ठा नदीनामुत्तमा नदी ॥ श्लोक 6 ॥ प्लझादेवी स्रता राजन् महापुण्या सरस्वती। तत्राभिषेकं कुर्वीत वल्मीकान्निःसृते जले ॥ श्लोक 7 ॥ अर्थात -उस वनमें प्रवेश करते ही मानव सब पार्पोसे मुक्त हो जाता है । उससे आगे सरिताओंमें श्रेष्ठ और नदियोंमें उत्तम नदी परम पुण्यमेयी सरस्वतीदेवी का उद्गम स्थान है, जहाँ वे प्लक्ष (पकड़ी) नामक वृक्ष की जड़ से टपक रही हैं। राजन् ! वहाँ बाँबीसे निकले हुए जलमें स्नान करना चाहिये ॥ इस वन का विशद वर्णन करते हुए ‘महाभारत’ में कहा गया है:- तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋययरत सिद्ध चारणगंधर्वाः किन्नराइज तपोधनाः । महोरगाः ॥ प्रमुच्यते । ततश्चापि सरिज्येष्ठा नदीनामुत्तमा नदी ।॥ व्ललाई वो सुता राजन् महापुण्या सरस्वती । तत्रानिक्कं कुर्वीत वम्मोकरण सृते बने। तत्वनं प्रविश्न्नेव सर्व पापैः (वनपर्व, श्लोक 84१५-7/152 यहाँ उल्लेखित सोगन्धिक वन’ हिमालय के किसी बाग में रहा होगा, क्योंकि ‘महाभारत’ एवं अन्य पुराणों में अनेक नदियों का उद्गम स्थल प्रायः हिमालय में ही माना गया है और इसी सोगन्धिक बन से ‘सरस्वती’ का स्रोत प्रवाहित हुआ है ।
‘सरस्वती’ के उद्गम के सम्वन्ध में एक दूसरी कथा भी ‘महाभारत’ में उपलब्ध होती है जिसके अनुसार उसके चमसोद्भवतीर्थं में पुनः प्रगट होने की बात कही गई है। लोमस ऋषि, महाराज युधिष्ठिर से कुरक्षेत्र की महिमा का वर्णन करते हुए सरस्वती के सम्बन्ध मे कहते हैं- द्वारं निवावराष्ट्रस्य पेषां बोषात् सरस्वती । प्रविष्टां पृथिवीं बोर मा निवावा हिमां विदुः ।। एव वे चमतोड्मेवो यत्र दृश्या सरस्वती । पत्रनामभ्यवर्तन्त सर्वाः पुण्याः समुद्रमाः ॥’ (वनपर्व, ) अर्थात् यह निषादराव का द्वार है। वीर युधिष्ठिर। उन निषादों के ही संसर्गं-दोष से सरस्वती नदी यहाँ इसलिये पृथ्वी के भीतर प्रविष्ट हो गई कि निषाद जान न सके । उपर्युक्त कथन से यह प्रतीत होता है कि सरस्वती सौगन्धिक-वन से निकल कर किसी स्थान पर लुप्त हो गई थीं और चमसोद्भे तीर्थं नामक स्थान पर प्रकट होकर कुरुक्षेत्र के उत्तर में प्रवाहित हुई थीं।
‘सरस्वती’ के सम्वन्ध में अब दूसरा प्रश्न यह है कि उसका लोप किस स्थान पर हुआ ? ‘महाभारत’ में सरस्वती के संगम के विषय में दो मत उपलब्ध होते हैं। कुछ श्लोको में ‘सरस्वती’ और समुद्र का संगम माना गया है तथा कुछ में गंगा और सरस्वती के मिलने का वर्णन मिलता है। ‘वनपर्व’ अध्याय 22 के 54 वे श्लोक ‘ततो गत्वा सरस्वत्याः सागरस्व च संगमे’ प्रथम पक्ष का प्रमाण है तथा इसी पर्व का दूसरा श्लोक ‘गंगायाश्च नरश्रेष्ठ भरस्वत्याश्च संगमे’ दूसरे मत का समर्थन करता है। एक पक्ष और देखने को मिलता है जिसमें श्लोक 125 व् 126 में सरस्वती के महत्व को प्रतिपादित करते हुए युधिष्ठिर को संबोधित किया गया है की हे राजेन्द्र ! तदनन्तर परम पुण्यमय लोक विख्यात सरस्वती-संगम तीर्थ में जाय, जहाँ ब्रह्मा आदि देवता और तपस्या के धनी महर्षि भगवान् केशवकी उपासना करते हैं ।॥ वही सरस्वती के संगम स्थल में सागर का उल्लेख कर श्लोक 60-61 में कहा गया है – ततो गत्वा सरस्वत्याः सागरस्य च संगमे ॥ गोसहस्रफलं तस्य स्वर्गलोकं च विन्दति । प्रभया दीप्यते नित्यमग्निवद् भरतर्षग॥ अर्थात -तदनन्तर सरस्वती और समुद्रके संगममें जाकर स्नान करने से मनुष्य सहस्त्र गोदान का फल और स्वर्गलोक पाता है। भरतश्रेष्ठ ! वह पुण्यात्मा पुरुष अपने तेजसे सदा अग्निकी भाँति प्रकाशित होता है ।।
‘महाभारत’ के अन्तर्गत इन विरोधी मतों का समाधान दो प्रकार से हो सकता है। प्रथम तो यह मानकर कि सम्भवतः महाभारत काल में दो पुष्यसलिता नदियों का अस्तित्व रहा हो जिन्हें सरस्वतीं कहा जाता रहा हो और दूसरे यह कल्पना करके कि सरस्वती का संगम ‘गंगा’ से किसी स्थान पर हुआ होगा। इन दोनो सम्भावनाओं में द्वितीय ही सहज और जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। अध्याय २४ के श्लोक 35 – गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नाति यः संगमे नरः। दशाश्वमेधानाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ 35॥ को देखने से स्पष्ट हो जाता है की प्रयाग में गंगा और यमुना का संगम है, जो मनुष्य गंगा-यमुना के बीच संगम (प्रयाग) में स्नान करता है, उसे दस अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है और वह अपने कुल का उद्धार कर देता है॥ इससे इस बात की प्रमाणिकता स्वमेव सिद्ध होती है की प्रयाग में गंगा और यमुना का संगम है सरस्वती का नहीं है .
अगर हम यह मान ले की यदि सरस्वती और गंगा का संगम हुआ है और यह बात को प्रधानता दे तो इस बात का महत्व दूसरी बात से जोड़ा जा सकेगा कि उसके बाद सरस्वती समुद्र से मिल गई होगी । ‘महाभारत’ में प्रायः अधिकांश सरिताओं-नदियों का जो किसी अन्य नदी से मिलकर अन्त में समुद्र से मिलती हैं, समुद्र से ही संगम का वर्णन किया गया है। उदाहरणार्थ यद्यपि ‘यमुना’ गंगा से मिलकर समुद्र में मिलती हैं तथापि उसका भी समुद्र से संगम का प्रमाण उपलब्ध होता है । सरस्वती महापुष्पा हृदिनो तीर्थमासिनी । समुद्रया महावेगा यमुना यत्र पाण्डव ।। (वनपर्व, श्लोक 63) इन प्रमाणों से यह तर्कसंगत या बुद्धिमतापूर्ण प्रतीत होता है कि सरस्वती किसी स्थान पर गंगा से मिलकर अंत में समुद्र में प्रविष्ट हो गई थी। यद्यपि गंगा और सरस्वती के संगम का वर्णन ‘महाभारत’ में यत्र-तत्र उपलब्ध होता है तथापि इस संगम की स्थित्ति ‘प्रयाग’ में मानने के लिये कोई प्रमाण नहीं है। ‘महाभारत’ में जहाँ कहीं भो प्रयाग के संगम का वर्णम किया गया है, वहाँ पर केवल गंगा और यमुना का ही उल्लेख मिलता है जिससे पह सिद्ध होता है कि सरस्वती और गंगा का संगम किसी अन्य स्थल पर हुआ होगा ।
महाभारत के तीर्थयात्रा पर्व अध्याय 24 के श्लोक 112 से 115 को देखे- शशरूपप्रतिच्छनाः पुष्करा या भारत ॥११४॥ सरस्वत्यां महाराज अनुसंवत्सरं च ते । दृश्यन्ते भरतश्रेष्ठ वृत्तां वै कार्तिकीं सदा ॥११५॥ तत्र ज्ञात्वा नरव्याघ्र द्योतते शशिवत् सदा। अर्थात हे राजेन्द्र ! शशयान नामक तीर्थ अत्यन्त दुर्लभ है। वहाँ चमसोद्भेद, शिवोद्भेद और नागोद्भद तीर्थ में सरस्वतीका दर्शन होता है । चमसोद्भद में स्नान करनेसे अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त होता है, उसमें जाकर स्नान करे। वहाँ सरस्वती नदी में प्रतिवर्ष कार्ति की पूर्णिमा को शश (खरगोश) के रूपमें छिपे हुए पुष्कर तीर्थ देखे जाते हैं। भरतश्रेष्ठ ! नरव्याघ्र ! वहाँ स्नान करके मनुष्य सदा चन्द्रमा के समान प्रकाशित होता है। भरतकुल तिलक ! उसे सहस्र गोदान का फल भी मिलता है॥ यहाँ सरस्वती नदी के तीर्थ में समुद्र के साथ संगम की बात आई है कितु कही भी गंगा यमुना के साथ संगम का प्रसंग दृष्टिगत नही हुआ ॥ ‘महाभारत’ में उपलब्ध इन प्रमाणों से हम ‘सरस्वती’ के सम्बन्ध में दो बातें निश्चित कर सकते है। एक तो यह कि प्राचीन भारत में उसके नदी के रूप में अस्तित्व के सम्बन्ध में किसी प्रकार की शंका नही की जा सकती है, किन्तु इस कलयुग में वह सरस्वती नदी या उसके संगम के कोई प्रमाण उजागर नहीं है। द्वापरयुग में कौरवों और पांडवों के मध्य कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध हुआ था तब कुरुक्षेत्र के उत्तर में सरस्वती के प्रवाहित होकर किसी स्थान पर गंगा से मिलने की बात आती है पर ‘महाभारत’ के आधार पर गंगा के सरस्वती से या गंगा यमुना के सरस्वती से संगम होने को साक्षों सहित व्यक्त कर पाना असंभव कार्य है, किन्तु विद्वजजनों के लिए इसकी प्रमाणिकता सिद्ध करना असंभव नहीं ।
आत्माराम यादव पीव