भूगोल में मनुष्य सृष्टि का आदि स्थान एवं अन्य कुछ प्रश्न

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first humanसंसार में मनुष्यों की जनसंख्या लगभग 7 अरब से कुछ अधिक होने का अनुमान है। संसार में देशों की कुल संख्या 195 से अधिक हैं। इन सभी देशों में सबसे पुराना देश भारतवर्ष है जिसका प्राचीन नाम आर्यावर्त है। आर्यावर्त से पूर्व इस देश का अन्य कोई नाम नहीं था। इस आर्यावर्त देश में ही आज से लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व इस कल्प की प्रथम मनुष्य सृष्टि हुई थी। मनुष्य की सृष्टि सबसे पूर्व उसी स्थान पर होना सम्भावित व सिद्ध है कि जहां की धर्म व संस्कृति सबसे प्राचीन हो और वह स्थान उस देश व उसके समीप का शिखर या ऊंचे स्थान पर होना चाहिये। यह श्रेय व सम्मान वेद व वैदिक साहित्य के कारण भारत को ही प्राप्त है। अब उस स्थान की खोज करना भी उचित है जहां कि सबसे पूर्व व प्रथम मनुष्यों का जन्म हुआ था। संसार में सबसे प्राचीन साहित्य वैदिक साहित्य ही है। यह समस्त साहित्य संस्कृत भाषा में है। महर्षि दयानन्द संस्कृत एवं वैदिक साहित्य के महाभारत काल के बाद सबसे अधिक ज्ञानी व मूर्धन्य विद्वान थे और उन्होंने इस विषय की खोज को भी अपना विषय बनाया था। यद्यपि उन्हें इस विषय पर पृथक से पुस्तक लिखने का अवसर नहीं मिला परन्तु यदि मिलता तो हम विश्वास से कह सकते हैं कि वह इस विषय पर विस्तार से और सप्रमाण बहुत कुछ लिख सकते थे। उस काल में उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता धार्मिक जगत में प्रचलित मिथ्या विश्वासों को दूर करने की थी। ईश्वर के सत्य स्वरूप के प्रति न केवल समान्य लोगों अपितु धार्मिक विद्वानों व नेताओं में भी नाना प्रकार की मिथ्या व तर्कहीन आस्थायें व अन्धविश्वास प्रचलित थे। ईश्वर के सत्य स्वरूप, जीव का स्वरूप व उसके कर्तव्य, मनुष्य जीवन का उद्देश्य, मोक्ष क्या है व उसकी प्राप्ति के साधन क्या हैं, ऐसे अनेकानेक प्रश्न थे जिनका किसी को ज्ञान नहीं था और इसके नाम पर नानाविध भ्रान्तियां प्रचलित थी। इसका आर्थिक व भौतिक लाभ हमारे पण्डे-पुजारी मिथ्या पूजा-उपासना व अनावश्यक कर्मकाण्डों को कर-कराकर उठाया करते थे। ऐसे लोगों द्वारा ही वर्णव्यवस्था और फलित ज्योतिष आदि के नाम पर समाज में बड़ी मात्रा में असमानतायें व विषमतायें पैदा कर दी गईं थीं जिसका कारण देश की गुलामी और अधिकांश लोगों का नारकीय जीवन था।

 

ऐसी परिस्थितियों में महर्षि दयानन्द ने सन् 1875 में विश्व साहित्य का बेजोड़ ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश लिखकर प्रकाशित कराया। इस ग्रन्थ में अपनी खोज व निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए वह कहते हैं कि मनुष्यों की आदि सृष्टि त्रिविष्टप अर्थात् तिब्बत में हुई। वह यह भी बताते हैं कि आदि सृष्टि में एक ही मनुष्यजाति थी। कालान्तर में इनमें आर्य और दस्यु दो भेद हुए। गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार जो श्रेष्ठ थे वह आर्य, विद्वान अथवा देव कहलाये और जो दुष्ट और मूर्खों के काम करते थे वे दस्यु अर्थात डाकू कहलाये। इस प्रमाणित व अनुभूत ज्ञान का प्रकाश करने के अतिरिक्त वह यह भी सूचित करते हैं कि जब आर्यों और दस्युओं में लड़ाई-झगड़ा रहने लगा तब आर्य लोग भारत भूमि को भूगोल में सर्वोत्तम जानकर तिब्बत से यहां आकर बसे। इससे पूर्व तिब्बत के अतिरिक्त सारे भूमण्डल पर कहीं मनुष्य जाति का निवास नहीं था क्योंकि सृष्टि बनने के बाद तिब्बत में प्रथम मानव सृष्टि ईश्वर के द्वारा की गई थी। संसार के अन्य सभी स्थान मनुष्यों से शून्य थे। आर्यों के द्वारा भारत की खाली भूमि को बसाये जाने के कारण ही इस देश का प्रथम नाम आर्यावर्त हुआ। महर्षि दयानन्द द्वारा इन तथ्यों को ज्ञानपूर्वक व पक्षपातरहित होकर प्रकट किये जाने से यही मत सत्य, प्रामाणिक, ऐतिहासिक व निर्भ्रांत है।

मानव सृष्टि की उत्पत्ति और आर्यावर्त के बसाने के तथ्यों पर प्रकाश डालने के बाद उन्होंने आर्यावर्त की सीमा का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल, पूर्व और पश्चिम में समुद्र तथा सरस्वती, पश्चिम में अटक नदी, पूर्व में दृषद्वती=ब्रह्मपुत्र नदी तक जो फैला हुआ भूभाग है, दूसरे शब्दों में हिमालय की मध्य रेखा से दक्षिण में रामेश्वरपर्यन्त विन्ध्याचल के भीतर जितने देश अथवा भूभाग हैं उन सबको आर्यावर्त कहते हैं। उन्होंने अपने ज्ञान व विवेक से यह समाधान व स्पष्टीकरण भी किया है कि आर्यों के (तिब्बत से) आगमन से पूर्व इस देश में न तो और कोई लोग बसते थे और न इस देश का और कोई नाम था। आर्य लोग सृष्टि के आदि में कुछ काल पश्चात् तिब्बत से सीधे आकर इसी देश में बसे।

 

भारत में आर्य सृष्टि के आरम्भ से रहते आये हैं। इतिहास व वैदिक साहित्य आदि में कहीं इस बात की चर्चा नहीं है कि आर्य कभी बाहर से आये थे। यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि भारत में मुसलमान बाहर से आये। यहां आक्रमण व लूटपाट की, लोगों की हत्यायें की, उनका धर्मान्तरण किया और शासन किया। इसी प्रकार से भारत में व्यापार के लिए आई ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कूटनीति व राजनैतिक हस्तक्षेप कर धीरे-धीरे राजनैतिक सत्ता को प्राप्त किया और भारत को गुलाम बनाया। उन्हें डर था कि उन्हें विदेशी कह कर भारत से निकाला जा सकता है या इसके प्रयास आरम्भ हो गये थे। अतः उन्होंने एक मनघड़न्त कथा प्रचारित की कि आर्य भारत में बाहर से आये थे। जब राजा ही यह बात कहे तो गुलामों में प्रतिकार करने का साहस कहां हुआ करता है? इसके साथ जो लोग विदेशियों के उच्छिष्ट भोजी किंवा कृपा पात्र थे, उनका विरोध करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो हां में हां तब भी मिलाते थे और बाद में उनकी मानसिकता ही बन गई। वस्तु स्थिति का यदि किसी ने पहली बार अध्ययन किया तो वह महर्षि दयानन्द सरस्वती थे। उन्होंने भारत में उपलब्ध संस्कृत भाषा का सभी प्रकार का साहित्य पढ़ा। इसके साथ वह प्रायः सभी प्रान्तों के शिक्षित, विद्वान एवं नेताओं से मिले और धर्म, संस्कृति, इतिहास आदि सभी विषयों पर उनसे चर्चा की। उन्होंने सप्रमाण लिखा है कि यह कहना कि आर्य लोग ईरान से यहां आये और यहां की जंगली जातियों कोल, भील व द्रविड़ आदि को मारकर यहां बस गये सर्वथा गप्प है। आर्यों से पहले यहां कोई नहीं रहता था यदि रहता था तो इस देश का नाम क्या था? इक्ष्वाकु से लेकर कौरव-पाण्डव तक भूगोल में सर्वथा आर्यो का राज्य और वेदों का प्रचार था। अतः इस ऐतिहासकि गुत्थी को सुलझाने के लिए महर्षि दयानन्द का योगदान सराहनीय एवं प्रशंसनीय है।

भारत पहले मुसलमानों का और फिर अंग्रेजों का गुलाम बना। गुलामी में यह पता ही नहीं रहा कि भारत का महाभारत काल पर्यन्त स्वर्णिम इतिहास रहा है। महर्षि दयानन्द ने अपने इतिहास के वैदुष्य से अवगत कराया कि एक समय था जब समस्त भूमण्डल में आर्यों का चक्रवर्ती राज्य था, परन्तु अब अभाग्योदय से और आर्यों के आलस्य-प्रमाद तथा परस्पर के विरोध से अन्य देशों पर राज्य करने की तो कथा ही क्या, किन्तु आर्यावत्र्त में भी आर्यों का अखण्ड, स्वतन्त्र, स्वाधीन, निर्भय राज्य उनके समय में नहीं है। जो कुछ उनके समय में था वह भी विदेशियों से पादाक्रान्त हो रहा है। वह आगे लिखते हैं कि जब दुर्दिन आता है तब देशवायियों को अनेक प्रकार के दुःख भोगने पड़ते हैं। उनके स्वर्णिम शब्द हैं – ‘‘कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मतमतान्तर के आग्रहरहित, अपने और पराये का पक्षपात शून्य, प्रजा पर पितामाता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ भी विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायी नहीं होता। हम अपनी ओर से यह भी जोड़ना चाहते हैं कि किसी भी देश में राजा, मंत्री व राज्य कर्मचारी आदि ऐसे ही लोग होने चाहिये जिनकी उस देश के इतिहास तथा वहां के पूर्वजों व सत्य रीति-रिवाजों-परम्पराओं मे शत-प्रति निष्ठा हो। उन्होंने अपने साहित्य में अनेक स्थानों पर यह भी घोषणा की कि उनके समय में सृष्टि को उत्पन्न हुए एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख तरेपन हजार वर्ष हो गये हैं। इतना ही समय वेद को उत्पन्न हुए भी हो गया है। यह उनकी मान्यता थी जिसे उन्होंने अनेक तर्कों, युक्तियों व प्रमाणों से सिद्ध किया है।

 

हमने इस लेख में जिन विषयों का उल्लेख किया है, यद्यपि महर्षि दयानन्द ने इन सबका समाधान कर दिया था परन्तु देश में किन्हीं दबावों व निर्बलताओं के कारण अभी तक इन विषयों व समाधानों को अन्तिम रूप से स्वीकार नहीं किया गया। बच्चों को स्कूलों में सत्य के विपरीत पढ़ाया जाता है, परन्तु आर्य समाज और सनातन धर्म के भाई इस पर मौन रखते हैं। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन में एक सिद्धान्त दिया है कि सत्य को मानना व मनवाना एवं असत्य को छोड़ना और छुड़वाना उन्हें अभीष्ट है और सभी को इसे स्वीकार कर अपने जीवन में अपनाना चाहिये, यह उनकी प्रेरणा थी।  हम आशा करते हैं कि भारतवंशी इस सत्य व कल्याणकारी सिद्धान्त को अपने जीवन में अपनायेंगे जिससे देश का प्राचीन धर्म व संस्कृति सुरक्षित रह सकेगी। हम यह भी आशा करते हैं कि पाठक महर्षि दयानन्द के विचारों से सहमत होंगे।

 

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